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कांग्रेस सरकार ने वापस लिया था शांतिकुंज के खिलाफ दायर मुकदमा
Updated Fri, 29 Jun 2018 12:05 AM IST
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हरिद्वार। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी पर व्यक्तिगत टिप्पणी कर देशभर में सुर्खियां बंटोर रहे आध्यात्मिक संस्था शांतिकुंज के प्रमुख डा. प्रणव पंड्या के अहम साधकों के खिलाफ दर्ज मुकदमा तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ही वापस लिया था। राज्य सरकार के इस फैसले ने शांतिकुंज के प्रबंधन को बड़ी राहत दी थी। आज भले ही डा. पंड्या को राहुल की शक्ल और कांग्रेस की नीतियां पसंद न आ रहीं हों। लेकिन उस दौर में शांतिकुंज प्रबंधन ने कांग्रेसी नेताओं के यहां खूब चक्कर लगाए।
दरअसल, वर्ष 2011 में नवंबर माह में शांतिकुंज संस्था ने बड़ा आयोजन किया गया था। मौका संस्था के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा की जनशताब्दी का था। लिहाजा, देशभर के कोने कोने से संस्था के अनुयायी शांतिकुंज पहुंचे थे। इसी आयोजन के दौरान लालजीवाला में यज्ञशाला में भरे धुएं से मची भगदड़ में 21 श्रद्धालु स्वर्ग सिधार गए थे। भारी संख्या में श्रद्धालु घायल हुए थे। कई परिवारों को ताउम्र सालने वाला दर्द मिला था। उस वक्त उत्तराखंड में भाजपा की सरकार थी। तब शांतिकुंज के प्रमुख चेहरों के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुआ था।
लेकिन समय गुजरने के साथ वर्ष 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस ने सूबे की सत्ता संभाली। वर्ष 2015 में उस वक्त सीएम रहे हरीश रावत ने 21 आमजन की मौत जैसे बड़े हादसे के केस को वापस लेने का आदेश दिया था। सभी मृतक गैर प्रदेशों के थे और संभवत: गरीब तबके से जुड़े थे। लिहाजा कोई पैरवी के लिए आगे नहीं आया। उस वक्त रावत सरकार ने यह फैसला केवल शांतिकुंज के प्रमुख चेहरों को बचाने के लिए ही किया था, जिनका जेल जाना लगभग तय माना जा रहा था।
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अब उसी संस्था के प्रमुख ने उनके सेवादारों को नई जिंदगी देने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष के चेहरे पर टिप्पणी कर नई बहस छेड़ दी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के ओएसडी रहे पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि शांतिकुंज के अफसरों ने मुकदमा वापसी के बारे में कई बार उनसे भी संपर्क किया था। अब डा. प्रणव पंड्या द्वारा इस तरह का बयान दिया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
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दरअसल, वर्ष 2011 में नवंबर माह में शांतिकुंज संस्था ने बड़ा आयोजन किया गया था। मौका संस्था के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा की जनशताब्दी का था। लिहाजा, देशभर के कोने कोने से संस्था के अनुयायी शांतिकुंज पहुंचे थे। इसी आयोजन के दौरान लालजीवाला में यज्ञशाला में भरे धुएं से मची भगदड़ में 21 श्रद्धालु स्वर्ग सिधार गए थे। भारी संख्या में श्रद्धालु घायल हुए थे। कई परिवारों को ताउम्र सालने वाला दर्द मिला था। उस वक्त उत्तराखंड में भाजपा की सरकार थी। तब शांतिकुंज के प्रमुख चेहरों के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुआ था।
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लेकिन समय गुजरने के साथ वर्ष 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस ने सूबे की सत्ता संभाली। वर्ष 2015 में उस वक्त सीएम रहे हरीश रावत ने 21 आमजन की मौत जैसे बड़े हादसे के केस को वापस लेने का आदेश दिया था। सभी मृतक गैर प्रदेशों के थे और संभवत: गरीब तबके से जुड़े थे। लिहाजा कोई पैरवी के लिए आगे नहीं आया। उस वक्त रावत सरकार ने यह फैसला केवल शांतिकुंज के प्रमुख चेहरों को बचाने के लिए ही किया था, जिनका जेल जाना लगभग तय माना जा रहा था।
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अब उसी संस्था के प्रमुख ने उनके सेवादारों को नई जिंदगी देने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष के चेहरे पर टिप्पणी कर नई बहस छेड़ दी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के ओएसडी रहे पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि शांतिकुंज के अफसरों ने मुकदमा वापसी के बारे में कई बार उनसे भी संपर्क किया था। अब डा. प्रणव पंड्या द्वारा इस तरह का बयान दिया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।