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कर्म की पवित्रता का मार्ग प्रशस्त करती है गीता: विज्ञानांद सरस्वती
Updated Mon, 07 May 2018 10:36 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
गीता सृष्टि का सार्वभौमिक ग्रंथ है। यह संपूर्ण मानवता को कर्म की पवित्रता के धर्म निर्वाह का मार्ग प्रशस्त करती है। गीता सामान्य ग्रंथ न होकर भगवान श्रीकृष्ण की वाणी है। ये उद्गार श्रीगीता विज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती ने विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीता विज्ञान आश्रम ट्रस्ट की ओर से आयोजित गीता ज्ञान गोष्ठी में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भगवान ने स्वयं अर्जुन को उपदेश देकर माया, मोह एवं परिवारिक बंधनों को तोड़कर कर्म करने की प्रेरणा दी थी। उन्हाेंने कहा कि धर्म ही व्यक्ति को सत्कर्म की प्रेरणा देता है और जिनका कोई धर्म नहीं होता उनके कर्म की कोई सार्थकता नहीं होती है। तीर्थस्थल एवं गंगातट पर किए गए जप, तप एवं अनुष्ठान को सहस्त्र गुना अधिक पुण्यफलदायी बताते हुए कहा कि अधिमास में धार्मिक कार्यक्रमों का महत्व और भी अधिक हो जाता है। कहा कि यथा राजा तथा प्रजा और सच्चा राजधर्म वही होता है जब राजा अपनी प्रजा की भलाई के लिए सदैव तत्पर रहे जबकि संत एवं गुरुओं का कार्य सद्मार्ग की प्रेरणा देना होता है।
महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती ने कहा कि संस्कार और संस्कृति ही सनातन धर्म की पहचान है। धरती का एकमात्र धर्म सनातन धर्म है जो अपने संस्कार एवं संस्कृति के लिए संपूर्ण विश्व में अलग पहचान रखता है। उन्होंने कहा कि कार्य की पवित्रता ही व्यक्ति के धर्म की पहचान होती है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए तभी समाज और राष्ट्र में विशिष्ट स्थान की पात्रता प्राप्त करेगी।
हरिद्वार।
गीता सृष्टि का सार्वभौमिक ग्रंथ है। यह संपूर्ण मानवता को कर्म की पवित्रता के धर्म निर्वाह का मार्ग प्रशस्त करती है। गीता सामान्य ग्रंथ न होकर भगवान श्रीकृष्ण की वाणी है। ये उद्गार श्रीगीता विज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती ने विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीता विज्ञान आश्रम ट्रस्ट की ओर से आयोजित गीता ज्ञान गोष्ठी में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भगवान ने स्वयं अर्जुन को उपदेश देकर माया, मोह एवं परिवारिक बंधनों को तोड़कर कर्म करने की प्रेरणा दी थी। उन्हाेंने कहा कि धर्म ही व्यक्ति को सत्कर्म की प्रेरणा देता है और जिनका कोई धर्म नहीं होता उनके कर्म की कोई सार्थकता नहीं होती है। तीर्थस्थल एवं गंगातट पर किए गए जप, तप एवं अनुष्ठान को सहस्त्र गुना अधिक पुण्यफलदायी बताते हुए कहा कि अधिमास में धार्मिक कार्यक्रमों का महत्व और भी अधिक हो जाता है। कहा कि यथा राजा तथा प्रजा और सच्चा राजधर्म वही होता है जब राजा अपनी प्रजा की भलाई के लिए सदैव तत्पर रहे जबकि संत एवं गुरुओं का कार्य सद्मार्ग की प्रेरणा देना होता है।
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महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती ने कहा कि संस्कार और संस्कृति ही सनातन धर्म की पहचान है। धरती का एकमात्र धर्म सनातन धर्म है जो अपने संस्कार एवं संस्कृति के लिए संपूर्ण विश्व में अलग पहचान रखता है। उन्होंने कहा कि कार्य की पवित्रता ही व्यक्ति के धर्म की पहचान होती है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए तभी समाज और राष्ट्र में विशिष्ट स्थान की पात्रता प्राप्त करेगी।
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