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संवेदनशील नहीं हैं उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलें
दीपक मिश्रा
Updated Wed, 17 Jul 2013 09:35 AM IST
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उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से कोई खतरा नहीं है। सामान्य स्थिति में कोई भी झील नहीं टूटेगी। भूकंप और बादल फटने जैसी घटनाओं से ही ग्लेशियर झीलों को नुकसान हो सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रदेश की कोई भी झील संवेदनशील नहीं है।
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हिमालय क्षेत्र में कई हजार ग्लेशियर झीलें हैं। पिछले कुछ दशकों से जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लेशियर का जीवन चक्र प्रभावित हुआ है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जिससे ग्लेशियर झीलों में पानी बढ़ रहा है।
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राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (एनआईएच) रुड़की के वैज्ञानिक डा. संजय जैन और डा. अनिल कुमार लोहानी ने बताया कि ग्लेशियर पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ा है। लेकिन उत्तराखंड की झीलें संवेदनशील नहीं हैं।
झीलों की प्राकृतिक स्थिति ठीक है। यदि ग्लेशियर झीलों की सामान्य प्रक्रिया चलती रही तो कोई झील नहीं टूटेगी। लेकिन यदि कोई भूकंप का बड़ा झटका या फिर कोई बड़ा क्लाउडब्रस्ट (बादल फटना) होता है तो झीलों को नुकसान हो सकता है।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इनटेग्रेटिड माउंटेन डेवलपमेंट, काठमांडू, नेपाल ने भी अपनी रिपोर्ट में उत्तराखंड की किसी भी ग्लेशियर झील को संवेदनशील नहीं बताया है।
प्रदेश में हैं 127 ग्लेशियर झील
एनआईएच वैज्ञानिकों ने बताया कि उत्तराखंड में 127 ग्लेशियर झीलें हैं। जिनका एरिया 2.49 वर्ग किलोमीटर है। ये झीलें यमुना, भागीरथी, अलकनंदा और काली नदियों पर हैं। कुछ छोटी आर्टिफिशियल झील के डेवलप होने की बात सामने आ रही है। लेकिन इनकी संख्या और स्थान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
हिमाचल प्रदेश में 156 ग्लेशियर झीलें हैं। जिनका क्षेत्रफल 385 वर्ग किलोमीटर है। इनमें से 16 झील संवेदनशील हैं।
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