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आफत बन रहे दस के सिक्के
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Tue, 29 Nov 2016 10:16 PM IST
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नोटबंदी से दिक्कत झेल रहे आम आदमी के लिए 10 रुपये के सिक्के परेशानी का सबब बन रहे हैं। बैंकों की मनमानी इस कदर हावी है कि घंटों लाइन में लगे लोगों को सिक्कों से भरी थैली तो थमाई जा रही है, लेकिन बैंक खुद सिक्के लेने को तैयार नहीं है। जिससे बाजारों में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। दुकानदार ग्राहकों से सिक्के लेने में आनाकानी कर रहे हैं।
एक हजार और पांच सौ रुपये के पुराने नोट बंद होने के बाद से लोग लगातार मुसीबत झेल रही है। बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लंबी लाइनें छोटी होने का नाम नहीं ले रही हैं। ताज्जुब की बात यह है कि लोगों को राहत पहुंचाने के जितने दावे किए जा रहे हैं, उन पर धरातल पर कोई अमल होता नजर नहीं आ रहा है। अब 10 रुपये के सिक्के लोगों की परेशानी को कई गुना बढ़ा रहे हैं। लोग घंटों लाइन में लगकर जैसे तैसे बैंक के अंदर पहुुंचते हैं और वहां कुछ नोटों के साथ सिक्कों से भरी थैली उन्हें पकड़ाई जा रही है। सिक्के लेने से मना करने पर नोट भी वापस लेने का डर दिखाया जाता है।
घंटों लाइन लगने की मेहनत बेकार न जाने देने के लिए लोग मजबूरन सिक्के ले लेते हैं, लेकिन यदि कोई ग्राहक नोटों के साथ 10 रुपये के सिक्के बैंक में जमा करने जाता है तो बैंक हाथ खड़े कर रहे हैं। वहीं बाजार में भी दुकानदार ग्राहकों से सिक्के लेने को राजी नहीं हैं।
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उनका तर्क है कि जब बैंक ही सिक्के नहीं ले रहे हैं तो हम कैसे ले सकते हैं। ज्वालापुर देवतान निवासी शगुन भगत ने बताया कि उन्हें बैंक से रुपये निकालने पर उन्हें करीब एक हजार के 10 रुपये के सिक्कों से भरी थैली दे दी गई। मगर बाजार में कोई इन सिक्कों को नहीं ले रहा है। कनखल के वासुदेव, भेल के धर्मेंद्र गुप्ता का कहना है कि बैंकों की मनमानी पर लगाम लगनी चाहिए। तब जाकर लोगों को राहत मिल सकती है।
सिक्के न लेने पर कार्रवाई के दावे हवाई
नोटबंदी के बाद हो रही मैराथन बैठकों में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि सिक्कों को प्रचलन में लाया जाए। सिक्के लेने से मना करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें। लेकिन बैंक खुद इन दिशा निर्देशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। कार्रवाई के दावे हवा हवाई साबित हो रहे हैं।
मांगने वालों को ही दे रहे सिक्के
हरिद्वार के एलडीएम केएस पॉल का कहना है कि सिक्कों को लेकर कुछ शिकायतें तो मिली हैं। ऐसे में बैंक प्रबंधकों को किसी को भी जबरदस्ती सिक्के देने से मना कर दिया गया है। मांगने वालों को ही सिक्के दिए जा रहे हैं। अब तो बैंकों में कैश है ही नही। सिक्के भी नहीं हैं। इसलिए अब शिकायत नहीं आएगी।
एक हजार और पांच सौ रुपये के पुराने नोट बंद होने के बाद से लोग लगातार मुसीबत झेल रही है। बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लंबी लाइनें छोटी होने का नाम नहीं ले रही हैं। ताज्जुब की बात यह है कि लोगों को राहत पहुंचाने के जितने दावे किए जा रहे हैं, उन पर धरातल पर कोई अमल होता नजर नहीं आ रहा है। अब 10 रुपये के सिक्के लोगों की परेशानी को कई गुना बढ़ा रहे हैं। लोग घंटों लाइन में लगकर जैसे तैसे बैंक के अंदर पहुुंचते हैं और वहां कुछ नोटों के साथ सिक्कों से भरी थैली उन्हें पकड़ाई जा रही है। सिक्के लेने से मना करने पर नोट भी वापस लेने का डर दिखाया जाता है।
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घंटों लाइन लगने की मेहनत बेकार न जाने देने के लिए लोग मजबूरन सिक्के ले लेते हैं, लेकिन यदि कोई ग्राहक नोटों के साथ 10 रुपये के सिक्के बैंक में जमा करने जाता है तो बैंक हाथ खड़े कर रहे हैं। वहीं बाजार में भी दुकानदार ग्राहकों से सिक्के लेने को राजी नहीं हैं।
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उनका तर्क है कि जब बैंक ही सिक्के नहीं ले रहे हैं तो हम कैसे ले सकते हैं। ज्वालापुर देवतान निवासी शगुन भगत ने बताया कि उन्हें बैंक से रुपये निकालने पर उन्हें करीब एक हजार के 10 रुपये के सिक्कों से भरी थैली दे दी गई। मगर बाजार में कोई इन सिक्कों को नहीं ले रहा है। कनखल के वासुदेव, भेल के धर्मेंद्र गुप्ता का कहना है कि बैंकों की मनमानी पर लगाम लगनी चाहिए। तब जाकर लोगों को राहत मिल सकती है।
सिक्के न लेने पर कार्रवाई के दावे हवाई
नोटबंदी के बाद हो रही मैराथन बैठकों में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि सिक्कों को प्रचलन में लाया जाए। सिक्के लेने से मना करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें। लेकिन बैंक खुद इन दिशा निर्देशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। कार्रवाई के दावे हवा हवाई साबित हो रहे हैं।
मांगने वालों को ही दे रहे सिक्के
हरिद्वार के एलडीएम केएस पॉल का कहना है कि सिक्कों को लेकर कुछ शिकायतें तो मिली हैं। ऐसे में बैंक प्रबंधकों को किसी को भी जबरदस्ती सिक्के देने से मना कर दिया गया है। मांगने वालों को ही सिक्के दिए जा रहे हैं। अब तो बैंकों में कैश है ही नही। सिक्के भी नहीं हैं। इसलिए अब शिकायत नहीं आएगी।