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Kotdwar News: पहाड़ की पहचान काफल पर मौसम की मार

Wed, 06 May 2026 06:05 PM IST
देहरादून ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार Updated Wed, 06 May 2026 06:05 PM IST
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Weather hits Kafal, the identity of the mountains
ओलावृष्टि और गर्मी ने बिगाड़ा उत्पादन का गणित
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काफल बेचकर आजीविका चलाते हैं पहाड़ों में रहने वाले कई परिवार, इस बार चेहरे पर छाई मायूसी
जयहरीखाल। उत्तराखंड की पहचान माने जाने वाले रसीले काफल पर इस बार मौसम की मार भारी पड़ती नजर आ रही है। मौसम में बड़े बदलाव और अन्य कारणों से उत्पादन से पहले ही गिरावट देखी जा रही है। हाल ही में हुई ओलावृष्टि और आंधी ने इन फलों को काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में विक्रेताओं की आर्थिकी प्रभावित होने की भी आशंका बनी है।
मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला काफल सामान्यतः चार से छह हजार फीट की ऊंचाई पर पैदा होता है और अप्रैल-मई में पककर तैयार होता है। यह फल न केवल अपने खास स्वाद के लिए जाना जाता है बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. आरके द्विवेदी ने बताया कि इस बार काफल के कम उत्पादन के पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं। बढ़ते तापमान के कारण पौधों के जीवन चक्र में बदलाव आया है जिससे फूल और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। साथ ही परागण करने वाले कीटों की कमी और जंगलों में हो रहे बदलावों ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया है।
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ग्रामीण संपूर्ण बिष्ट और निरंजन जोशी ने बताया कि इस बार पेड़ों पर कम मात्रा में काफल लगा था जो ओलों की मार से काफी हद तक गिर गया या खराब हो गया। इससे बाजार में काफल की उपलब्धता बेहद कम हो गई है। सीजन में जयहरीखाल, लैंसडौन और गुमखाल क्षेत्रों में अभी तक काफल बेचने वाले भी कहीं नजर नहीं आए हैं जबकि मई का पहला हफ्ता बीत रहा है। यह समय काफल के पककर तैयार होने का समय माना जाता है।
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काफल बेचकर आजीविका चलाने वाले ग्रामीण दिगंबर, अनिल और मनोज ने बताया कि हर साल की तुलना में इस बार उनकी आमदनी पर बड़ा असर पड़ा है। सीजन में मिलने वाला यह फल उनके लिए आय का प्रमुख साधन होता है लेकिन इस बार उत्पादन घटने से आजीविका को लेकर चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि काफल केवल एक फल नहीं बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसकी कमी न केवल लोगों की आय पर असर डाल रही है, बल्कि पहाड़ की पहचान भी प्रभावित हो रही है।
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