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फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति को तो मिली सजा लेकिन भारत में चुनावों में पैसा बहाने की सजा नेता नहीं लोग भुगतते हैं
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चंपावत (चंद्रशेखर जोशी)। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी को बृहस्पतिवार को वर्ष 2012 के राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में तय राशि से दोगुनी रकम खर्च करने पर पेरिस की अदालत ने एक साल के कारावास की सजा सुनाई है। ये फैसला भारत वासियों को चौंकाता है। यहां प्रधान से लेकर सांसद तक के चुनाव में खर्च की अधिकतम सीमा कागजों में तो कभी नहीं लांघी जाती है, लेकिन पैसा पानी की तरह बहाया जाता है।
चुनाव में बेतहाशा खर्च भ्रष्टाचार को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में बढ़ावा देता है। इससे जनसामान्य और कम आर्थिक संसाधन वाले लोग चुनावी प्रक्रिया से दूर हो रहे हैं। चुनावी राजनीति की करीब से जानकारी रखने वालों का कहना है कि धन का बढ़ता प्रभाव अंतत: लोकतंत्र को लोगों से दूर कर रहा है। सबसे ज्यादा मार सबसे कमजोर तबके पर पड़ रही है।
राज्य में वर्ष 2017 में विधानसभा, 2018 में नगर निकाय, 2019 में लोकसभा और 2019 के अंत में त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव हुए। लोकसभा सीट के लिए तो इस जिले से कोई प्रत्याशी नहीं था, जबकि अन्य चुनाव में 3173 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे। इन प्रत्याशियों ने 27 करोड़ रुपये से अधिक रकम उड़ा दी, जबकि ये राशि महज 10.31 करोड़ रुपये खर्च होनी चाहिए थी। संवाद
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देश में हर साल चुनाव होते रहते हैं। इन सभी चुनाव में हर दल पानी की तरह धन बहाता है। इसकी भरपाई भ्रष्टाचार और काम में कमतर गुणवत्ता के रूप में होती है। - नवल बिष्ट, छात्र, चंपावत।
महंगी चुनावी व्यवस्था भ्रष्टाचार का बड़ा कारण है। इसका असर सबसे नीचे के स्तर पर पड़ता है। इस पर लगाम लगाए बगैर बेईमानी को रोकना नामुमकिन सरीखा है। - विपुल राय, छात्र, लोहाघाट।
खर्चीले चुनाव समाज को नुकसान पहुंचाते हैं। बेहतर हो कि चुनाव प्रचार सीधे मुद्दों और दलों की नीतियों के आधार पर बगैर शोरशराबे के निर्धारित खर्च सीमा में हो। - डॉ. बीपी ओली, सहायक प्रोफेसर, राजकीय डिग्री कॉलेज, चंपावत।
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चुनाव में बेतहाशा खर्च भ्रष्टाचार को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में बढ़ावा देता है। इससे जनसामान्य और कम आर्थिक संसाधन वाले लोग चुनावी प्रक्रिया से दूर हो रहे हैं। चुनावी राजनीति की करीब से जानकारी रखने वालों का कहना है कि धन का बढ़ता प्रभाव अंतत: लोकतंत्र को लोगों से दूर कर रहा है। सबसे ज्यादा मार सबसे कमजोर तबके पर पड़ रही है।
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राज्य में वर्ष 2017 में विधानसभा, 2018 में नगर निकाय, 2019 में लोकसभा और 2019 के अंत में त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव हुए। लोकसभा सीट के लिए तो इस जिले से कोई प्रत्याशी नहीं था, जबकि अन्य चुनाव में 3173 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे। इन प्रत्याशियों ने 27 करोड़ रुपये से अधिक रकम उड़ा दी, जबकि ये राशि महज 10.31 करोड़ रुपये खर्च होनी चाहिए थी। संवाद
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देश में हर साल चुनाव होते रहते हैं। इन सभी चुनाव में हर दल पानी की तरह धन बहाता है। इसकी भरपाई भ्रष्टाचार और काम में कमतर गुणवत्ता के रूप में होती है। - नवल बिष्ट, छात्र, चंपावत।
महंगी चुनावी व्यवस्था भ्रष्टाचार का बड़ा कारण है। इसका असर सबसे नीचे के स्तर पर पड़ता है। इस पर लगाम लगाए बगैर बेईमानी को रोकना नामुमकिन सरीखा है। - विपुल राय, छात्र, लोहाघाट।
खर्चीले चुनाव समाज को नुकसान पहुंचाते हैं। बेहतर हो कि चुनाव प्रचार सीधे मुद्दों और दलों की नीतियों के आधार पर बगैर शोरशराबे के निर्धारित खर्च सीमा में हो। - डॉ. बीपी ओली, सहायक प्रोफेसर, राजकीय डिग्री कॉलेज, चंपावत।