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कण्वाश्रम: 1956 में बना भरत स्मारक हुआ जर्जरहाल

Sun, 07 Jan 2018 10:35 PM IST
Updated Sun, 07 Jan 2018 10:35 PM IST
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कण्वाश्रम: 1956 में बना भरत स्मारक हुआ जर्जरहाल
कोटद्वार। कोटद्वार भाबर की मालन घाटी स्थित महर्षि कण्व, विश्वामित्र और दुर्वासा जैसे ऋषि मुनियों की तपस्थली और देश का नाम देने वाले हस्तिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मस्थली कण्वाश्रम की उपेक्षा जारी है। अविभाजित यूपी सरकार ने वर्ष 1956 में कण्वाश्रम की खोज कर यहां महर्षि कण्व, मेनका की पुत्री शकुंतला और उनके पुत्र भरत के परिवार का स्मारक बनाया था। उत्तराखंड सरकार उसका जीर्णोद्धार तक नहीं कर सकी। जीएमवीएन के विश्राम गृह तक पहुंचने के लिए एप्रोच मार्ग का भी बुरा हाल है। पगडंडियों पर चलकर पर्यटक विश्राम गृह तक पहुंच रहे हैं।
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महाकवि कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम में भी मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम का उल्लेख है। मान्यता के अनुसार एक बार हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत आखेट करते हुए मालिनी नदी के किनारे होते हुए कण्वाश्रम आ पहुंचे थे। यहां महर्षि कण्व के आश्रम में उन्होंने रात्रि विश्राम किया। यहां आश्रम में महर्षि विश्वमित्र की पुत्री शकुंतला और राजा दुष्यंत के प्रेम प्रसंग के बाद भरत का जन्म हुआ। उनके नाम पर देश का नाम भारत पड़ा। आजादी के बाद जब कण्वाश्रम को ढूंढने के प्रयास शुरू हुए तो पंडित सदानंद जखमोला, ललिता प्रसाद नैथानी और पौड़ी के तत्कालीन जिलाधिकारी हरीश सिंघल ने मालन नदी के किनारे चौकीघाटा के पास कण्वाश्रम को प्रमाणित किया। उत्तरप्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री डा. संपूर्णानंद ने सन 1956 में वन मंत्री जगमोहन सिंह नेगी के माध्यम से कण्वाश्रम में एक स्मारक का निर्माण कराया। सत्तर साल बाद भी कण्वाश्रम का स्वरूप जस का तस है। तब यहां बना भरत स्मारक जर्जर हाल हो चुका है। पृथक राज्य उत्तराखंड की सरकार यहां एक पुल बनाने के अलावा कुछ नहीं कर सकी। यहां यूपी के समय बने जीएमवीएन के पर्यटक आवास गृह के एप्रोच मार्ग की हालत खराब है। 1977 में बने इस पर्यटक आवास गृह के जीर्णोद्धार के लिए गत वर्ष सरकार ने बजट तो मंजूर किया, लेकिन पूरा पैसा न मिलने से फव्वारा, चाहरदीवारी, कैंटीन के कार्य अधूरे पड़े हैं। भरत शोध संस्थान के अध्यक्ष डा. दिवाकर बेबनी का कहना है कि कोटद्वार में कण्वाश्रम से लेकर भरतनगर-चरेख-दुगड्डा और मोरध्वज किले की परिधि में पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं विद्यमान हैं।
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कण्वाश्रम विकास समिति की महासचिव आभा डबराल कहती हैं कि ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व होने के कारण देशभर से यहां पर्यटक आते तो हैं, लेकिन उन्हें यहां आकर निराश होना पड़ता है।
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कोट
कण्वाश्रम को फोकस करते हुए कोटद्वार क्षेत्र में पर्यटन विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। कण्वाश्रम में झील निर्माण का काम एडीबी के सहयोग से शुरू हो जाएगा। उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद इस योजना के साथ अन्य पर्यटन सुविधाएं भी यहां पर मुहैया करवाएगा।
-केएस नेगी, जिला पर्यटन विकास अधिकारी पौड़ी।
-फोटो
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