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दो दशक बाद भी नहीं बन पाया उत्तराखंडी के सपनों का उत्तराखंड

Sun, 08 Aug 2021 09:03 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sun, 08 Aug 2021 09:03 PM IST
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Uttarakhand of Uttarakhandi's dreams could not be made even after two decades
उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण बनाने और प्रदेश में धारा 371 लागू करने समेत कई जनपक्षीय मुद्दों को लेकर आमरण अनशन में प्राणों की आहुति देने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी के सपनों का उत्तराखंड सपना ही बनकर रह गया है। जिन मुद्दों के लिए बाबा ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया, उनकी शहादत के पौने दो दशक बाद भी उन समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया।
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आठ अगस्त 2004 की मध्य रात्रि में चमोली जिले के बेनीताल स्थित टोपरी उड्यार में बाबा मोहन उत्तराखंडी ने राजधानी गैरसैंण, लोगों का सरकारी नौकरी, भू कानून के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी, लेकिन आज भी ये सभी समस्याएं जस की तस बनी हुई है। बाबा उत्तराखंडी के सहयोगी और पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष तीरथ सिंह राही का कहना है कि बाबा ने जिन मुद्दों के लिए आंदोलन किया, वो आज भी हल नहीं हो पाए हैं। उन्होंने सरकार से तत्काल समस्याएं हल करने की मांग की।
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बंठोली गांव के थे बाबा उत्तराखंडी
जिले के एकेश्वर ब्लाक के बंठोली गांव निवासी मनवर सिंह नेगी के घर 1948 में जन्में मोहन सिंह ने प्रावि मौदाड़ी से पांचवीं और जीआईसी सतपुली से दसवीं करने के बाद दुगड्डा से आईटीआई की थी। उसके बाद सेना की बीईजी कोर में भर्ती हुए, लेकिन समाज और पहाड़ के लिए कुछ करने की ललक के चलते उन्होंने सेना की नौकरी छोड़कर क्षेत्रीय समस्याओं के लिए संघर्ष करना शुरू किया। 1988 से 1996 तक वे ग्राम पंचायत बंठोली के प्रधान रहे।
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