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Kotdwar News: सिलगाड बीट में तीन टस्करों ने बनाया ठिकाना, गांवों में बढ़ी आवाजाही
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संवाद न्यूज एजेंसी
दुगड्डा (कोटद्वार)। लैंसडौन वन प्रभाग की दुगड्डा रेंज की सिलगाड बीट वन्यजीवों की पसंदीदा वास स्थली बन रहा है। यहां पिछले चार वर्षों से तीन टस्करों की लगातार मौजूदगी बनी हुई है। बरसात समाप्त होने के बाद हाथियों की आवाजाही फिर बढ़ गई है। पिछले दो दिनों से दो टस्कर साझासैंण और नाथूपुर गांव के आसपास विचरण कर रहे हैं। इससे आसपास के गांवों के ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है।
दुगड्डा से चौकीसेरा के बीच का वन क्षेत्र हाथियों समेत अन्य वन्यजीवों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। नौड़ी क्षेत्र को हाथियों का प्राकृतिक वास स्थल माना जाता है। यहां रोहिणी, खैंण, सांदण और पुलांई जैसे पेड़-पौधों से हाथियों को पर्याप्त हरा चारा मिलता है। वहीं, साल और सांदण की छाल से उन्हें रेशेदार आहार उपलब्ध होता है। बरसाती नालों में पानी की उपलब्धता भी वन्यजीवों को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करती है।
सिलगाड वन क्षेत्र से सटे चौकीसेरा, भानकोट, तुसराणी, बिलंगी, फतेहपुर, सिमलचौड़, साझासैंण, नाथूपुर, बस्यूर ब्राह्मण और गुनी बस्यूर गांवों में हाथियों की आवाजाही बनी रहती है। मंगलवार रात हाथी साझासैंण में धमक गए। सूचना पर वन विभाग ने हाथियों को आबादी से दूर कर दिया। बुधवार सुबह हाथी नाथूपुर गांव के पास धमक गए। ग्रामीणों को आशंका है कि हाथी रात में फिर गांव की सीमा में प्रवेश कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सिलगाड क्षेत्र में हाथियों के साथ बाघ, गुलदार, सांभर और चीतल की मौजूदगी भी बढ़ी है।
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हाथियों को आबादी से दूर वन क्षेत्र की ओर रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। हाथियों के प्राकृतिक वास स्थलों पर लैंटाना उन्मूलन के बाद नैपियर घास लगाने की योजना स्वीकृति के लिए उच्चाधिकारियों को भेजी गई है।
- रमेश चंद्र सिंह नेगी, रेंजर दुगड्डा।
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दुगड्डा (कोटद्वार)। लैंसडौन वन प्रभाग की दुगड्डा रेंज की सिलगाड बीट वन्यजीवों की पसंदीदा वास स्थली बन रहा है। यहां पिछले चार वर्षों से तीन टस्करों की लगातार मौजूदगी बनी हुई है। बरसात समाप्त होने के बाद हाथियों की आवाजाही फिर बढ़ गई है। पिछले दो दिनों से दो टस्कर साझासैंण और नाथूपुर गांव के आसपास विचरण कर रहे हैं। इससे आसपास के गांवों के ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है।
दुगड्डा से चौकीसेरा के बीच का वन क्षेत्र हाथियों समेत अन्य वन्यजीवों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। नौड़ी क्षेत्र को हाथियों का प्राकृतिक वास स्थल माना जाता है। यहां रोहिणी, खैंण, सांदण और पुलांई जैसे पेड़-पौधों से हाथियों को पर्याप्त हरा चारा मिलता है। वहीं, साल और सांदण की छाल से उन्हें रेशेदार आहार उपलब्ध होता है। बरसाती नालों में पानी की उपलब्धता भी वन्यजीवों को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करती है।
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सिलगाड वन क्षेत्र से सटे चौकीसेरा, भानकोट, तुसराणी, बिलंगी, फतेहपुर, सिमलचौड़, साझासैंण, नाथूपुर, बस्यूर ब्राह्मण और गुनी बस्यूर गांवों में हाथियों की आवाजाही बनी रहती है। मंगलवार रात हाथी साझासैंण में धमक गए। सूचना पर वन विभाग ने हाथियों को आबादी से दूर कर दिया। बुधवार सुबह हाथी नाथूपुर गांव के पास धमक गए। ग्रामीणों को आशंका है कि हाथी रात में फिर गांव की सीमा में प्रवेश कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सिलगाड क्षेत्र में हाथियों के साथ बाघ, गुलदार, सांभर और चीतल की मौजूदगी भी बढ़ी है।
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हाथियों को आबादी से दूर वन क्षेत्र की ओर रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। हाथियों के प्राकृतिक वास स्थलों पर लैंटाना उन्मूलन के बाद नैपियर घास लगाने की योजना स्वीकृति के लिए उच्चाधिकारियों को भेजी गई है।
- रमेश चंद्र सिंह नेगी, रेंजर दुगड्डा।