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मालू के पत्ते हो सकते है थर्माकॉल का विकल्प

Sat, 06 Feb 2016 06:17 PM IST
श्रीनगर
श्रीनगर Updated Sat, 06 Feb 2016 06:17 PM IST
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एनजीटी की ओर से थर्माकॉल पर प्रतिबंध के बाद मालू के पत्ते नए रोजगार की संभावनाएं दे सकते हैं। उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से शादी-ब्याह में मालू के पत्तों का उपयोग होता रहा है। वैज्ञानिकों व चिकित्सकों का कहना है कि पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिहाज से जहां थर्माकॉल हानिकारक है, वहीं मालू के पत्ते, फूल व छाल औषधीय गुणों से भरपूर हैं।
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मालू को हिंदी में लता काचनार कहा जाता है। मालू का (वैज्ञानिक नाम बाहुनिया वाहली) है। यह उत्तराखंड के साथ ही पंजाब, मध्यप्रदेश, सिक्किम, उत्तर प्रदेश में पाया जाता है। जीबी पंत पर्यावरण एवं विकास शोध संस्थान के वैज्ञानिक डा. प्रकाश फोंदणी ने बताया कि मालू सदाबहार पौधा है। इसके पत्तों से पत्तल, पूड़े व पूजा की सामग्री बनाई जाती है। साथ ही चारा पत्ती के रूप में भी उपयोग की जाती है। डा. फोंदणी ने बताया कि मालू का फूल भौंरों के शहद बनाने में सहायक होने के साथ ही औषधीय उपयोग में भी लाया जाता है। छाल से चटाई  व सूखी लकड़ी ईंधन के रूप में काम आती है। छप्पर की छत बनाने में भी पत्तों का उपयोग किया जाता है। मालू के पौधे जल स्रोत व मृदा संरक्षण का काम करता है। डा. प्रकाश फोंदणी ने बताया कि मालू के पौधा पारिस्थितिकीय संतुलन के साथ ही जल स्रोत व मृदा संरक्षण में अहम होता है।
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औषधीय गुणों से भरपूर
आयुर्वेदाचार्य डा. सुशांत मिश्रा ने बताया कि मालू के पत्तों के काढ़े से शरीर में बन रही गांठों की बीमारी दूर होती है। खांसी, जुकाम व पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने के लिए भी मालू के पत्तों का उपयोग किया जाता है।
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उपयोग के बाद भी लाभकारी
मालू उपयोग के बाद भी लाभकारी होता है। शादी-ब्याह में पत्तल, पूडों के उपयोग के बाद इनसे खाद बनाई जाती है। जबकि थर्माकॉल को नष्ट नहीं किया जा सकता है।

राम सिंह ने की शहर में नई पहल
थर्माकॉल के विकल्प को तलाशने में शहर के राम सिंह रावत ने नई पहल की है। उन्होंने बताया कि होटल खोलने से पहले उन्होंने थर्माकॉल का विकल्प तलाशना शुरू किया, लेकिन मालू के पत्ते से पत्तल व पूड़े बनाने वाला कहीं नहीं मिला। तब केले के तने की छाल से निर्मित थाली व कटोरी मिली। उन्होंने बताया कि वह अपने होटल में इन्हीं का उपयोग करते हैं।
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