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रेत के कट्टों के जुगाड़ से चल रही अंग्रेजों की बनाई बांई खोह नहर
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कोटद्वार। अंग्रेजों के जमाने में कोटद्वार भाबर के गांवों में सिंचाई सुविधा प्रदान करने के लिए बनी खोह नहर प्रणाली आजाद भारत में रेत के कट्टों के जुगाड़ से चल रही है। लगातार दो साल से आपदा झेल रही खोह की बाईं और दाईं नहरों को मरम्मत की दरकार है, लेकिन बजट न मिलने से उनका सुदृढ़ीकरण का काम रुका पड़ा है। नहरें क्षतिग्रस्त होने के कारण इसमें सिंचाई का पर्याप्त पानी नहीं चल पा रहा है। इसका असर खेती पर पड़ रहा है। नहरों की उपेक्षा का खामियाजा काश्तकारों को झेलना पड़ रहा है।
कोटद्वार भाबर का इलाका पौड़ी जिले का एक मात्र कृषि प्रधान क्षेत्र है। यहां आजाद भारत से पूर्व की अंग्रेज सरकार द्वारा खेती किसानी को बढ़ावा देने के लिए तीन प्रमुख सिंचाई प्रणाली विकसित की गईं, जिसमें मालन सिंचाई प्रणाली और खोह सिंचाई प्रणाली प्रमुख हैं। मालन नदी सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। इसके बाद दूसरा नंबर खोह नहर प्रणाली का आता है। कोटद्वार भाबर में अंग्रेजों के समय बनी इन सिंचाई नहरों की कई ब्रांच नहरें आज भी भाबर की खेती के लिए वरदान बनी हुई हैं। दरअसल ये नहर प्रणाली केवल सिंचाई तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि ये पूरे इलाके के लिए ड्रेनेज का काम भी करती थीं। जिन क्षेत्रों में अविभाजित उत्तर प्रदेश सरकार के समय तक काश्तकारों की सिंचाई समस्या को प्रमुखता से लिया जाता रहा, लेकिन उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से नई नहरों का निर्माण तो दूर, पुरानी नहरों के रखरखाव के लिए हमेशा बजट का रोना बना रहा।
कोटद्वार की खोह नदी से दो बाईं और दाई नहरें संचालित होती हैं। साढ़े सात किमी लंबी बाईं खोह नहर से जहां करीब 800 हेक्टेयर का क्षेत्रफल सिंचित होता है, वहीं साढ़े पांच किमी लंबी दाई नहर से 700 हेक्टेयर खेती की सिंचाई होती है। रामपुर निवासी मोहन सिंह रावत, महानंद ध्यानी, सीपी डोबरियाल, कमल सिंह नेगी, गणेेेश अधिकारी कहते हैं कि बाईं खोह नहर का आपदा से बुरा हाल है। कई जगहों पर रेत के कट्टे डालकर पानी चलाया जा रहा है। मानसून में ये नहरें जंगल से आने वाले पानी को भी आबादी में घुसने से रोकती हैं। ग्रास्टनगंज से लेकर सनेह के टेल तक मुख्य नहर और इसकी ब्रांच नहरें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। इन नहरों की मरम्मत नहीं हुई तो मानसून सत्र में ही धान की रोपाई करनी मुश्किल हो जाएगी।
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बाईं खोह नहर की मरम्मत के लिए वर्ष 2017 में नाबार्ड मद में मरम्मत के लिए 4.96 करोड़ का आगणन बनाकर भेजा गया था। बजट नहीं मिला। बजट मिलते ही नहर की मरम्मत शुरू करा दी जाएगी।
-सीपी भट्ट, सहायक अभियंता सिंचाई खंड दुगड्डा।
-फोटो
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कोटद्वार भाबर का इलाका पौड़ी जिले का एक मात्र कृषि प्रधान क्षेत्र है। यहां आजाद भारत से पूर्व की अंग्रेज सरकार द्वारा खेती किसानी को बढ़ावा देने के लिए तीन प्रमुख सिंचाई प्रणाली विकसित की गईं, जिसमें मालन सिंचाई प्रणाली और खोह सिंचाई प्रणाली प्रमुख हैं। मालन नदी सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। इसके बाद दूसरा नंबर खोह नहर प्रणाली का आता है। कोटद्वार भाबर में अंग्रेजों के समय बनी इन सिंचाई नहरों की कई ब्रांच नहरें आज भी भाबर की खेती के लिए वरदान बनी हुई हैं। दरअसल ये नहर प्रणाली केवल सिंचाई तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि ये पूरे इलाके के लिए ड्रेनेज का काम भी करती थीं। जिन क्षेत्रों में अविभाजित उत्तर प्रदेश सरकार के समय तक काश्तकारों की सिंचाई समस्या को प्रमुखता से लिया जाता रहा, लेकिन उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से नई नहरों का निर्माण तो दूर, पुरानी नहरों के रखरखाव के लिए हमेशा बजट का रोना बना रहा।
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कोटद्वार की खोह नदी से दो बाईं और दाई नहरें संचालित होती हैं। साढ़े सात किमी लंबी बाईं खोह नहर से जहां करीब 800 हेक्टेयर का क्षेत्रफल सिंचित होता है, वहीं साढ़े पांच किमी लंबी दाई नहर से 700 हेक्टेयर खेती की सिंचाई होती है। रामपुर निवासी मोहन सिंह रावत, महानंद ध्यानी, सीपी डोबरियाल, कमल सिंह नेगी, गणेेेश अधिकारी कहते हैं कि बाईं खोह नहर का आपदा से बुरा हाल है। कई जगहों पर रेत के कट्टे डालकर पानी चलाया जा रहा है। मानसून में ये नहरें जंगल से आने वाले पानी को भी आबादी में घुसने से रोकती हैं। ग्रास्टनगंज से लेकर सनेह के टेल तक मुख्य नहर और इसकी ब्रांच नहरें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। इन नहरों की मरम्मत नहीं हुई तो मानसून सत्र में ही धान की रोपाई करनी मुश्किल हो जाएगी।
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बाईं खोह नहर की मरम्मत के लिए वर्ष 2017 में नाबार्ड मद में मरम्मत के लिए 4.96 करोड़ का आगणन बनाकर भेजा गया था। बजट नहीं मिला। बजट मिलते ही नहर की मरम्मत शुरू करा दी जाएगी।
-सीपी भट्ट, सहायक अभियंता सिंचाई खंड दुगड्डा।
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