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अब नए शराब पीने वालों को तलाशेगा आबकारी विभाग
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
Updated Sun, 21 May 2017 12:23 AM IST
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उत्तराखंड के सबसे छोटे जिलों में से एक चंपावत जिले में आबकारी विभाग अब नए शराब पीने वालों को तलाशेगा। शासन ने इस जिले में पिछले वित्त वर्ष की अपेक्षा इस वित्त वर्ष में 22 प्रतिशत से अधिक राजस्व शराब का लक्ष्य रखा गया है। बढ़े हुए लक्ष्य के हिसाब से जिले में रोजाना औसतन शराब की 1800 बोतलों की बिक्री अधिक करनी होगी। इसके लिए विभाग को नए शराब पीने वालों की तलाश करनी होगी।
देवभूमि उत्तराखंड के धर्मनगर चंपावत जिले में शराब का खूब जोर है। अब शराब की खपत को और अधिक बढ़ाने का लक्ष्य है। विभाग को पिछले वित्त वर्ष की अपेक्षा वर्तमान वित्त वर्ष 2017-18 में 22.35 प्रतिशत अधिक राजस्व सिर्फ व्यवस्थापन शुल्क मद में देना होगा। जिला आबकारी अधिकारी दीपाली साह ने बताया कि पिछले साल शराब से 16 सरकारी दुकानों से 33.5 करोड़ रुपये का शुल्क मिला था, जो अब बढ़कर 41 करोड़ रुपये हो गया है। वहीं चंपावत से अधिक आबादी वाले बागेश्वर जिले की शराब से कमाई महज 28 करोड़ रुपये होगी।
पिछले वित्त वर्ष तक शराब की करीब 8 हजार बोतलों की औसतन रोज बिक्री होती थी। सालभर में करीब 29.20 लाख बोतल शराब की सरकारी दुकानों से पी जाती थी। 22.35 प्रतिशत राजस्व में बढ़ोतरी के चलते अब करीब 1800 बोतल हर रोज और बेचनी होगी। सालभर में 6.57 लाख शराब की बोतल की खपत बढ़ानी होगी। राजस्व बढ़ाने के लिए नई नीति में किसी भी नई जगह शराब की दुकान खोलने या पुरानी दुकान को बंद करने की छूट जिला आबकारी विभाग को दी गई है।
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शराब से राजस्व देने में सुस्त आबकारी मंत्री का जिला
आबकारी मंत्री प्रकाश पंत का गृह जिला पिथौरागढ़ आबकारी से राजस्व देने में बहुत आगे नहीं रहेगा। चंपावत से तकरीबन दोगुनी आबादी वाले पिथौरागढ़ जिले से शासन को व्यवस्थापन शुल्क के रूप में महज 48 करोड़ रुपये मिलेंगे। जबकि 2.59 लाख की आबादी वाले चंपावत से 41 करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य है। 4.85 लाख की आबादी वाले पिथौरागढ़ में चंपावत से दोगुने यानि आठ विकासखंड है। पिथौरागढ़ की प्रति व्यक्ति आय भी चंपावत से करीब दोगुनी है और पर्यटन व कारोबारी तौर पर भी चंपावत से बहुत आगे हैं।
कुमाऊं मंडल के पहाड़ी जिले आबादी शराब से राजस्व (करोड़ रुपये में)
अल्मोड़ा 621972 79
पिथौरागढ़ 485993 48
बागेश्वर 259840 28
चंपावत 259315 41
भटक सकती है भविष्य की राह
नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले संगठन शराब को आमदनी बढ़ाने का जरिया बनाने को कतई ठीक नहीं मानते हैं। शिक्षक सामश्रवा आर्य, त्रिलोचन जोशी, डॉ. प्रकाश चंद्र जोशी शूल आदि का कहना है कि 22 प्रतिशत से अधिक राजस्व बढ़ने से शराब की खपत बढ़ेगी। इससे शराब की जद में नौजवानों के आने का खतरा बढ़ेगा। पढ़ने-लिखने और भविष्य निर्माण की तलाश करने वाले नवयुवकों के शराब के आदी होने से नई पीढ़ी को बर्बादी से रोकना बड़ी चुनौती बनेगा।
देवभूमि उत्तराखंड के धर्मनगर चंपावत जिले में शराब का खूब जोर है। अब शराब की खपत को और अधिक बढ़ाने का लक्ष्य है। विभाग को पिछले वित्त वर्ष की अपेक्षा वर्तमान वित्त वर्ष 2017-18 में 22.35 प्रतिशत अधिक राजस्व सिर्फ व्यवस्थापन शुल्क मद में देना होगा। जिला आबकारी अधिकारी दीपाली साह ने बताया कि पिछले साल शराब से 16 सरकारी दुकानों से 33.5 करोड़ रुपये का शुल्क मिला था, जो अब बढ़कर 41 करोड़ रुपये हो गया है। वहीं चंपावत से अधिक आबादी वाले बागेश्वर जिले की शराब से कमाई महज 28 करोड़ रुपये होगी।
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पिछले वित्त वर्ष तक शराब की करीब 8 हजार बोतलों की औसतन रोज बिक्री होती थी। सालभर में करीब 29.20 लाख बोतल शराब की सरकारी दुकानों से पी जाती थी। 22.35 प्रतिशत राजस्व में बढ़ोतरी के चलते अब करीब 1800 बोतल हर रोज और बेचनी होगी। सालभर में 6.57 लाख शराब की बोतल की खपत बढ़ानी होगी। राजस्व बढ़ाने के लिए नई नीति में किसी भी नई जगह शराब की दुकान खोलने या पुरानी दुकान को बंद करने की छूट जिला आबकारी विभाग को दी गई है।
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शराब से राजस्व देने में सुस्त आबकारी मंत्री का जिला
आबकारी मंत्री प्रकाश पंत का गृह जिला पिथौरागढ़ आबकारी से राजस्व देने में बहुत आगे नहीं रहेगा। चंपावत से तकरीबन दोगुनी आबादी वाले पिथौरागढ़ जिले से शासन को व्यवस्थापन शुल्क के रूप में महज 48 करोड़ रुपये मिलेंगे। जबकि 2.59 लाख की आबादी वाले चंपावत से 41 करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य है। 4.85 लाख की आबादी वाले पिथौरागढ़ में चंपावत से दोगुने यानि आठ विकासखंड है। पिथौरागढ़ की प्रति व्यक्ति आय भी चंपावत से करीब दोगुनी है और पर्यटन व कारोबारी तौर पर भी चंपावत से बहुत आगे हैं।
कुमाऊं मंडल के पहाड़ी जिले आबादी शराब से राजस्व (करोड़ रुपये में)
अल्मोड़ा 621972 79
पिथौरागढ़ 485993 48
बागेश्वर 259840 28
चंपावत 259315 41
भटक सकती है भविष्य की राह
नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले संगठन शराब को आमदनी बढ़ाने का जरिया बनाने को कतई ठीक नहीं मानते हैं। शिक्षक सामश्रवा आर्य, त्रिलोचन जोशी, डॉ. प्रकाश चंद्र जोशी शूल आदि का कहना है कि 22 प्रतिशत से अधिक राजस्व बढ़ने से शराब की खपत बढ़ेगी। इससे शराब की जद में नौजवानों के आने का खतरा बढ़ेगा। पढ़ने-लिखने और भविष्य निर्माण की तलाश करने वाले नवयुवकों के शराब के आदी होने से नई पीढ़ी को बर्बादी से रोकना बड़ी चुनौती बनेगा।