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चंद वंश के शासन के दौरान निर्मित पुराने शिवलिंगों का जखीरा मिला
उजाला ब्यूरो चंपावत।
Updated Wed, 19 Sep 2018 10:24 PM IST
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चंपावत में ब्लाक कार्यालय के समीप मिले पुराने शिवलिंगों का जखीरा।
- फोटो : अमर उजाला
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जिला मुख्यालय में चंद वंश के शासन के दौरान निर्मित पुराने शिवलिंगों का जखीरा मिला है। जिसको लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। ब्लाक कार्यालय के पुराने आवासीय भवन परिसर के समीप स्थित एक मंदिर के पिछवाड़े जमीन में दबे सैकड़ों की तादात में शिवलिंग मिलने से लोगों में कौतूहल का माहौल है। कुछ शिवलिंग पूर्ण निर्मित और अधिकांश शिवलिंग अर्धनिर्मित हालात में मिले हैं।
यही नहीं मंदिर के आसपास की जमीन की खुदाई में दबे हुए शिवलिंग मिल रहे हैं। एक साथ सैकड़ों-हजारों की तादात में मिले शिवलिंगों को लेकर इतिहासकार एकमत हैं कि यह शिवलिंग 12 वीं-13वीं शताब्दी के दौर के हैं, जब इस क्षेत्र में चंद वंश के शासकों का शासन रहा था। संभावना व्यक्त की जा रही है कि इस स्थान पर चंद शासकों की भवन निर्माण संबंधी कार्यशाला रही होगी। जहां पर मंदिरों और किलों के निर्माण के लिए शिवलिंग तैयार किए जाते रहे होंगे।
इतिहासकारों के अनुसार इस मामले की असलियत पुरातत्व विभाग की जांच के बाद ही पूरी तरह सामने आ पाएगी। स्थानीय निवासी भैरव दत्त जोशी कहते हैं कि मंदिर के अलावा आसपास के क्षेत्रों में इस तरह के शिवलिंग अक्सर मिलते रहते हैं। कुछ दिन पूर्व कुछ बच्चे इस स्थल में खेल रहे थे तो उन्हें शिवलिंगों के जखीरे की जानकारी हुई।
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शिव भक्ति परंपरा के वाहक थे चंद शासक
इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार सभी शिवलिंग का निर्माण चंद शासन के दौरान हुआ है। चंद शासकों के जितने भी किले और ऐतिहासिक अवशेष अब तक प्राप्त हुए हैं, सब में इसी तरह के शिवलिंगों का प्रयोग किया गया है। उनका कहना है कि एक साथ इतनी बड़ी तादात में निर्मित और अर्धनिर्मित शिवलिंग मिलने से यह स्पष्ट होता है कि चंद शासक शिव भक्ति परंपरा के वाहक थे।
चंद शासन के दौरान ही चंपावत नगर के चारों ओर भगवान शिव के सात श्वरों (मठों) की स्थापना की गई थी। जिसमें क्रांतेश्वर, ताड़केश्वर, डिप्टेश्वर, मल्लाडेश्वर, मानेश्वर, हरेश्वर और सप्तेश्वर आदि शामिल हैं।
चंपावत जिले में मिले शिवलिंग 12वीं और 13वीं शताब्दी के आसपास के लगते हैं। इसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग की जांच के बाद स्पष्ट हो सकेगी। जिले में प्राचीन धरोहरों को सहेजने के लिए पुरातत्व विभाग के साथ ही सभी को आगे आना होगा।
डा. प्रशांत जोशी, इतिहास विभाग, पीजी कालेज चंपावत।
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यही नहीं मंदिर के आसपास की जमीन की खुदाई में दबे हुए शिवलिंग मिल रहे हैं। एक साथ सैकड़ों-हजारों की तादात में मिले शिवलिंगों को लेकर इतिहासकार एकमत हैं कि यह शिवलिंग 12 वीं-13वीं शताब्दी के दौर के हैं, जब इस क्षेत्र में चंद वंश के शासकों का शासन रहा था। संभावना व्यक्त की जा रही है कि इस स्थान पर चंद शासकों की भवन निर्माण संबंधी कार्यशाला रही होगी। जहां पर मंदिरों और किलों के निर्माण के लिए शिवलिंग तैयार किए जाते रहे होंगे।
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इतिहासकारों के अनुसार इस मामले की असलियत पुरातत्व विभाग की जांच के बाद ही पूरी तरह सामने आ पाएगी। स्थानीय निवासी भैरव दत्त जोशी कहते हैं कि मंदिर के अलावा आसपास के क्षेत्रों में इस तरह के शिवलिंग अक्सर मिलते रहते हैं। कुछ दिन पूर्व कुछ बच्चे इस स्थल में खेल रहे थे तो उन्हें शिवलिंगों के जखीरे की जानकारी हुई।
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शिव भक्ति परंपरा के वाहक थे चंद शासक
इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार सभी शिवलिंग का निर्माण चंद शासन के दौरान हुआ है। चंद शासकों के जितने भी किले और ऐतिहासिक अवशेष अब तक प्राप्त हुए हैं, सब में इसी तरह के शिवलिंगों का प्रयोग किया गया है। उनका कहना है कि एक साथ इतनी बड़ी तादात में निर्मित और अर्धनिर्मित शिवलिंग मिलने से यह स्पष्ट होता है कि चंद शासक शिव भक्ति परंपरा के वाहक थे।
चंद शासन के दौरान ही चंपावत नगर के चारों ओर भगवान शिव के सात श्वरों (मठों) की स्थापना की गई थी। जिसमें क्रांतेश्वर, ताड़केश्वर, डिप्टेश्वर, मल्लाडेश्वर, मानेश्वर, हरेश्वर और सप्तेश्वर आदि शामिल हैं।
चंपावत जिले में मिले शिवलिंग 12वीं और 13वीं शताब्दी के आसपास के लगते हैं। इसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग की जांच के बाद स्पष्ट हो सकेगी। जिले में प्राचीन धरोहरों को सहेजने के लिए पुरातत्व विभाग के साथ ही सभी को आगे आना होगा।
डा. प्रशांत जोशी, इतिहास विभाग, पीजी कालेज चंपावत।