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गंगा तटों पर विदेशी मेहमानों का डेरा
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Sat, 12 Nov 2016 10:17 PM IST
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हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी प्रवासी पक्षी हजारों मील का सफर तय कर गंगा तटों पर पहुंच गए हैं। सबसे पहले आने वालों में ‘पलास गल’ व ‘जल-काग’ यानी काले रंग के पन-कौवे हैं। इनके आने के एक दिन बाद ही नारंगी रंग के चकवा-चकवी के जोड़े भी पहुंच गए हैं। इन दिनों इन्हें गंगा की रेत में आराम फरमाते आसानी से देखा जा सकता है।
पेलिआर्कटिक क्षेत्र यानी मध्य एशिया, मंगोलिया, चीन, साइबेरिया और रूस के पूर्वी क्षेत्रों से हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी प्रतिवर्ष भारत के ताल-तलैयों, झीलों-नदियों के तटों पर हजारों वर्षों से आ रहे हैं। गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता व संवाद लैब के इस वर्ष के ताजा सर्वेक्षण से पता चला है कि ‘पलास गल’ व ‘जल-काग’ नामक पक्षियों का एक-एक ‘फ्लाक’ भीमगोड़ा बैराज व मिस्सरपुर गंगा घाटी पर नवंबर के दूसरे सप्ताह में पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट ने बताया कि चकवा-चकवी का जोड़ा स्थायी रूप से साथ-साथ रहता है और यह पक्षी रात्रि में ही शाकाहारी भोजन करता है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इस पक्षी को ‘पवित्र-पक्षी’ मानते हैं। जैसे राजस्थान के विश्नोई समाज ‘काला मृग’ को पवित्र मृग मानते हैं।
लिहाजा पूरे तिब्बत और अन्य बौद्ध-बाहुल क्षेत्रों में इस पक्षी को मारने की मनाही है। जिसके कारण चकवा-चकवी अभी संकटग्रस्त होने से दूर हैं। प्रो. भट्ट ने बताया कि ‘दूर देश से आई’ चिड़ियाओं में पिनटेल, वाल-क्रीपर, सैंड पाइपर भी हरिद्वार पहुंच चुके हैं। गल्स, टील्स व मैलार्ड का समूह आने के क्रम में हैं। जल्द मानसरोवर झील से चले हुए राजहंस के दीदार भी नवंबर के अंत तक हरिद्वारवासियों को हो सकेंगे।
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इनसेट
पक्षियों का पसंदीदा जगह गंगा घाटी
प्रो. भट्ट ने बताया कि भारतीय उपमहाद्वीप का अधिकतर क्षेत्र उष्ण-शीतोष्ण यानी ‘ट्रोपीकल’ जैसा होने के कारण यह प्रवासी पक्षियों के शीत ऋतु बिताने के लिए उत्तम है। भारत की जैविक विविधता, तालों व झीलों की सर्व व्यापकता, शीतकाल की सुहानी धूप इन परिदों को आदर्श रहन-सहन की स्थिति प्रदान करती है। उत्तरांचल की गंगा घाटी व यमुना घाटी के अतिरिक्त प्रमुख पक्षी विहारों में उड़ीसा की चिल्का झील एवं भरतपुर का केवलादेव नेशनल पार्क अग्रणी हैं। वहां सर्वाधिक संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं।
इसलिए भारत आते हैं प्रवासी पक्षी
प्रो. भट्ट की टीम ने बताया की शरद ऋतु में भूमंडल के उत्तरी क्षत्रों से दक्षिण प्रदेशों में शरद प्रवास का कारण उत्तरी क्षेत्र में दिन-मान का कम होना एवं अत्यधिक ठंड से प्राकृतिक भोजन की कमी, झीलों व तालाबों का बर्फ बन जाना कारण हैं। वापस अपने देशों में जाने के कारणों में मार्च में भारत में ताप व दिनमान बढ़ना प्रमुख है। लेकिन आंतरिक कारणों में पक्षी के मस्तिष्क में स्थित ‘जैविक घड़ी’ द्वारा मार्गदर्शन सुझाया गया है। जैविक घड़ी पक्षियों के मस्तिष्क के ‘हाइपोथेलेमस’ एरिया में स्थित होती है जो कई प्रकार से पक्षियों के माईग्रेशन को निर्देशित करती है। वर्तमान में प्रो. भट्ट की बर्ड वाचिंग टीम में रोबिन, पारूल, दिल्ली विश्वविद्यालय से पक्षियों पर अनुसंधान करने के लिए गुरुकुल आई शोध छात्रा अंकिता सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
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पेलिआर्कटिक क्षेत्र यानी मध्य एशिया, मंगोलिया, चीन, साइबेरिया और रूस के पूर्वी क्षेत्रों से हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी प्रतिवर्ष भारत के ताल-तलैयों, झीलों-नदियों के तटों पर हजारों वर्षों से आ रहे हैं। गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता व संवाद लैब के इस वर्ष के ताजा सर्वेक्षण से पता चला है कि ‘पलास गल’ व ‘जल-काग’ नामक पक्षियों का एक-एक ‘फ्लाक’ भीमगोड़ा बैराज व मिस्सरपुर गंगा घाटी पर नवंबर के दूसरे सप्ताह में पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट ने बताया कि चकवा-चकवी का जोड़ा स्थायी रूप से साथ-साथ रहता है और यह पक्षी रात्रि में ही शाकाहारी भोजन करता है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इस पक्षी को ‘पवित्र-पक्षी’ मानते हैं। जैसे राजस्थान के विश्नोई समाज ‘काला मृग’ को पवित्र मृग मानते हैं।
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लिहाजा पूरे तिब्बत और अन्य बौद्ध-बाहुल क्षेत्रों में इस पक्षी को मारने की मनाही है। जिसके कारण चकवा-चकवी अभी संकटग्रस्त होने से दूर हैं। प्रो. भट्ट ने बताया कि ‘दूर देश से आई’ चिड़ियाओं में पिनटेल, वाल-क्रीपर, सैंड पाइपर भी हरिद्वार पहुंच चुके हैं। गल्स, टील्स व मैलार्ड का समूह आने के क्रम में हैं। जल्द मानसरोवर झील से चले हुए राजहंस के दीदार भी नवंबर के अंत तक हरिद्वारवासियों को हो सकेंगे।
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पक्षियों का पसंदीदा जगह गंगा घाटी
प्रो. भट्ट ने बताया कि भारतीय उपमहाद्वीप का अधिकतर क्षेत्र उष्ण-शीतोष्ण यानी ‘ट्रोपीकल’ जैसा होने के कारण यह प्रवासी पक्षियों के शीत ऋतु बिताने के लिए उत्तम है। भारत की जैविक विविधता, तालों व झीलों की सर्व व्यापकता, शीतकाल की सुहानी धूप इन परिदों को आदर्श रहन-सहन की स्थिति प्रदान करती है। उत्तरांचल की गंगा घाटी व यमुना घाटी के अतिरिक्त प्रमुख पक्षी विहारों में उड़ीसा की चिल्का झील एवं भरतपुर का केवलादेव नेशनल पार्क अग्रणी हैं। वहां सर्वाधिक संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं।
इसलिए भारत आते हैं प्रवासी पक्षी
प्रो. भट्ट की टीम ने बताया की शरद ऋतु में भूमंडल के उत्तरी क्षत्रों से दक्षिण प्रदेशों में शरद प्रवास का कारण उत्तरी क्षेत्र में दिन-मान का कम होना एवं अत्यधिक ठंड से प्राकृतिक भोजन की कमी, झीलों व तालाबों का बर्फ बन जाना कारण हैं। वापस अपने देशों में जाने के कारणों में मार्च में भारत में ताप व दिनमान बढ़ना प्रमुख है। लेकिन आंतरिक कारणों में पक्षी के मस्तिष्क में स्थित ‘जैविक घड़ी’ द्वारा मार्गदर्शन सुझाया गया है। जैविक घड़ी पक्षियों के मस्तिष्क के ‘हाइपोथेलेमस’ एरिया में स्थित होती है जो कई प्रकार से पक्षियों के माईग्रेशन को निर्देशित करती है। वर्तमान में प्रो. भट्ट की बर्ड वाचिंग टीम में रोबिन, पारूल, दिल्ली विश्वविद्यालय से पक्षियों पर अनुसंधान करने के लिए गुरुकुल आई शोध छात्रा अंकिता सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।