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...ऐसे तो मुक्केबाज नहीं मुक्काबाज ही रह जाएंगे खिलाड़ी

Sat, 10 Feb 2018 10:53 PM IST
Updated Sat, 10 Feb 2018 10:53 PM IST
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...ऐसे तो मुक्केबाज नहीं मुक्काबाज ही रह जाएंगे खिलाड़ी
कोटद्वार। राजकीय बाक्सिंग हॉस्टल कोटद्वार के खिलाड़ियों का भविष्य दाव पर लगा है। हॉस्टल अव्यवस्थाओं का शिकार है। हॉस्टल में तीन सालों से स्थायी कोच तो दूर बाक्सिंग रिंग तक नहीं है। आर्मी से सेवानिवृत्त कैप्टन संविदा पर बतौर प्रशिक्षक खिलाड़ियों को तराशने में जूझ रहे हैं। स्थायी कोच और सुविधाओं के अभाव में हॉस्टल के खिलाड़ी सिर्फ मुक्काबाज बनकर रह गए हैं। वे राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में मेडल तालिका में अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं।
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उत्तराखंड में प्रदेश स्तर के चार बाक्सिंग हॉस्टल हैं। लड़कियों का हॉस्टल पिथौरागढ़ में है, जबकि लड़कों का हास्टल टनकपुर, कोटद्वार और देहरादून में है। कोटद्वार स्थित बाक्सिंग हॉस्टल में प्रदेश के अलग-अलग जिलों के 17 खिलाड़ी हैं, जो कि बाक्सिंग में भविष्य बनाने का सपना संयोए हैं। हॉस्टल बुनियादी सुविधाओं से जूझ रहा है। हॉस्टल में बाक्सिंग रिंग और हॉल तक नहीं है। तीन साल से स्थायी कोच की तैनाती नहीं है। खिलाड़ी संविदा के प्रशिक्षक पर निर्भर हैं। आर्मी से सेवानिवृत्त कैप्टन डबल सिंह बतौर प्रशिक्षक नियुक्ति हैं। कैप्टन सुबह और शाम स्टेडियम परिसर में ही हॉस्टल और बाहरी खिलाड़ियों को संयुक्त रूप से ट्रेनिंग देते हैं। हॉस्टल के खिलाड़ी जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में समय समय पर प्रतिभाग करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मेडल तालिका में पीछे रह जाते हैं।
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मुक्काबाज और मुक्केबाज में अंतर
मुक्काबाज फिल्म के अभिनेता जिम्मी शेरगिल ने मुक्केबाज और मुक्काबाज के अंतर को बड़ी आसानी से दर्शकों को दिखाया और समझाया है। जिम्मी शेरगिल ने पिछले दिनों देहरादून में मीडिया कर्मियों से रू-ब-रू होते हुए बताया कि मुक्केबाज हमेशा नियमों के दायरे में रहकर खेलता है। वह पूरी तरह प्रशिक्षित होता है। जबकि मुक्काबाज फ्री स्टाइल मुक्के मारता है। उसे न तो खेल के नियम पता होते हैं और न ही खेल में उसका भविष्य। वह अपने मुक्कों की ताकत के बल पर सामने वाले को चित कर देता है।
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कोट
हॉस्टल में स्थायी कोच, बाक्सिंग रिंग और बाक्सिंग हॉल नहीं है। इसका असर खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर देखने को मिलता है। खिलाड़ी हर प्रतियोगिता में प्रतिभाग करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मेडल नहीं हासिल कर पाते हैं। काम चलाऊ बाक्सिंग रिंग बनाने की कोशिश की है, लेकिन वह काम नहीं आता है।
-जानकी कार्की, उप क्रीड़ा अधिकारी, कोटद्वार बाक्सिंग हॉस्टल

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