{"_id":"61f828b1cd96564abf7633c1","slug":"no-ukd-candidate-in-champawat-champawat-news-hld4524271189","type":"story","status":"publish","title_hn":"कुर्सी की लड़ाई से पहले ही बाहर हुई कुर्सी...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कुर्सी की लड़ाई से पहले ही बाहर हुई कुर्सी...
विज्ञापन
No UKD Candidate in Champawat
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चंपावत। उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए सबसे मुखर रहा उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) अब पूरी तरह मौन हो गया है। चंपावत जिले में पहली बार ईवीएम पर कुर्सी का चुनाव निशान शामिल नहीं होगा। पहले भी उक्रांद यहां दमदार प्रदर्शन नहीं कर सका, लेकिन चुनाव में उसकी मौजूदगी चर्चा में जरूर रहती थी लेकिन ये पहला मौका होगा, जब चुनाव से पहले ही कुर्सी ने मैदान छोड़ दिया।
पड़ोसी जिले पिथौरागढ़ से काशी सिंह ऐरी, तो चंपावत जिले से एडवोकेट नवीन मुरारी उक्रांद के बड़े नाम थे लेकिन अब उक्रांद इस जिले में अपना वजूद खो रहा है। चंपावत जिले में इस बार कुर्सी चुनाव निशान नहीं दिखेगा। उक्रांद ने लोहाघाट सीट से भले ही 2012 से ही मैदान छोड़ दिया था, लेकिन 2017 तक उसने चंपावत सीट से लगातार प्रत्याशी उतारा था लेकिन 2022 में पहली बार वह चंपावत से भी मैदान से बाहर है।
इस जिले में उक्रांद का सबसे शानदार प्रदर्शन वर्ष 2002 में लोहाघाट सीट से रहा। जब पार्टी प्रत्याशी एडवोकेट नवीन मुरारी ने दमदार प्रदर्शन किया था। वे कांटे के मुकाबले में कांग्रेस से हारे थे। पिछले चार चुनावों में जिले की दोनों सीटों पर पार्टी के पांच प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा सके थे। यहां तक कि चंपावत सीट में पहले तीन चुनाव में उक्रांद को बसपा से भी कम वोट मिले जबकि 2017 के चुनाव में उसे बसपा से नौ वोट ज्यादा मिले।
विज्ञापन
ये रही कमजोर प्रदर्शन की वजह
जनसरोकारों से दूर, आम लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाने में नाकाम रहना, संगठन में धार न होना, स्थानीय नेतृत्व शून्यता, संसाधनों की कमी।
अलग उत्तराखंड राज्य बनाने के लिए उक्रांद ने अपना सर्वस्व झोंक दिया था लेकिन अलग राज्य बनने के बाद राष्ट्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने के कारण उक्रांद हाशिए पर चला गया है। यह चिंताजनक स्थिति है।
- बसंत सिंह तड़ागी, सदस्य, केंद्रीय कार्यकारिणी, उक्रांद, चंपावत।
लोहाघाट में पहली बार नहीं सुनाई देगी हाथी की चिंघाड़
चंपावत। यूपी में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी के शासन में सितंबर 1997 को चंपावत जिले का सृजन हुआ, लेकिन दो सीटों वाले इस जिले से बसपा कभी जीत नहीं सकी। इस बार तो बसपा ने लोहाघाट सीट से प्रत्याशी भी नहीं उतारा है। बसपा चंपावत सीट से ही मैदान पर है। इस सीट से जड़ीबूटी विभाग के सेवानिवृत्त जिला समन्वयक राकेश वर्मा चुनाव लड़ रहे हैं जबकि बसपा ने 2017 तक के सभी चुनावों में दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे।
उक्रांद के इन प्रत्याशियों की नहीं बची जमानत
2002 - चंपावत सीट से नारायण सिंह महर।
2007 - चंपावत सीट से नारायण सिंह महर और लोहाघाट से प्रह्लाद सिंह मेहता।
2012 - चंपावत सीट से हर्षवर्द्धन सिंह।
2017 - चंपावत सीट से त्रिलोक चंद्र सौराड़ी।
चंपावत विधानसभा सीट पर उक्रांद और अन्य दल
वर्ष कुल वोटिंग उक्रांद बसपा सपा
2002 38893 2375 2501 392
2007 54427 1511 3120 778
2012 50187 2042 13377 430
2017 58979 0939 0928 प्रत्याशी नहीं
लोहाघाट विधानसभा सीट पर अन्य दल
वर्ष कुल वोटिंग उक्रांद बसपा सपा
2002 34210 6609 3432 421
2007 42619 3209 1103 711
2012 51559 प्रत्याशी नहीं 2187 प्रत्याशी नहीं
2017 58338 प्रत्याशी नहीं 0713 प्रत्याशी नहीं
विज्ञापन
पड़ोसी जिले पिथौरागढ़ से काशी सिंह ऐरी, तो चंपावत जिले से एडवोकेट नवीन मुरारी उक्रांद के बड़े नाम थे लेकिन अब उक्रांद इस जिले में अपना वजूद खो रहा है। चंपावत जिले में इस बार कुर्सी चुनाव निशान नहीं दिखेगा। उक्रांद ने लोहाघाट सीट से भले ही 2012 से ही मैदान छोड़ दिया था, लेकिन 2017 तक उसने चंपावत सीट से लगातार प्रत्याशी उतारा था लेकिन 2022 में पहली बार वह चंपावत से भी मैदान से बाहर है।
विज्ञापन
इस जिले में उक्रांद का सबसे शानदार प्रदर्शन वर्ष 2002 में लोहाघाट सीट से रहा। जब पार्टी प्रत्याशी एडवोकेट नवीन मुरारी ने दमदार प्रदर्शन किया था। वे कांटे के मुकाबले में कांग्रेस से हारे थे। पिछले चार चुनावों में जिले की दोनों सीटों पर पार्टी के पांच प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा सके थे। यहां तक कि चंपावत सीट में पहले तीन चुनाव में उक्रांद को बसपा से भी कम वोट मिले जबकि 2017 के चुनाव में उसे बसपा से नौ वोट ज्यादा मिले।
विज्ञापन
ये रही कमजोर प्रदर्शन की वजह
जनसरोकारों से दूर, आम लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाने में नाकाम रहना, संगठन में धार न होना, स्थानीय नेतृत्व शून्यता, संसाधनों की कमी।
अलग उत्तराखंड राज्य बनाने के लिए उक्रांद ने अपना सर्वस्व झोंक दिया था लेकिन अलग राज्य बनने के बाद राष्ट्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने के कारण उक्रांद हाशिए पर चला गया है। यह चिंताजनक स्थिति है।
- बसंत सिंह तड़ागी, सदस्य, केंद्रीय कार्यकारिणी, उक्रांद, चंपावत।
लोहाघाट में पहली बार नहीं सुनाई देगी हाथी की चिंघाड़
चंपावत। यूपी में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी के शासन में सितंबर 1997 को चंपावत जिले का सृजन हुआ, लेकिन दो सीटों वाले इस जिले से बसपा कभी जीत नहीं सकी। इस बार तो बसपा ने लोहाघाट सीट से प्रत्याशी भी नहीं उतारा है। बसपा चंपावत सीट से ही मैदान पर है। इस सीट से जड़ीबूटी विभाग के सेवानिवृत्त जिला समन्वयक राकेश वर्मा चुनाव लड़ रहे हैं जबकि बसपा ने 2017 तक के सभी चुनावों में दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे।
उक्रांद के इन प्रत्याशियों की नहीं बची जमानत
2002 - चंपावत सीट से नारायण सिंह महर।
2007 - चंपावत सीट से नारायण सिंह महर और लोहाघाट से प्रह्लाद सिंह मेहता।
2012 - चंपावत सीट से हर्षवर्द्धन सिंह।
2017 - चंपावत सीट से त्रिलोक चंद्र सौराड़ी।
चंपावत विधानसभा सीट पर उक्रांद और अन्य दल
वर्ष कुल वोटिंग उक्रांद बसपा सपा
2002 38893 2375 2501 392
2007 54427 1511 3120 778
2012 50187 2042 13377 430
2017 58979 0939 0928 प्रत्याशी नहीं
लोहाघाट विधानसभा सीट पर अन्य दल
वर्ष कुल वोटिंग उक्रांद बसपा सपा
2002 34210 6609 3432 421
2007 42619 3209 1103 711
2012 51559 प्रत्याशी नहीं 2187 प्रत्याशी नहीं
2017 58338 प्रत्याशी नहीं 0713 प्रत्याशी नहीं