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बारूद के ढेर पर कार्बेट पार्क
Updated Fri, 27 Apr 2018 02:31 AM IST
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वैष्णो देवी पहुंची उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग
- फोटो : ANI
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रामनगर (नैनीताल)। कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर), कार्बेट नेशनल पार्क इस वर्ष बारूद के ढेर पर खड़ा है। ऐसी गर्मी में अगर पार्क के किसी छोर में आग लग गई तो उसे बुझाना मुश्किल हो जाएगा।
प्रदेशभर के वन क्षेत्रों में हर वर्ष 15 फरवरी से 15 जून तक फायर सीजन पर विशेष सावधानी बरती जाती है। शुरुआती चरण में झाड़ियां काटकर 100, 50 फुट चौड़ी फायर लाइनों को साफ किया जाता है। मोटर रोड के किनारे गिरे सूखे पत्तों को भी जलाया जाता था, जो इस बार नहीं जलाया गया है। इस कारण सड़कों से लेकर जंगलों तक सूखे पत्ते बिखरे हैं, जिससे कभी आग लग गई तो बुझने से भी नहीं बुझ पाएगी। इससे पूर्व पार्क क्षेत्र में आग लगती थी तो वनकर्मी सोचते थे कि कहीं पेड़ के खूंट में आग रह गई होगी, उससे आग लगी होगी, लेकिन इस वर्ष तो फुंकान भी नहीं हुआ और कोर जोन में स्टाफ के अलावा अन्य को जाने की अनुमति नहीं होती है, वहां दो बार आग लग चुकी है जबकि पार्क में असामाजिक तत्वों, आग की घटनाएं रोकने के लिए उपलब्ध ड्रोन, एटीवी गाड़ी भी शोपीस बनकर रह गए हैं। इस कारण घटना को संदिग्ध मानते हुए एसडीओ बिजरानी शिवराज चंद मामले की जांच कर रहे हैं। वहीं सीटीआर के उपनिदेशक अमित वर्मा ने बताया कि 15 फरवरी तक जंगलों में गिरे पत्तों का जला देना चाहिए था, लेकिन उन दिनों अधिक नमी के चलते फुंकान नहीं हो पाया। अब गर्मी, सूखे पत्ते खतरे का कारण तो बन ही गए हैं।
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प्रदेशभर के वन क्षेत्रों में हर वर्ष 15 फरवरी से 15 जून तक फायर सीजन पर विशेष सावधानी बरती जाती है। शुरुआती चरण में झाड़ियां काटकर 100, 50 फुट चौड़ी फायर लाइनों को साफ किया जाता है। मोटर रोड के किनारे गिरे सूखे पत्तों को भी जलाया जाता था, जो इस बार नहीं जलाया गया है। इस कारण सड़कों से लेकर जंगलों तक सूखे पत्ते बिखरे हैं, जिससे कभी आग लग गई तो बुझने से भी नहीं बुझ पाएगी। इससे पूर्व पार्क क्षेत्र में आग लगती थी तो वनकर्मी सोचते थे कि कहीं पेड़ के खूंट में आग रह गई होगी, उससे आग लगी होगी, लेकिन इस वर्ष तो फुंकान भी नहीं हुआ और कोर जोन में स्टाफ के अलावा अन्य को जाने की अनुमति नहीं होती है, वहां दो बार आग लग चुकी है जबकि पार्क में असामाजिक तत्वों, आग की घटनाएं रोकने के लिए उपलब्ध ड्रोन, एटीवी गाड़ी भी शोपीस बनकर रह गए हैं। इस कारण घटना को संदिग्ध मानते हुए एसडीओ बिजरानी शिवराज चंद मामले की जांच कर रहे हैं। वहीं सीटीआर के उपनिदेशक अमित वर्मा ने बताया कि 15 फरवरी तक जंगलों में गिरे पत्तों का जला देना चाहिए था, लेकिन उन दिनों अधिक नमी के चलते फुंकान नहीं हो पाया। अब गर्मी, सूखे पत्ते खतरे का कारण तो बन ही गए हैं।
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