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ये तरीका अपनाएं, पीने के काम आएगा गंदा पानी
हरिद्वार/योगेश योगी
Updated Fri, 24 May 2013 08:02 AM IST
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घर के किचन और स्नानागार से निकला पानी बर्बाद होकर नालियों में चला जाता है। लेकिन प्राचीन पद्धति को अपनाकर इसे पेयजल जितना शुद्ध बनाया जा सकता है।
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हरिद्वार के गायत्री पीठ शांतिकुंज ने अपने भोजनालय से निकलने वाले पानी को संरक्षित और शुद्धकर यह अनूठा प्रयोग किया है। शांतिकुंज की ओर से प्रतिदिन करीब दो हजार लीटर पानी को अपव्यय होने से बचाया जा रहा है।
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शांतिकुंज की ओर से इसी पानी को विभिन्न चरणों में साफ करके एक बड़े से अंडरग्राउंड टैंक में एकत्र किया जाता है। मोटर के जरिए इस पानी को पंप करके बागवानी आदि की सिंचाई के प्रयोग में लाया जाता है।
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फिलहाल यहां एक लाख लीटर पानी एकत्र करने की व्यवस्था है। यह प्रोजेक्ट इंजीनियर जय सिंह ने तैयार किया है।
शांतिकुंज जल्द ही इस पायलट प्रोजेक्ट को बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी में है। यह प्रोजेक्ट शांतिकुंज के उपक्रम देवसंस्कृति विवि में जल्द ही लागू किया जाएगा।
अपनाया प्राचीन तरीका
प्रयोग हो चुके पानी को एक महीन जाली के माध्यम से छानकर पांच से छह चरणों से गुजारा जाता है।
पहले चरण में पानी को रेत, दूसरे में कोयला, तीसरे में बजरी, चौथे में ग्रेवल, पांचवें में पेवल, छठे में बोल्डर और अंत में ईंट से गुजारा जाता है। यह पानी बहुत हद पेयजल जितना शुद्ध होता है। यह एक प्राचीन पद्धति है। जिसे सदियों पहले ऋषि-मुनि प्रयोग किया करते थे।
...और साफ पानी तैयार
देवसंस्कृति विवि के पर्यावरण विज्ञान की प्रयोगशाला में हुई जांच के दौरान इस पानी को पूरी तरह प्रदूषण रहित बताया गया गया है।
शांतिकुंज की ओर से दावा किया गया है कि राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रुड़की ने भी इस पानी को कृषि कार्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है यह पानी निर्धारित प्रक्रिया के बाद बिल्कुल साधारण पानी जैसा हो जाता है। आरओ या अन्य किसी उपकरण का प्रयोग करें इसे पीया भी जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि शांतिकुंज में हर दिन पांच से आठ हजार श्रद्धालु सामूहिक भोजन करते हैं। पर्व और विशेष आयोजनों पर इनकी संख्या 20 हजार से भी ऊपर चली जाती है। भोजन से पूर्व और भोजन के बाद श्रद्धालु अपने बर्तन स्वयं धोते हैं। हाथ धोने में भी पानी का उपयोग होता है।
इस कार्य में प्रति व्यक्ति कम से कम 250 मिलीलीटर पानी बहाता है। इस तरह आम दिनों में करीब दो हजार लीटर पानी हर दिन यूं ही नाली में बहकर निकल जाता है।
ऐसे छोटे छोटे प्रोजेक्ट बड़ी सफलता के आधार हो सकते हैं। केवल हरिद्वार शहर में सैकड़ों आश्रम ऐसे हैं जहां हर दिन हजारों श्रद्धालु सामूहिक भोजन करते हैं और हजारों लीटर पानी नालियों में बहा देते हैं। यदि अन्य आश्रमों में भी इस मॉडल को अपनाया जाए तो हर दिन लाखों लीटर पानी को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। इसके अलावा एक फायदा यह भी कि इसके बाद सिंचाई के लिए अंडरग्राउंड पानी का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। जिससे वाटर लेवल को स्थिर बने रहने में मदद मिलती है।- डा. प्रणव पंड्या, शांतिकुज प्रमुख।
हमारी कोशिश यही है कि एक बूंद भी पानी की बर्बादी न हो। साथ ही बचा हुआ पानी अगर गंगा में भी मिले तो उसे प्रदूषित न करे।- गौरीशंकर शर्मा, व्यवस्थापक शांतिकुंज।
‘मनुष्य शरीर में 90 प्रतिशत हिस्सा जल का है और 10 प्रतिशत में बाकी तत्व हैं। यदि जल तत्व नष्ट हो जाए तो शरीर की सब नस-नाड़ियां सूख जाएंगी और काम नहीं करेंगी। इसी तरह धरती का अस्तित्व बचाए रखना है तो जल सरंक्षण बहुत जरूरी है’’।--श्रीराम शर्मा आचार्य पुस्तक ‘प्रकृति का अनुसरण’ में