{"_id":"58dfe17b4f1c1b3f0663de86","slug":"the-fifth-navaratri-was-the-son-of-skanda-mata","type":"story","status":"publish","title_hn":"पांचवे नवरात्र को होती स्कंद माता की पुत्र सहित पूजा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पांचवे नवरात्र को होती स्कंद माता की पुत्र सहित पूजा
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Sat, 01 Apr 2017 10:51 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
पांचवे नवरात्र पर भगवती के स्कंद माता स्वरूप की पूजा होती है। स्कंद माता वास्तव में ऐसी भगवती हैं जिन्होंने दुष्टों के संहार के लिए गर्भ धारण किया था। भगवान शिव को अनादि देव होते हुए भी सृष्टि रचने का कार्य पूरा करना पड़ा। पार्वती के गर्भ से कार्तिकेय का जन्म हुआ था। शनिवार को सभी देवी मंदिरों में स्कंद माता स्वरूप की आराधना की गई।
वास्तव में ब्रह्मा विष्णु महेश अनादि देव हैं। इन तीनों की न कोई माता है और न कोई पिता। सृष्टि का संचालन इन्हीं तीनों देवों ने शुरू किया था। इनके पुत्र गर्भ पुत्र नहीं अपितु मानस पुत्र थे। देवों की पत्नियां भी समय आने पर मानस से संतति की रचना करती थी। शिव और पार्वती के मिलन के बगैर ही गणेश का जन्म हो गया था। गणेश की उत्पत्ति पार्वती ने स्वयं अपने शरीर से की थी। दुर्दांत राक्षस ताड़कासुर ने शिव से चालाकी बरतते हुए यह आशीर्वाद ले लिया था कि उसका वध केवल वही कर सकता है, जो शिव के वीर्य से हुआ हो। कालांतर में जब ताड़कासुर ने तमाम पृथ्वी पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए, तब उसका वध करना आदि शक्तियों के लिए जरूरी हो गया। अपने वरदान की लाज रखने के लिए शिव को पार्वती से संसर्ग करना पड़ा। परिणामस्वरूप पार्वती के गर्भ से स्कंद कुमार की उत्पत्ति हुई। आगे चलकर स्कंद कुमार ही कार्तिकेय बने तथा देवासुर संग्राम में देव सेना के सेनापति के रूप में उन्होंने ताड़कासुर का वध कर धरती को कष्टों से मुक्ति दिलाई। स्कंद कुमार की माता होने के कारण पार्वती को स्कंद माता भी कहा गया। आज शनिवार को देश भर के मंदिरों में मां के उसी रूप की पूजा हुई।
स्कंद माता को शास्त्रों में पद्मास्ना भी कहा गया है। स्कंद माता की पूजा बाल रूप में कार्तिकेय के साथ होती है। देवी के सभी मंडपों में माता और पुत्र की आरती उतारी जाती है। मान्यता है कि धरती पर संतानोत्पत्ति भगवान शिव ने ही प्रारंभ की थी। पंचपुरी के मंदिरों में सांयकाल भक्तों की भीड़ उमड़ी। दोपहर के समय स्कंद माता को अनेक प्रकार के मिष्ठान चढ़ाए गए।
वास्तव में ब्रह्मा विष्णु महेश अनादि देव हैं। इन तीनों की न कोई माता है और न कोई पिता। सृष्टि का संचालन इन्हीं तीनों देवों ने शुरू किया था। इनके पुत्र गर्भ पुत्र नहीं अपितु मानस पुत्र थे। देवों की पत्नियां भी समय आने पर मानस से संतति की रचना करती थी। शिव और पार्वती के मिलन के बगैर ही गणेश का जन्म हो गया था। गणेश की उत्पत्ति पार्वती ने स्वयं अपने शरीर से की थी। दुर्दांत राक्षस ताड़कासुर ने शिव से चालाकी बरतते हुए यह आशीर्वाद ले लिया था कि उसका वध केवल वही कर सकता है, जो शिव के वीर्य से हुआ हो। कालांतर में जब ताड़कासुर ने तमाम पृथ्वी पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए, तब उसका वध करना आदि शक्तियों के लिए जरूरी हो गया। अपने वरदान की लाज रखने के लिए शिव को पार्वती से संसर्ग करना पड़ा। परिणामस्वरूप पार्वती के गर्भ से स्कंद कुमार की उत्पत्ति हुई। आगे चलकर स्कंद कुमार ही कार्तिकेय बने तथा देवासुर संग्राम में देव सेना के सेनापति के रूप में उन्होंने ताड़कासुर का वध कर धरती को कष्टों से मुक्ति दिलाई। स्कंद कुमार की माता होने के कारण पार्वती को स्कंद माता भी कहा गया। आज शनिवार को देश भर के मंदिरों में मां के उसी रूप की पूजा हुई।
विज्ञापन
स्कंद माता को शास्त्रों में पद्मास्ना भी कहा गया है। स्कंद माता की पूजा बाल रूप में कार्तिकेय के साथ होती है। देवी के सभी मंडपों में माता और पुत्र की आरती उतारी जाती है। मान्यता है कि धरती पर संतानोत्पत्ति भगवान शिव ने ही प्रारंभ की थी। पंचपुरी के मंदिरों में सांयकाल भक्तों की भीड़ उमड़ी। दोपहर के समय स्कंद माता को अनेक प्रकार के मिष्ठान चढ़ाए गए।
विज्ञापन