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नियमों की अनदेखी कर दौड़ रहीं स्कूली बसें, कहीं जीप में सवार हैं स्कूली बच्चे
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टनकपुर में ई-रिक्शा में जाते स्कूली बच्चे। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : TANAKPUR
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चंपावत/टनकपुर। महज 19 दिन पहले आठ अप्रैल को चंपावत जिले में लधिया घाटी क्षेत्र के एक निजी स्कूल की जीप हादसे का शिकार हो गई थी। दुर्घटना में आठ छात्र-छात्राएं चोटिल हो गए थे। झाड़ी में अटकने के कारण जीप गहरी खाई में गिरने से बाल-बाल बची लेकिन इस एक घटना ने स्कूल बस से आवाजाही करने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा चूक को उजागर किया। इसके बावजूद परिवहन विभाग का निगरानी तंत्र सक्रिय नहीं हो सका। आलम यह है कि जिले में कई स्कूल बसें नियमों की अनदेखी कर चलाई जा रहीं हैं। करीब 40 प्रतिशत स्कूल वाहनों के पास फिटनेस प्रमाणपत्र नहीं हैं।
चंपावत जिले की 95 प्रतिशत स्कूली बसों में सीसीटीवी नहीं लगे हैं। नई बसों में आग से बचाव के उपकरण हैं, लेकिन ज्यादातर पुरानी बसों में लगे अग्निशमक यंत्रों का नवीनीकरण नहीं हुआ है। जिले में स्कूल बसों समेत वैन और जीप से भी बच्चे ढोए जा रहे हैं। खासकर कस्बाई और ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में ज्यादातर जीप और वैन लगी हैं। ऐसे वाहनों में सुरक्षागत पहलुओं की अनदेखी हो रही है। अधिकतर वाहनों में हेल्पर भी नहीं हैं। ऊपर से जीप की क्षमता से अधिक स्कूली बच्चों को बिठाया जाता है। जाहिर है ऐसी हालत में चलने वाले वाहनों में फर्स्ट एड बॉक्स न होने से लेकर बच्चों के लिए अन्य सुरक्षा उपाय को तवज्जो देने का तो सवाल ही नहीं है लेकिन मंगलवार को तो शहर में ही एक स्कूल की जीप में बच्चे बैठते नजर आए। बच्चों को चढ़ाने और उतारने के लिए भी कोई हेल्पर नहीं था। वहीं टनकपुर में कई छात्र-छात्राएं अपने स्तर से ही ई-रिक्शा का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं।
निजी स्कूल 131 बसें 108, उस पर भी फिटनेस सिर्फ 64 की
चंपावत। चंपावत जिले में 131 निजी स्कूल हैं, लेकिन बसों की संख्या स्कूलों से कम है। जिले के परिवहन विभाग कार्यालय में महज 108 स्कूल बसें ही पंजीकृत हैं। उनमें से भी फिटनेस 64 की ही है। शेष 44 बसों की फिटनेस का नवीनीकरण नहीं हुआ है। बताते हैं कि इन बसों में कुछ तो संचालित नहीं हैं, लेकिन एक-तिहाई बसें नवीनीकरण के बिना ही चल रहीं हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर स्कूल बसों में सुरक्षा के सख्त नियम हैं। इन नियमों का पुलिस और प्रशासन के सहयोग से विभाग पालन कराने का प्रयास करता है। विभाग में कार्मिकों की कमी नियमित चेकिंग में बाधक बन रही है। अब अभियान चलाकर स्कूल बसों और अन्य वाहनों की जांच कर दस्तावेजों का परीक्षण किया जाएगा। खामी मिलने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। - सुरेंद्र कुमार, एआरटीओ, चंपावत।
ये हैं स्कूली वाहनों के मानक
1. बसों में स्कूल का नाम और फोन नंबर अंकित हो।
2. सीट के नीचे या ऊपरी भाग में बस्ता रखने की व्यवस्था हो।
3. बस के दरवाजे तालेयुक्त होने चाहिए। खिड़कियों में जाली हो।
4. बस में अग्निशमन यंत्र हो। प्राथमिक उपचार के लिए फर्स्ट एड बॉक्स हो।
5. बस के भीतर सीसीटीवी होना चाहिए, ताकि बस के भीतर दुर्घटना के बारे में पता लगाया जा सके।
6. स्कूली बसों का रंग अनिवार्य रूप से पीला हो और बीच में नीले रंग की पट्टी पर स्कूल का नाम दर्ज हो।
7. बसों में जीपीएस डिवाइस लगी होनी चाहिए ताकि चालक को कोहरे और धुंध में स्पष्ट रूप से सड़क का पता चल सके।
8. स्कूल बस चालक को कम से कम पांच वर्ष का अनुभव हो। अनिवार्य रूप से बस में हेल्पर हो। बस में दोनों का मोबाइल नंबर अंकित हो।
महिला अटेंडेंट नहीं, चालक ही निभा रहे दोहरी जिम्मेदारी
पिथौरागढ़। स्कूल वाहन नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं यह जानने के लिए संवाद न्यूज एजेंसी ने मंगलवार को कई वाहनों का जायजा लिया। कहीं व्यवस्थाएं सही मिलीं तो कहीं कुछ खामियां। कई बसों में महिला अटेंडेंट नहीं मिली। ज्यादातर बसों में पुरुष अटेंडेंट ही नजर आए। कुछ जगह चालक ही यह जिम्मेदारी निभाते मिले। हालांकि कुछ स्कूलों में छोटे बच्चों की छुट्टी के समय महिला अटेंडेंट को भेजा जाता है, जो उन्हें बस से उतारने का काम करती है।
पिथौरागढ़ में लगभग 120 स्कूल बसें हैं। सभी स्कूल बसें सीसीटीवी और जीपीएस सिस्टम से लैस हैं। छोटी बसें होने से डबल साइड दरवाजे बसों में नहीं हैं और कई बसों की खिड़कियों में जालियां नहीं लगी हैं। सुबह आठ बजे स्टेडियम के पास एक निजी स्कूल की वैन में चालक ही बच्चों को वैन में बैठा रहा था। एक स्कूल बस में जालियां नहीं थी। 8:25 बजे डाट पुल के करीब एक स्कूल वैन में बच्चों की संख्या क्षमता से अधिक दिखाई दी और वैन में जालियां भी नहीं लगी थी।
समय-समय पर स्कूल बसों की चेकिंग की जाती है। अधिकतर बसों का मानकों के अनुरूप संचालन किया जाता है। चेकिंग के दौरान जो मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं उन पर चालानी कार्यवाही की जाती है। कुछ समय पूर्व ही फिटनेस में कमी पाए जाने पर दो स्कूल बसों का चालान किया गया था।
-नवीन सिंह, एआरटीओ पिथौरागढ़।
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चंपावत जिले की 95 प्रतिशत स्कूली बसों में सीसीटीवी नहीं लगे हैं। नई बसों में आग से बचाव के उपकरण हैं, लेकिन ज्यादातर पुरानी बसों में लगे अग्निशमक यंत्रों का नवीनीकरण नहीं हुआ है। जिले में स्कूल बसों समेत वैन और जीप से भी बच्चे ढोए जा रहे हैं। खासकर कस्बाई और ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में ज्यादातर जीप और वैन लगी हैं। ऐसे वाहनों में सुरक्षागत पहलुओं की अनदेखी हो रही है। अधिकतर वाहनों में हेल्पर भी नहीं हैं। ऊपर से जीप की क्षमता से अधिक स्कूली बच्चों को बिठाया जाता है। जाहिर है ऐसी हालत में चलने वाले वाहनों में फर्स्ट एड बॉक्स न होने से लेकर बच्चों के लिए अन्य सुरक्षा उपाय को तवज्जो देने का तो सवाल ही नहीं है लेकिन मंगलवार को तो शहर में ही एक स्कूल की जीप में बच्चे बैठते नजर आए। बच्चों को चढ़ाने और उतारने के लिए भी कोई हेल्पर नहीं था। वहीं टनकपुर में कई छात्र-छात्राएं अपने स्तर से ही ई-रिक्शा का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं।
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निजी स्कूल 131 बसें 108, उस पर भी फिटनेस सिर्फ 64 की
चंपावत। चंपावत जिले में 131 निजी स्कूल हैं, लेकिन बसों की संख्या स्कूलों से कम है। जिले के परिवहन विभाग कार्यालय में महज 108 स्कूल बसें ही पंजीकृत हैं। उनमें से भी फिटनेस 64 की ही है। शेष 44 बसों की फिटनेस का नवीनीकरण नहीं हुआ है। बताते हैं कि इन बसों में कुछ तो संचालित नहीं हैं, लेकिन एक-तिहाई बसें नवीनीकरण के बिना ही चल रहीं हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर स्कूल बसों में सुरक्षा के सख्त नियम हैं। इन नियमों का पुलिस और प्रशासन के सहयोग से विभाग पालन कराने का प्रयास करता है। विभाग में कार्मिकों की कमी नियमित चेकिंग में बाधक बन रही है। अब अभियान चलाकर स्कूल बसों और अन्य वाहनों की जांच कर दस्तावेजों का परीक्षण किया जाएगा। खामी मिलने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। - सुरेंद्र कुमार, एआरटीओ, चंपावत।
ये हैं स्कूली वाहनों के मानक
1. बसों में स्कूल का नाम और फोन नंबर अंकित हो।
2. सीट के नीचे या ऊपरी भाग में बस्ता रखने की व्यवस्था हो।
3. बस के दरवाजे तालेयुक्त होने चाहिए। खिड़कियों में जाली हो।
4. बस में अग्निशमन यंत्र हो। प्राथमिक उपचार के लिए फर्स्ट एड बॉक्स हो।
5. बस के भीतर सीसीटीवी होना चाहिए, ताकि बस के भीतर दुर्घटना के बारे में पता लगाया जा सके।
6. स्कूली बसों का रंग अनिवार्य रूप से पीला हो और बीच में नीले रंग की पट्टी पर स्कूल का नाम दर्ज हो।
7. बसों में जीपीएस डिवाइस लगी होनी चाहिए ताकि चालक को कोहरे और धुंध में स्पष्ट रूप से सड़क का पता चल सके।
8. स्कूल बस चालक को कम से कम पांच वर्ष का अनुभव हो। अनिवार्य रूप से बस में हेल्पर हो। बस में दोनों का मोबाइल नंबर अंकित हो।
महिला अटेंडेंट नहीं, चालक ही निभा रहे दोहरी जिम्मेदारी
पिथौरागढ़। स्कूल वाहन नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं यह जानने के लिए संवाद न्यूज एजेंसी ने मंगलवार को कई वाहनों का जायजा लिया। कहीं व्यवस्थाएं सही मिलीं तो कहीं कुछ खामियां। कई बसों में महिला अटेंडेंट नहीं मिली। ज्यादातर बसों में पुरुष अटेंडेंट ही नजर आए। कुछ जगह चालक ही यह जिम्मेदारी निभाते मिले। हालांकि कुछ स्कूलों में छोटे बच्चों की छुट्टी के समय महिला अटेंडेंट को भेजा जाता है, जो उन्हें बस से उतारने का काम करती है।
पिथौरागढ़ में लगभग 120 स्कूल बसें हैं। सभी स्कूल बसें सीसीटीवी और जीपीएस सिस्टम से लैस हैं। छोटी बसें होने से डबल साइड दरवाजे बसों में नहीं हैं और कई बसों की खिड़कियों में जालियां नहीं लगी हैं। सुबह आठ बजे स्टेडियम के पास एक निजी स्कूल की वैन में चालक ही बच्चों को वैन में बैठा रहा था। एक स्कूल बस में जालियां नहीं थी। 8:25 बजे डाट पुल के करीब एक स्कूल वैन में बच्चों की संख्या क्षमता से अधिक दिखाई दी और वैन में जालियां भी नहीं लगी थी।
समय-समय पर स्कूल बसों की चेकिंग की जाती है। अधिकतर बसों का मानकों के अनुरूप संचालन किया जाता है। चेकिंग के दौरान जो मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं उन पर चालानी कार्यवाही की जाती है। कुछ समय पूर्व ही फिटनेस में कमी पाए जाने पर दो स्कूल बसों का चालान किया गया था।
-नवीन सिंह, एआरटीओ पिथौरागढ़।