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बादल फटने पहले मिलेगी सूचना

Wed, 18 Nov 2015 12:29 AM IST
Updated Wed, 18 Nov 2015 12:29 AM IST
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रुड़की। देश की नदियों और झीलों में भारी बारिश और बादल फटने से आने वाली बाढ़ के खतरों से आगाह करने के लिए आईआईटी रुड़की वैज्ञानिकों की ओर से सेटेलाइट तकनीक पर दिए गए प्रस्तुतिकरण को जल संसाधन मंत्रालय में खूब वाहवाही मिली है। सूत्रों की माने तो मंत्रालय जल्द ही आईआईटी रुड़की को तकनीक पर काम करने जिम्मा सौंपेगा। अब तक की सबसे एडवांस तकनीक के तहत वैज्ञानिक अंतरिक्ष में स्थित नौ सेटेलाइट के माइक्रोवेव सेंसर से बाढ़ और बादल फटने की घटना से एक दिन पहले लोगों को आगाह कर सकेंगे। वैज्ञानिकों ने मंत्रालय को नदियों के समीप आवासीय घरों को एसएमएस के जरिए अलर्ट करने की तकनीक भी सुझाई है।
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गौरतलब है कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने आईआईटी के वैज्ञानिक डा. कमल जैन और डा. नयन शर्मा को विगत चार नवंबर को दिल्ली में तकनीकी के प्रस्तुतिकरण के लिए बुलाया था। प्रस्तुतिकरण के दौरान केंद्रीय मंत्री उमा भारती सहित केंद्रीय जल आयोग के चेयरमैन, सीनियर ज्वाइंट कमिश्नर, गृह मंत्रालय के सचिव एवं अधिकारियों की ओर से तकनीकी का काफी सराहा गया है। सूत्रों की माने तो इस  तकनीक पर काम शुरू करने के लिए मंत्रालय जल्द ही आईआईटी को पत्र सौंपेगा। वैज्ञानिकों ने बताया कि तकनीक के तहत जापान और नासा की ओर से हाल ही में लांच किया गया अंतरराष्ट्रीय सेटेलाइट मिशन जीपीएम (ग्लोबल प्रेसीपिटेशन मीजरमेंट)और भारतीय- फ्रांस के सेटेलाइट मेघा ट्रापिक्स सहित अंतरिक्ष में घूम रही नौ सेटेलाइट के जरिए सटीक जानकारी दी जाएगी। वहीं जीपीएस सिस्टम के जरिए नदियों के पास स्थित आवासीय भवनों को एसएमएस के जरिए अलर्ट किया जा सकेगा।
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आईएमडी से एडवांस होगी तकनीक
माइक्रोवेव सेंसर से दिन में 48 बार प्राप्त होगा डाटा
रुड़की। वैज्ञानिक डा. नयन शर्मा ने बताया कि आईएमडी (इंडिया मैट्रोलाजिकल डिपार्टमेंट) दिल्ली की ओर से जो पूर्वानुमान जारी किया जाता है वह पुरानी तकनीक के आधार पर प्राप्त डाटा को मैथेमेटिक माडलिंग के आधार पर होता है। आईएमडी दिन में तीन बार डाटा के आधार पर पूर्वानुमान जारी करता है। जबकि जीपीएम तकनीक से संबंधित क्षेत्र के प्रत्येक चार किलोमीटर पर प्रत्येक आधा घंटे के अंतराल पर दिन में 48 बार डाटा लिया जाएगा। सेटेलाइट में लगे माइक्रोवेव सेंसर अलग-अलग फ्रिक्वेंसी और वेवलैंथ पर बादलों के बीच से भी डाटा उपलब्ध कराते हैं। जिससे बादलों की स्थिति के आधार पर एक दिन पहले खतरे की सटीक जानकारी दी जा सकेगी।
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चार किलोमीटर ऊंचाई के बादल मचाते हैं तबाही
रुड़की। वैज्ञानिक डा. नयन शर्मा के मुताबिक बादल फटने की घटना उस समय होती है जब इसकी आकाश में चार से छह किलोमीटर ऊंचाई के बादल जमा हो जाते हैं। इसमें पानी की नमी की अधिकता होने के कारण यह फट जाते हैं। सेटेलाइट तकनीक इस अंदेशों को शत प्रतिशत भांपने में सक्षम है।
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