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कोटद्वार नगर निगम को वापस ले सरकार
Updated Tue, 21 Nov 2017 10:42 PM IST
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कोटद्वार। नगर निगम विरोध संघर्ष समिति ने 27 नवंबर की महारैली की तैैयारियों के लिए पूरी तरह से कमर कस ली है। नगर निगम के विरोध में भाबर के कई गांवों में मंगलवार को नुक्कड़ सभाओं और जनसंपर्क अभियान का सिलसिला जारी रहा। काशीरामपुर की रामनगर कालोनी में वक्ताओं ने कहा कि कोटद्वार भाबर के अस्सी फीसदी क्षेत्र की सिंचित भूमि में खेती किसानी होती है, जिसके चलते नगर निगम का कोई औचित्य नहीं है। पदाधिकारियों ने क्षेत्रवासियों से 27 की महारैली को सफल बनाने का आह्वान किया।
काशीरामपुर में नुक्कड़ सभा में समिति के महासचिव गोविंद डंडरियाल, उपाध्यक्ष प्रवेंद्र सिंह रावत, विजय ध्यानी, सुरेंद्र भाटिया, सुनीता चौहान, प्रवेंद्र सिंह नेगी, बसंत चौहान और हरीश ग्वाड़ी ने कहा कि जहां एक ओर भारत सरकार गांवों को मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं प्रदेश की भाजपा सरकार ग्राम पंचायतों का वजूद खत्म करने पर तुली है। कहा कि नगर निगम बनाने के पीछे सरकार का मकसद विकास का नहीं है। विकास तो ग्राम पंचायतों के माध्यम से भी हो सकता है, लेकिन सरकार और सत्तारूढ़ दल की नजर भाबर की बेस कीमती खेती और सरकारी जमीन पर लगी है।
वक्ताओं ने कहा कि भाबर की जनता, पंचायत प्रतिनिधियों को किसी भी कीमत पर नगर निगम स्वीकार्य नहीं है। सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए नगर निगम के शासनादेश को वापस लेने की मांग की है। कहा कि ऋषिकेश की तुलना किसी भी हाल में कोटद्वार से नहीं की जा सकती है। ऋषिकेश में एक इंच जमीन भी खेती की नहीं है, जबकि कोटद्वार के 73 गांवों में अस्सी से 90 फीसदी जमीन सिंचित है और वहां पर खेती किसानी होती है।
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काशीरामपुर में नुक्कड़ सभा में समिति के महासचिव गोविंद डंडरियाल, उपाध्यक्ष प्रवेंद्र सिंह रावत, विजय ध्यानी, सुरेंद्र भाटिया, सुनीता चौहान, प्रवेंद्र सिंह नेगी, बसंत चौहान और हरीश ग्वाड़ी ने कहा कि जहां एक ओर भारत सरकार गांवों को मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं प्रदेश की भाजपा सरकार ग्राम पंचायतों का वजूद खत्म करने पर तुली है। कहा कि नगर निगम बनाने के पीछे सरकार का मकसद विकास का नहीं है। विकास तो ग्राम पंचायतों के माध्यम से भी हो सकता है, लेकिन सरकार और सत्तारूढ़ दल की नजर भाबर की बेस कीमती खेती और सरकारी जमीन पर लगी है।
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वक्ताओं ने कहा कि भाबर की जनता, पंचायत प्रतिनिधियों को किसी भी कीमत पर नगर निगम स्वीकार्य नहीं है। सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए नगर निगम के शासनादेश को वापस लेने की मांग की है। कहा कि ऋषिकेश की तुलना किसी भी हाल में कोटद्वार से नहीं की जा सकती है। ऋषिकेश में एक इंच जमीन भी खेती की नहीं है, जबकि कोटद्वार के 73 गांवों में अस्सी से 90 फीसदी जमीन सिंचित है और वहां पर खेती किसानी होती है।
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