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Champawat News: 11 साल से कागजों में ही चक्कर काट रही सड़क
Sat, 14 Oct 2023 11:54 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Sat, 14 Oct 2023 11:54 PM IST
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सड़क नहीं होने से ढुलान के लिए खच्चर का सहारा लेते बकोड़ा के ग्रामीण। संवाद
चंपावत। नेपाल सीमा से लगे तल्लादेश की एक सड़क 11 वर्षों से कागजों में ही घूम रही है। अभी तक सड़क की कटिंग शुरू नहीं हो सकी है। इसके चलते 17 तोकों के एक हजार से अधिक लोग पिछड़ेपन और सुविधाओं के अभाव में गुजर-बसर कर रहे हैं।
तल्लादेश के बकोड़ा और आसपास के गांवों के लोगों के लिए सड़क की कमी विकास ही नहीं, जेब पर भी भारी पड़ रही है। सड़क नहीं होने से ग्रामीणों को सामान के ढुलान में काफी खर्च करना पड़ रहा है। 12 किमी लंबी मंच-बकोड़ा सड़क वर्ष 2012 में मंजूर हुई थी लेकिन कटिंग आज तक शुरू नहीं हो सकी है।
कम आबादी वाले इन गांवों के लिए सड़क बनने में हो रही देरी की वजह घना जंगल है। सड़क विहीन इन गांवों के लिए घोड़ा और खच्चर ढुलान का एकमात्र सहारा है लेकिन इसके लिए 500 रुपये प्रति क्विंटल भाड़ा देना पड़ता है। भाड़े से भवन सामग्री की लागत 60 प्रतिशत अधिक हो जाती है। सामान ही नहीं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को डोली से मंच तक लाने में तीन से चार घंटे लगते हैं।
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सड़क बनने से इन 17 तोकों को मिलेगा लाभ
पनतौला, खुलकना, ग्वानी, मरथपला, स्यूतौला, बसेड़ी, खटगरी, सूना गांव, मटकांडा, बकरौला, डांडा, बकोड़ा, मथार, अकरी, मोष्टी, बांस और मोस्टा।
सड़क नहीं होने के ये हैं नुकसान
ढुलान की वजह से सामान की लागत 40 से 60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
गांव से सड़क तक पहुंचने में ढाई से तीन घंटे लग रहे हैं।
गंभीर बीमार और गर्भवतियों के लिए डोली का आसरा।
विकास में अड़चन और सुविधाओं की कमी।
कोट
मंच-बकोड़ा क्षेत्र में घना जंगल है। कुछ माह पहले वन विभाग के साथ संयुक्त सर्वे किया गया था। मंच-बकोड़ा सड़क के समरेखण, डंपिंग जोन से संबंधित मानचित्र तैयार किए जा रहे हैं। साथ ही वनभूमि की आपत्तियों को दूर करने के लिए संशोधित पत्रावली वन विभाग को भेजी गई है। इनके निराकरण के बाद ही निविदा और कटिंग का काम शुरू हो सकेगा। - नरेंद्र सिंह, अपर सहायक अभियंता, लोनिवि, चंपावत।
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तल्लादेश के बकोड़ा और आसपास के गांवों के लोगों के लिए सड़क की कमी विकास ही नहीं, जेब पर भी भारी पड़ रही है। सड़क नहीं होने से ग्रामीणों को सामान के ढुलान में काफी खर्च करना पड़ रहा है। 12 किमी लंबी मंच-बकोड़ा सड़क वर्ष 2012 में मंजूर हुई थी लेकिन कटिंग आज तक शुरू नहीं हो सकी है।
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कम आबादी वाले इन गांवों के लिए सड़क बनने में हो रही देरी की वजह घना जंगल है। सड़क विहीन इन गांवों के लिए घोड़ा और खच्चर ढुलान का एकमात्र सहारा है लेकिन इसके लिए 500 रुपये प्रति क्विंटल भाड़ा देना पड़ता है। भाड़े से भवन सामग्री की लागत 60 प्रतिशत अधिक हो जाती है। सामान ही नहीं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को डोली से मंच तक लाने में तीन से चार घंटे लगते हैं।
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सड़क बनने से इन 17 तोकों को मिलेगा लाभ
पनतौला, खुलकना, ग्वानी, मरथपला, स्यूतौला, बसेड़ी, खटगरी, सूना गांव, मटकांडा, बकरौला, डांडा, बकोड़ा, मथार, अकरी, मोष्टी, बांस और मोस्टा।
सड़क नहीं होने के ये हैं नुकसान
ढुलान की वजह से सामान की लागत 40 से 60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
गांव से सड़क तक पहुंचने में ढाई से तीन घंटे लग रहे हैं।
गंभीर बीमार और गर्भवतियों के लिए डोली का आसरा।
विकास में अड़चन और सुविधाओं की कमी।
कोट
मंच-बकोड़ा क्षेत्र में घना जंगल है। कुछ माह पहले वन विभाग के साथ संयुक्त सर्वे किया गया था। मंच-बकोड़ा सड़क के समरेखण, डंपिंग जोन से संबंधित मानचित्र तैयार किए जा रहे हैं। साथ ही वनभूमि की आपत्तियों को दूर करने के लिए संशोधित पत्रावली वन विभाग को भेजी गई है। इनके निराकरण के बाद ही निविदा और कटिंग का काम शुरू हो सकेगा। - नरेंद्र सिंह, अपर सहायक अभियंता, लोनिवि, चंपावत।