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खुली किताब भी रही नगरपालिका
Haridwar
Updated Mon, 22 Apr 2013 05:30 AM IST
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हरिद्वार। 26 साल तक नगरपालिका का पूरा कामकाज खुली किताब की भांति रहा। यही वजह है उस समय जो नियम बने और काम हुए उसे आज तक याद किया जाता है। लेकिन, जैसे-जैसे इसमें भ्रष्टाचार घर करता गया किताब के पन्ने बंद होते गए। आज स्थिति यह है बोर्ड बैठक तक के प्रस्ताव जनता के सामने लाने में प्रतिनिधि कतराते हैं।
वर्ष 1946 से 1972 तक नगरपालिका का कामकाज और कार्रवाई खुली किताब की तरह रहता था। उसकी बैठकों में जो भी प्रस्ताव पास होते थे उन प्रस्तावों पर किस सभासद की क्या राय थी अखबारों में प्रकाशन कराकर जनता को जानकारी दी जाती थी। पक्ष-विपक्ष को बराबर जगह दी जाती थी। किसी प्रस्ताव के संबंध में नागरिकों की ओर से आने वाले सुझाव और विरोध को भी आदर के साथ बैठक के दौरान अध्यक्ष द्वारा विचार के लिए सदन में रखा जाता था। वर्ष 1972 में नगरपालिका सुपरसीट हुई। इसके 17 साल बाद 1989 में फिर चुनाव कराकर पालिका को जनप्रतिनिधियों को सौंपा गया। तब तक देश नवउदारवाद के भ्रष्टाचार से दौर पर चल पड़ा था। इससे नगरपालिका भी अछूती नहीं रही। जनप्रतिनिधियों ने उसकी संपत्तियों को स्वयं और अपने चहेतों से खुर्द-बुर्द करना शुरू किया। किस तरह कमाई की जाए इसकी रहा चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने पकड़नी शुरू की। इस नए दौर के बाद पालिका की बैठकों की कार्यवाही और सभासदों की राय का प्रकाशन कर सार्वजनिक करना बंद कर दिया गया। क्योंकि जो वह जनता में कहते थे वह करते नहीं थे। इसलिए कार्यवाही को छिपाने का दौर शुरू हुआ। वर्ष 1995 में राजकुमार अरोड़ा के समय से बोर्ड बैठकों की कार्रवाई लिखने का काम भी गुप्त हो गया था। इस परंपरा को आगे सभी ने जारी रखा है।
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वर्ष 1946 से 1972 तक नगरपालिका का कामकाज और कार्रवाई खुली किताब की तरह रहता था। उसकी बैठकों में जो भी प्रस्ताव पास होते थे उन प्रस्तावों पर किस सभासद की क्या राय थी अखबारों में प्रकाशन कराकर जनता को जानकारी दी जाती थी। पक्ष-विपक्ष को बराबर जगह दी जाती थी। किसी प्रस्ताव के संबंध में नागरिकों की ओर से आने वाले सुझाव और विरोध को भी आदर के साथ बैठक के दौरान अध्यक्ष द्वारा विचार के लिए सदन में रखा जाता था। वर्ष 1972 में नगरपालिका सुपरसीट हुई। इसके 17 साल बाद 1989 में फिर चुनाव कराकर पालिका को जनप्रतिनिधियों को सौंपा गया। तब तक देश नवउदारवाद के भ्रष्टाचार से दौर पर चल पड़ा था। इससे नगरपालिका भी अछूती नहीं रही। जनप्रतिनिधियों ने उसकी संपत्तियों को स्वयं और अपने चहेतों से खुर्द-बुर्द करना शुरू किया। किस तरह कमाई की जाए इसकी रहा चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने पकड़नी शुरू की। इस नए दौर के बाद पालिका की बैठकों की कार्यवाही और सभासदों की राय का प्रकाशन कर सार्वजनिक करना बंद कर दिया गया। क्योंकि जो वह जनता में कहते थे वह करते नहीं थे। इसलिए कार्यवाही को छिपाने का दौर शुरू हुआ। वर्ष 1995 में राजकुमार अरोड़ा के समय से बोर्ड बैठकों की कार्रवाई लिखने का काम भी गुप्त हो गया था। इस परंपरा को आगे सभी ने जारी रखा है।
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