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लैंसडौन : पलायन रोकने के लिए बने आवासीय योजना

Thu, 17 Sep 2026 05:06 PM IST
देहरादून ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार Updated Thu, 17 Sep 2026 05:06 PM IST
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Lansdowne: Housing scheme formulated to curb migration.
पलायन का आम जनजीवन पर पड़ रहा है असर
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लैंसडौन। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंकने वाली नगरी लैंसडौन भूमि संबंधी कारणों से पिछड़ती जा रही है। इसका असर पलायन के रूप में दिखाई दे रहा है। भूमि नहीं मिलने से कई पीढि़यों से रह रहे लोग एक-एक कर नगर छोड़ने को मजबूर हैं। छावनी नगर से हो रहे पलायन को रोकने के लिए आवासीय योजना बनाए जाने की जरूरत महसूस की जाने लगी है।
लैंसडौन छावनी क्षेत्र होने के कारण यहां की प्रशासनिक सेवाएं रक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित होती हैं। वर्ष 1887 में जब गढ़वाली बटालियन की अल्मोड़ा में नींव पड़ी थी, तब इसके मुख्यालय की स्थापना के लिए लैंसडौन को उपयुक्त मानते हुए चार नवंबर 1887 को लेफ्टिनेंट कर्नल ईपी मैनवारिंग के नेतृत्व में अल्मोड़ा से कालोडांडा लैंसडौन पहुंची पलटन के साथ आठ व्यापारी परिवार भी आए थे। सेना के जवानों के रहने को बैरक बनाए गए। ब्रिटिश पलटन की गढ़वाली सेना की जरूरतों को पूरा करने को सदर बाजार की स्थापना कर यहां आम लोगों को बसाया गया। सेना व सैनिकों की सुविधाओं के लिए सरकारी कार्यालयों, स्कूलों, अस्पताल की स्थापना की गई।
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ब्रिटिशकाल में सिविल लोगों को बसाने के लिए 284 लीज वाली भूमि सिविल जनता को आवंटित की गई थी और 18 बंगलों के लिए सिविलियन को भूमि दी गई जिनमें सिविलियन ने बंगले बनवाए। भूमि नहीं मिलने से सरस्वती शिशु मंदिर का संचालन बंद हो गया। कम होती छात्र संख्या के कारण जीजीआईसी का अन्य विद्यालय में विलय करने की प्रक्रिया की बात सामने आ रही है। कैंट स्कूल की घटती छात्र संख्या भी प्रबंधन के लिए चिंता का कारण बनी हुई है।
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छावनी नगर की मुख्य समस्या भूमि की है। ब्रिटिश राज में सिविल जनता को बसाने के लिए सीमित भूमि लीज में दी थी। मकान मालिकों ने अपनी जरूरतों के लिए किराएदारों को रखना बंद कर दिया। छावनी क्षेत्र में भूमि नियमों की जटिलता समस्या का कारण है। -संजय कन्नौजिया, सामाजिक कार्यकर्ता। (फोटो)
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छावनी क्षेत्र में कई पीढि़यों से रह रहे लोग भूमि न होने से नगर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। भूमि की उपलब्धता न होने से वर्षों से किराये के भवन पर चल रहा सरस्वती शिशु मंदिर का संचालन बंद करना पड़ा। -सुशील अग्रवाल, भाजपा कार्यकर्ता। (फोटो)
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छावनी क्षेत्र में गरीब तबके के लिए कोई आवास योजना, व्यवसायिक योजना भूमि नहीं मिलने से धरातल पर नहीं उतर पा रही है। जिन लोगों के पास अपने घर नहीं हैं उन्हें घर बनाने को भूमि दी जानी चाहिए। -रोशन शाह, उपाध्यक्ष व्यापार मंडल। (फोटो)
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लैंसडौन में पोस्ट एंड टेलीग्राफ विभाग को वर्ष 1946 में डबराल भवन के सामने वाली 60 नाली भूमि आवंटित की गई थी। यह भूमि नगर की आवासीय कॉलोनी के लिए उपयुक्त है। रक्षा मंत्रालय को यह भूमि आवास निर्माण के लिए छावनी परिषद को दी जानी चाहिए। कई पीढि़यों से रह रहे लोगों को आवास योजना का लाभ दिया जाना चाहिए। -पुष्पराज, रंगकर्मी। (फोटो)


छावनी क्षेत्रों के अंतर्गत पड़ने वाली भूमि रक्षा मंत्रालय की होती है। भूमि संबंधी मामलों पर नीति निर्धारण की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय की है। -आनंद दास, जेई छावनी परिषद।
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