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आपदा से गंगा भी कराह उठी
रुड़की/ब्यूरो
Updated Mon, 08 Jul 2013 04:03 PM IST
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पहाड़ में आई जल प्रलय से मानव जाति ही नहीं गंगा भी कराह उठी है। गंगा में प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि वह हरिद्वार से निकलते ही डुबकी लगाने लायक भी नहीं बची है। आचमन के लिए लायक तो वह बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी।
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उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्पेशल मानीटरिंग में चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। अधिकारियों का मानना है कि जल प्रलय में बहे लोगों और दूसरी चीजों से गंदा ज्यादा प्रदूषित हुई है।
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पहाड़ों में डराने वाली नदियों की लहरें गंगा में मिलने के बाद हरिद्वार पहुंचने तक खुद कराहने लगी है। गंगा का पानी वर्तमान समय में बहुत ज्यादा गंदा है। हालत यह हो गई कि गंगा डुबकी लगाने लायक भी नहीं बची है।
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पहाड़ों में आई जल प्रलय और बड़ी संख्या में लोगों के नदियों में बहने के बाद उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गंगा के प्रदूषण जांचने के लिए स्पेशल मानीटरिंग शुरू की थी। यह मानीटरिंग का काम ऋषिकेश और हरिद्वार में एक साथ किया गया।
दस दिन तक चली मानीटरिंग आंकड़े चिंताजनक सामने आए हैं। हरिद्वार की अपेक्षा ऋषिकेश पानी प्रदूषित होने के आंकड़े कुछ कम रहे लेकिन वहां भी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। हरिद्वार में जगजीतपुर स्थित मिसरपुर से गंगाजल के सैंपल लेकर जांच की गई।
गंगा के पानी में घुलित आक्सिजन को छोड़कर बाकी चीजें मानक से काफी ज्यादा पाए गए हैं। जो शरीर के लिए हानिकारक साबित होते हैं।
यह है गंगा की स्थितिः
1-घुलित आक्सिजन की मात्रा-5.8 एमएल प्रति लीटर।
2-बीओडी (बायोलाजिकल आक्सीजन डिमांड) की मात्रा-3.9 मिलीग्राम प्रतिलीटर, जबकि यह मात्रा 3 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
3-कीटाणु क्लोफोर्म की मात्रा 1350, जो एक हजार से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
4-गंगा के पानी में अमल की मात्रा 8.3 पाई गई जोकि 6.5 हानी चाहिए।
5-टोटल डायजौल सॉलिड की मात्रा 220 पाई गई तो मानक से ज्यादा है।
'पीसीबी ने हरिद्वार से आगे जगजीतपुर के पास से गंगा के पानी के सैंपल लेकर जांच की है। यहां पर गंगा का पानी पीने तो क्या नहाने लायक भी नहीं बचा है। बीओडी में आर्गनिक मैटर ज्यादा पाए गए और ऐसे पानी में नहाने से त्वचा से संबंधित रोग हो सकते हैं।'
डॉ. अंकुर कंसल, आरओ, पीसीबी रुड़की