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स्वामी चिदानंद का विवादों से पुराना नाता
hridwar uttrakhanda india
Updated Tue, 12 Apr 2016 12:20 AM IST
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चिदानंद का विवादों से पुराना नाता
- फोटो : अमर उजाला
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हरिद्वार। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष चिदानंद मुनि पर गंगा और हरकी पैड़ी की आस्था के साथ खिलवाड़ करने के आरोप लगते रहे हैं। तीर्थ पुरोहितों ने उनके खिलाफ हरकी पैड़ी की गरिमा को कम करने का आरोप लगाते हुए पूर्व में आंदोलन भी छेड़ा था। बाद में पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण के हस्तक्षेप के बाद खत्म हुआ था।
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सिने अभिनेता संजय दत्त करीब एक दशक पूर्व अपने दिवंगत पिता सुनील दत्त की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने के लिए लाए थे तब भी स्वामी चिदानंद मुनि हरिद्वार की उपेक्षा करके उन्हें ऋषिकेश ले गए और उन्होंने वहीं अस्थि विसर्जन कराया। इसके बाद फिल्म निर्माता बोनी कपूर की पत्नी की अस्थियों के विसर्जन के समय भी विवाद हुआ था। इसके अलावा गायक कैलाश खेर समेत कई अन्य से गंगा की आरती कराने को लेकर भी चिदानंद मुनि विवादों में रहे हैं।
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वर्ष 2012 में युवा तीर्थ पुरोहित महासभा के बैनर तले हरिद्वार के पुरोहितों ने चिदानंद मुनि के खिलाफ आंदोलन किया था। शहर व्यापार मंडल सहित कई संस्थाओं ने इस मुद्दे पर आंदोलन का समर्थन किया था। करीब एक पखवाड़े तक चले इस विवाद का पटाक्षेप कनखल दिव्य योग मंदिर में दोनों पक्षों को बिठाकर आचार्य बालकृष्ण ने पांच मार्च 2012 को कराया था। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे युवा तीर्थ पुरोहित महासभा के अध्यक्ष उज्जवल पंडित ने कहा कि उस समय चिदानंद मुनि ने आस्था को ठेस पहुंचाने वाला कार्य नहीं करने की बात कही थी। लेकिन अब नए सिरे से यह विवाद उठ खड़ा हुआ है। युवा तीर्थ पुरोहित फिर से चिदानंद मुनि के खिलाफ आंदोलन का मन बना रहे हैं।
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क्या हैं मान्यता
- राजा सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे, उनकी अस्थियां बहाने के लिए राजा सगर की चार पीढ़ियों ने गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की थी। राजा भगीरथ को गंगा को धरती पर लाने में सफलता मिली थी। तब से यह मान्यता है कि गंगा किनारे कई तीर्थों पर अस्थि प्रवाह किया जाता है, हरिद्वार ऐसे ही तीर्थों मेें से है। अस्थि प्रवाह कराने का अधिकार इन तीर्थों में रहने वाले पंडों को ही है।
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यह अस्थि विसर्जन का विरोध नहीं, आस्था का सर्जन है
हरिद्वार। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि का कहना है कि उन्होंने हरिद्वार में अस्थि विसर्जन का विरोध नहीं किया इसे किसी की आस्था के साथ खिलवाड़ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह तो आस्था का सर्जन है। आधी अस्थियां न बहाने जैसी कोई बात नहीं है। अस्थियों में से चुटकी भर कुछ हिस्सा लेकर उसे पेड़ के साथ रखा जाना अपने पुरखों के प्रति समर्पण और आस्था को दर्शाना है। यह पर्यावरण संरक्षण का भी एक तरीका है। इसे आस्था सर्जन के रूप में देखा जाना चाहिए।