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हांडा दंपति के हठ से ‘बोल’ पड़ी गूंगी-बहरी दुनिया
Haridwar
Updated Mon, 03 Dec 2012 05:30 AM IST
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रुड़की। बेटे की बोल-सुन न पाने की लाचारी का इलाज दुनिया में कहीं नहीं मिला तो हांडा दंपति ने खुद ही उसका हल तलाशना शुरू किया। अपने प्रयासों के बूते उन्होंने न सिर्फ अपने लाचार बेटे को कामयाबी की मंजिल दिलाई। बल्कि कई मूक-बधिर बच्चों को भी दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की राह दिखाई।
आईआईटी रुड़की के रिटायर्ड प्रोफेसर डा. एससी हांडा और उनकी पत्नी मिसेज किरण हांडा ने आईआईटी रुड़की की मदद से सन 1989 में आईआईटी कैंपस में मूक-बधिर बच्चों के लिए एक स्कूल का निर्माण करवाया। डा. हांडा और उनकी पत्नी बताती हैं कि बीमारी के कारण उनके बेटे विवेक की तीन साल की उम्र में सुनने और बोलने की शक्ति खत्म हो गई। उसके लिए इलाज के लिए वह अमेरिका तक भी गए। लेकिन बीमारी का इलाज नहीं मिला। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और खुद ही इसका हल तलाशने में जुट गए। बेटे को कामयाब बनाने के लिए उन्होंने मूक-बधिर बच्चों को सिखाने के लिए मुंबई में ट्रेनिंग ली। इसके बाद दोनों यूएसए गए। उस समय पर मूक-बधिर बच्चों पर रिसर्च के लिए आईआईटी में स्कूल खोलने की बात चल रही थी। इस बात का पता चलने पर उन्होंने इस स्कूल को खुद बनाने और चलाने का जिम्मा लिया। आईआईटी प्रशासन ने इसके लिए कैंपस में उन्हें भूमि दी। उन्होंने स्कूल का मॉडल तैयार किया। खुद ही मूक-बधिर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद इस काम में उनके साथ लोग जुड़ते गए।
अनुश्रुति बना रहा मूक-बधिर को स्वावलंबी
आईआईटी रुड़की स्थित अनुश्रुति स्कूल मूक-बधिर बच्चों को समाज में एक अलग पहचान दिला रहा है। स्कूल की प्रधानाचार्य पार्वती पांडे बताती हैं कि स्कूल में कक्षा एक से आठ तक एनईआरटी का कोर्स है। कक्षा नौ से 12 तक नेशनल ओपन बोर्ड से पढ़ाई कराई जाती है। बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए मोमबत्ती बनाना, खाना बनाना, पेंटिंग, मॉडर्न बैग आदि तमाम बातें सिखाई जाती हैं।
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विवेक समेत कई लोग सरकारी सर्विस में
डा. हांडा और उनकी पत्नी के प्रयास से उनका बेटा अन्य बच्चों की तरह ही पढ़ा और अब वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में सर्विस करता है। यही नहीं इस स्कूल के दीपक बहादुर भी बैंक और पीयूष पोस्ट ऑफिस में अन्य कर्मचारियों की तरह की काम करते हैं। अमित जैन रुड़की में अपना बिजनेस चला रहे हैं।
स्कूल में नहीं ली जाती है कोई फीस
अनुश्रुति विद्यालय में किसी भी छात्र से फीस नहीं ली जाती है। इसका पूरा खर्च स्कूल की प्रबंध समिति वहन करती है। स्कूल में 20 टीचर्स हैं। 100 से अधिक बच्चे हैं। जो रुड़की, मुजफ्फरनगर, देवबंद, सहारनपुर, भगवानपुर, हरिद्वार, देहरादून आदि से आते हैं।
होंठो से समझकर, समझाते हैं इशारों से
मूक-बधिर बच्चे भले ही कान से सुन नहीं सकते और मुंह से बोल नहीं पाते हाें। लेकिन वह दूसरों की बात उनके होंठों के हिलने से समझ लेते हैं। इसे ‘लीप रीडिंग’ करते हैं। अपनी बात को समझाने के लिए यह लोग हाथ से इशारे करते हैं। जरूरत पड़ने पर लिख कर समझा देते हैं। इनकी सोचने और समझने की क्षमता अक्सर सामान्य व्यक्ति से अधिक होती है।
डोनेशन पर चलता है स्कूल का खर्च
अनुश्रुति विद्यालय का सारा खर्च डोनेशन में आने वाली धनराशि से उठाया जाता है। इसकी देखरेख के लिए एक प्रबंध समिति बनी है। जिसके संरक्षक आईआईटी के डायरेक्टर एवं उनकी पत्नी अध्यक्ष होती है।
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आईआईटी रुड़की के रिटायर्ड प्रोफेसर डा. एससी हांडा और उनकी पत्नी मिसेज किरण हांडा ने आईआईटी रुड़की की मदद से सन 1989 में आईआईटी कैंपस में मूक-बधिर बच्चों के लिए एक स्कूल का निर्माण करवाया। डा. हांडा और उनकी पत्नी बताती हैं कि बीमारी के कारण उनके बेटे विवेक की तीन साल की उम्र में सुनने और बोलने की शक्ति खत्म हो गई। उसके लिए इलाज के लिए वह अमेरिका तक भी गए। लेकिन बीमारी का इलाज नहीं मिला। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और खुद ही इसका हल तलाशने में जुट गए। बेटे को कामयाब बनाने के लिए उन्होंने मूक-बधिर बच्चों को सिखाने के लिए मुंबई में ट्रेनिंग ली। इसके बाद दोनों यूएसए गए। उस समय पर मूक-बधिर बच्चों पर रिसर्च के लिए आईआईटी में स्कूल खोलने की बात चल रही थी। इस बात का पता चलने पर उन्होंने इस स्कूल को खुद बनाने और चलाने का जिम्मा लिया। आईआईटी प्रशासन ने इसके लिए कैंपस में उन्हें भूमि दी। उन्होंने स्कूल का मॉडल तैयार किया। खुद ही मूक-बधिर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद इस काम में उनके साथ लोग जुड़ते गए।
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अनुश्रुति बना रहा मूक-बधिर को स्वावलंबी
आईआईटी रुड़की स्थित अनुश्रुति स्कूल मूक-बधिर बच्चों को समाज में एक अलग पहचान दिला रहा है। स्कूल की प्रधानाचार्य पार्वती पांडे बताती हैं कि स्कूल में कक्षा एक से आठ तक एनईआरटी का कोर्स है। कक्षा नौ से 12 तक नेशनल ओपन बोर्ड से पढ़ाई कराई जाती है। बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए मोमबत्ती बनाना, खाना बनाना, पेंटिंग, मॉडर्न बैग आदि तमाम बातें सिखाई जाती हैं।
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विवेक समेत कई लोग सरकारी सर्विस में
डा. हांडा और उनकी पत्नी के प्रयास से उनका बेटा अन्य बच्चों की तरह ही पढ़ा और अब वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में सर्विस करता है। यही नहीं इस स्कूल के दीपक बहादुर भी बैंक और पीयूष पोस्ट ऑफिस में अन्य कर्मचारियों की तरह की काम करते हैं। अमित जैन रुड़की में अपना बिजनेस चला रहे हैं।
स्कूल में नहीं ली जाती है कोई फीस
अनुश्रुति विद्यालय में किसी भी छात्र से फीस नहीं ली जाती है। इसका पूरा खर्च स्कूल की प्रबंध समिति वहन करती है। स्कूल में 20 टीचर्स हैं। 100 से अधिक बच्चे हैं। जो रुड़की, मुजफ्फरनगर, देवबंद, सहारनपुर, भगवानपुर, हरिद्वार, देहरादून आदि से आते हैं।
होंठो से समझकर, समझाते हैं इशारों से
मूक-बधिर बच्चे भले ही कान से सुन नहीं सकते और मुंह से बोल नहीं पाते हाें। लेकिन वह दूसरों की बात उनके होंठों के हिलने से समझ लेते हैं। इसे ‘लीप रीडिंग’ करते हैं। अपनी बात को समझाने के लिए यह लोग हाथ से इशारे करते हैं। जरूरत पड़ने पर लिख कर समझा देते हैं। इनकी सोचने और समझने की क्षमता अक्सर सामान्य व्यक्ति से अधिक होती है।
डोनेशन पर चलता है स्कूल का खर्च
अनुश्रुति विद्यालय का सारा खर्च डोनेशन में आने वाली धनराशि से उठाया जाता है। इसकी देखरेख के लिए एक प्रबंध समिति बनी है। जिसके संरक्षक आईआईटी के डायरेक्टर एवं उनकी पत्नी अध्यक्ष होती है।