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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Champawat News ›   Weapon against corruption Right to Information Act

भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार बना सूचना का अधिकार कानून

Sun, 11 Oct 2015 10:31 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत Updated Sun, 11 Oct 2015 10:31 PM IST
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सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम लागू हुए सोमवार को एक दशक पूरे हो गए। 12 अक्तूबर 2005 से लागू इस कानून ने चंपावत जैसे छोटे जिले पर भी छाप छोड़ी है। एक दशक के सफर में यह कानून आम लोगों का खास हथियार साबित हुआ है। खासकर भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के खिलाफ यह मददगार बना है।

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टनकपुर के छीनीगोठ में दो निर्माण कार्यों में गड़बड़ी पर दो माह पूर्व 78894 रुपये की वसूली हुई। घटिया गुणवत्ता और निर्माण में खामी पर ये वसूली जूनियर इंजीनियर, एक पूर्व ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी से हुई, मगर प्रशासन ने ये कार्रवाई खुद-ब-खुद नहीं की। गड़बड़ी का खुलासा और इसे अंजाम तक पहुंचाने का काम किया एक सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए प्रार्थना पत्र ने।
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छीनीगोठ निवासी दिनेश जोशी ने अपनी ग्राम पंचायत में 2012-13 में दो लाख रुपये की लागत से गुजर बस्ती नाले पर पुलिया निर्माण और 1.45 लाख रुपये शिव मंदिर के पास ईंट खड़ंजा निर्माण के काम की गड़बड़ी की जानकारी आरटीआई से जानी। उन्होंने कई आरटीआई अर्जियां लगाई। जवाब मिले, मामले की जांच हुई और फिर रिकवरी हुई।
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आरटीआई ने ऐसी कई धांधलियों को जग-जाहिर किया। 2011-12 में मनरेगा के तहत 37 वन पंचायतों मेें 1.17 करोड़ रुपये का काम कराया गया। हाईकोर्ट के वकील संजय भट्ट ने आरटीआई से इन कामों की जानकारी ली, तो कई बड़े राज खुले। सीमेंट की आपूर्ति करने वाली 4 कंपनियां फर्जी निकली। मस्टरोल में भी अंगुलियां उठी। एक शिक्षक के फर्जी पिछड़ी जाति प्रमाणपत्र मामले का भंडाफोड़ भी आरटीआई ने किया। स्क्रूटनी कमेटी ने इस प्रमाणपत्र को निरस्त कर दिया था। इसके अलावा वर्षों पूर्व लघु सिंचाई विभाग की एक योजना की धांधली के खुलासे में भी यह कारगर हथियार बना।

आरटीआई ने बदला मां पूर्णागिरि मेले का रंग-ढंग
मां पूर्णागिरि धाम मेले का स्वरूप 2010 से बदला हुआ है। पहले की तरह न दुकानों की नीलामी होती है, न तहबाजारी और नहीं पार्किंग ठेके। बूम से मां पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर तक के 12 किमी के मेला क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा वन क्षेत्र हैं, इसमें 2010 से गैर वानिकी काम नहीं होते, मगर इसे रोकने का काम मेला आयोजक संस्था जिला पंचायत या प्रशासन ने नहीं, बल्कि आरटीआई अधिनियम ने किया। पर्यावरणविद अजय रावत ने 2009 में आरटीआई से जानकारी मांगी। पूछा कि क्या आरक्षित वन क्षेत्र में मेले के आयोजन के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति ली गई? जवाब मिला नहीं। खुलासा यह भी हुआ कि मां पूर्णागिरि धाम का यह मेला तो कई दशकों से इसी तरह अनुमति के बगैर चल रहा था। इस खुलासे के बाद यहां गैर  वानिकी कार्य बंद हो गए।

सीएमओ पर लगा जुर्माना
चंपावत में सीएमओ (वर्तमान में हरिद्वार में कार्यरत) रहते डा.प्रवीण कुमार पर इसी साल आरटीआई देने में हीलाहवाली पर कार्रवाई हुई। राज्य सूचना आयोग ने टनकपुर के राजेंद्र खर्कवाल के आरटीआई आवेदन की सुनवाई करते हुए इस साल जून में डा.कुमार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था।


लिम्का बुक में दर्ज हुए केदार

आमबाग के राजेंद्र खर्कवाल, बाराकोट के हयात सिंह अधिकारी, चंपावत के मदन महर, टनकपुर के केदार सिंह सामंत सहित जिले में ढेरों आरटीआई के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। केदार सामंत ने 9 नवंबर 2011 को 411 सूचनाएं मांगने का रिकार्ड बनाया था। इसके लिए उन्हें 2013 में लिम्का बुक ऑफ नेशनल रिकार्ड में शामिल किया गया। इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस अधिकार का सही उपयोग विभागीय कार्यप्रणाली की खामियों के साथ ही भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर कर सकता है।

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