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स्टाफ की कमी से मुश्किल में आईसीयू का संचालन
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टनकपुर अस्पताल के एक्सरे कक्ष में तीन साल से लटके ताले। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की कमी पर उच्च न्यायालय की संजीदगी सेहत को संवारने का अहम कदम हो सकता है। जिले में छोटे अस्पतालों को तो छोड़िए, बड़े अस्पतालों के भी हाल बेहाल हैं। जिला अस्पताल में सघन निगरानी इकाई (आईसीयू) नाम मात्र का है। स्टाफ की तैनाती न होने से इसका खास लाभ नहीं मिल रहा है। जिले में एक भी हृदयरोग, चर्मरोग, ईएनटी नहीं है। वहीं दो उप जिला अस्पताल (एसडीएच) महज रेफरल सेंटर बने हैं। तीनों बड़ें अस्पतालों में ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट हैं। कोरोना से बचाव के लिए 151 बेड हैं।
जिले में डॉक्टरों के 107 सृजित पदों में से 18 खाली हैं। टनकपुर, लोहाघाट एसडीएच में न फिजिशियन है और न ही गायनाकोलॉजिस्ट। इस कारण सुरक्षित प्रसव समेत कई मरीजों के इलाज में दिक्कत आ रही है। टनकपुर में तो जनवरी 2019 से एक्सरे कक्ष में ताला लटका है। एक्सरे जैसी मामूली सुविधा के लिए यहां के लोग निजी अस्पताल में दस्तक दे रहे हैं। जून 2015 से अल्ट्रासाउंड परीक्षण बंद है। दिसंबर 2020 से लोहाघाट के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. एलएम रखोलिया के जरिये सप्ताह में एक दिन परीक्षण हो रहे हैं। निश्चेतक और सर्जन की तैनाती के बावजूद ऑपरेशन नहीं हो रहे हैं। सीएमएस डॉ. घनश्याम तिवारी का कहना है कि एक्सरे तकनीशियन न होने से एक्सरे नहीं हो पा रहे हैं। लोहाघाट में सर्जन है नहीं और निश्चेतक देहरादून संबद्ध है। वहीं पाटी और बाराकोट ब्लॉक मुख्यालय के पीएचसी में भी एक्सरे के लिए लोहाघाट जाना पड़ रहा है। दोनों एसडीएच में 21 डॉक्टरों के सृजित पदों में से गायनाकोलॉजिस्ट, फिजिशियन, ईएनटी सर्जन, हृदयरोग, चर्म रोग विशेषज्ञ विशेषज्ञों के पद भी खाली हैं।
इलाज ही नहीं, सस्ती दवाओं को भी तरसे लोग
चंपावत। टनकपुर-बनबसा क्षेत्र में इलाज में तो कई तरह की खामियां है ही, सस्ती दवाओं का मिलना भी यहां दूभर हो रहा है। टनकपुर उप जिला अस्पताल परिसर में खुला प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र सितंबर 2020 से बंद है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि औषधि केंद्र के प्रतिनिधि ने नुकसान होने की वजह से इसके संचालन करने में असमर्थता जताई है। केंद्र के इस भवन का उपयोग अस्पताल के दूसरे काम के लिए किए जा रहा है। सीएमएस डॉ. घनश्याम तिवारी का कहना है कि इस जन औषधि केंद्र को फिर से संचालित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अलावा चंपावत और लोहाघाट के केंद्र चल तो रहे हैं,
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लेकिन उनमें भी ज्यादातर दवाओं की कमी है।
खुद अंधेरे में, कैसे करेंगे लोगों का इलाज
बनबसा (चंपावत)। नेपाल सीमा से लगा बनबसा जिले का प्रवेशद्वार है लेकिन यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दिसंबर 2021 से बिजली का उजाला नहीं है। करीब 1.91 लाख रुपये बकाया न चुकाने की कीमत कनेक्शन कटने के रूप में चुकानी पड़ी है। एक्सरे तो दूर, खून की मामूली जांचों तक की सुविधा नहीं है। दो डॉक्टरों सहित कुल 11 पदों के सापेक्ष सिर्फ एक डॉॅक्टर और एक फार्मासिस्ट से काम चल रहा है।
डॉ. स्वाति शर्मा का कहना है कि स्टाफ नर्स, एएनएम सहित नौ पद खाली हैं लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी बिजली का कनेक्शन कटने से हो रही है। टीकाकरण का काम किसी तरह किया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण अस्पताल की तमाम खामियों की वजह से मामूली परेशानी के लिए भी लोग 11 किमी दूर टनकपुर उप जिला अस्पताल दौड़ लगाने को मजबूर हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के दावे हवाई ही साबित हुए।
जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में कई कमियां हैं। इन्हें दूर करने के लिए कार्यवृत्त बनाया जा रहा है। टनकपुर और पाटी के अस्पतालों में एक्सरे तकनीशियन की तैनाती के आउटसोर्स एजेंसी के जरिये प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं अन्य खाली पदों और कमियों को दूर करने के लिए महानिदेशालय से आग्रह किया जा रहा है। - डॉ. केके अग्रवाल, सीएमओ, चंपावत।
जिले के अस्पतालों में व्यवस्थाओं का हाल बदहाल
पिथौरागढ़। जिले के अस्पतालों में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बदहाल हैं। चिकित्सालयों में विशेषज्ञ चिकित्सक तो दूर नर्स सहित अन्य स्टाफ की भी कमी है।
जिले में एक जिला अस्पताल, एक महिला अस्पताल के अलावा सात सीएचसी हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों सहित जिले में करीब 60 अस्पताल हैं। इसके बावजूद अधिकतर अस्पताल चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिला अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ का पद छह साल से खाली है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में महिला विशेषज्ञ न होने से प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं को महिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
अस्पतालों में तकनीशियनों के अभाव में कई मशीनें धूल फांक रहीं हैं। डीडीहाट सीएचसी में डिजिटल एक्सरे मशीन रखी गई है लेकिन तकनीशियन न होने से यह मशीन कक्ष में बंद है। थल, बलुवाकोट, जौलजीबी, बुंगाछीना, झूलाघाट समेत कई क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। अधिकतर अस्पतालों में खून की जांच की सुविधा भी नहीं है। मरीजों को ज्यादातर मामलों में जिला अस्पताल की दौड़ लगानी पड़ती है।
अस्पतालों में सुधार की खासी जरूरत है। कई प्रकार की मशीनें तकनीशियनों की कमी के चलते सीमांत के अस्पतालों में धूल फांक रही हैं। शासन-प्रशासन के साथ ही विभाग को भी अस्पतालों में बेहतर व्यवस्थाओं के लिए प्रयास करने चाहिए। - अर्चना सौन, पिथौरागढ़।
कई बार अस्पतालों में मरीजों के साथ ही तीमारदारों को अस्पताल में बेडों की कमी के चलते बरामदे में सोना पड़ता है। भविष्य को देखते हुए अस्पताल में बेडों की व्यवस्था की जाए। अस्पताल में मूलभूत सुविधाएं दुरुस्त कराना विभाग का लक्ष्य होना चाहिए। - बबीता पंगरिया पुनेठा।
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जिले में डॉक्टरों के 107 सृजित पदों में से 18 खाली हैं। टनकपुर, लोहाघाट एसडीएच में न फिजिशियन है और न ही गायनाकोलॉजिस्ट। इस कारण सुरक्षित प्रसव समेत कई मरीजों के इलाज में दिक्कत आ रही है। टनकपुर में तो जनवरी 2019 से एक्सरे कक्ष में ताला लटका है। एक्सरे जैसी मामूली सुविधा के लिए यहां के लोग निजी अस्पताल में दस्तक दे रहे हैं। जून 2015 से अल्ट्रासाउंड परीक्षण बंद है। दिसंबर 2020 से लोहाघाट के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. एलएम रखोलिया के जरिये सप्ताह में एक दिन परीक्षण हो रहे हैं। निश्चेतक और सर्जन की तैनाती के बावजूद ऑपरेशन नहीं हो रहे हैं। सीएमएस डॉ. घनश्याम तिवारी का कहना है कि एक्सरे तकनीशियन न होने से एक्सरे नहीं हो पा रहे हैं। लोहाघाट में सर्जन है नहीं और निश्चेतक देहरादून संबद्ध है। वहीं पाटी और बाराकोट ब्लॉक मुख्यालय के पीएचसी में भी एक्सरे के लिए लोहाघाट जाना पड़ रहा है। दोनों एसडीएच में 21 डॉक्टरों के सृजित पदों में से गायनाकोलॉजिस्ट, फिजिशियन, ईएनटी सर्जन, हृदयरोग, चर्म रोग विशेषज्ञ विशेषज्ञों के पद भी खाली हैं।
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इलाज ही नहीं, सस्ती दवाओं को भी तरसे लोग
चंपावत। टनकपुर-बनबसा क्षेत्र में इलाज में तो कई तरह की खामियां है ही, सस्ती दवाओं का मिलना भी यहां दूभर हो रहा है। टनकपुर उप जिला अस्पताल परिसर में खुला प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र सितंबर 2020 से बंद है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि औषधि केंद्र के प्रतिनिधि ने नुकसान होने की वजह से इसके संचालन करने में असमर्थता जताई है। केंद्र के इस भवन का उपयोग अस्पताल के दूसरे काम के लिए किए जा रहा है। सीएमएस डॉ. घनश्याम तिवारी का कहना है कि इस जन औषधि केंद्र को फिर से संचालित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अलावा चंपावत और लोहाघाट के केंद्र चल तो रहे हैं,
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लेकिन उनमें भी ज्यादातर दवाओं की कमी है।
खुद अंधेरे में, कैसे करेंगे लोगों का इलाज
बनबसा (चंपावत)। नेपाल सीमा से लगा बनबसा जिले का प्रवेशद्वार है लेकिन यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दिसंबर 2021 से बिजली का उजाला नहीं है। करीब 1.91 लाख रुपये बकाया न चुकाने की कीमत कनेक्शन कटने के रूप में चुकानी पड़ी है। एक्सरे तो दूर, खून की मामूली जांचों तक की सुविधा नहीं है। दो डॉक्टरों सहित कुल 11 पदों के सापेक्ष सिर्फ एक डॉॅक्टर और एक फार्मासिस्ट से काम चल रहा है।
डॉ. स्वाति शर्मा का कहना है कि स्टाफ नर्स, एएनएम सहित नौ पद खाली हैं लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी बिजली का कनेक्शन कटने से हो रही है। टीकाकरण का काम किसी तरह किया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण अस्पताल की तमाम खामियों की वजह से मामूली परेशानी के लिए भी लोग 11 किमी दूर टनकपुर उप जिला अस्पताल दौड़ लगाने को मजबूर हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के दावे हवाई ही साबित हुए।
जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में कई कमियां हैं। इन्हें दूर करने के लिए कार्यवृत्त बनाया जा रहा है। टनकपुर और पाटी के अस्पतालों में एक्सरे तकनीशियन की तैनाती के आउटसोर्स एजेंसी के जरिये प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं अन्य खाली पदों और कमियों को दूर करने के लिए महानिदेशालय से आग्रह किया जा रहा है। - डॉ. केके अग्रवाल, सीएमओ, चंपावत।
जिले के अस्पतालों में व्यवस्थाओं का हाल बदहाल
पिथौरागढ़। जिले के अस्पतालों में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बदहाल हैं। चिकित्सालयों में विशेषज्ञ चिकित्सक तो दूर नर्स सहित अन्य स्टाफ की भी कमी है।
जिले में एक जिला अस्पताल, एक महिला अस्पताल के अलावा सात सीएचसी हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों सहित जिले में करीब 60 अस्पताल हैं। इसके बावजूद अधिकतर अस्पताल चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिला अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ का पद छह साल से खाली है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में महिला विशेषज्ञ न होने से प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं को महिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
अस्पतालों में तकनीशियनों के अभाव में कई मशीनें धूल फांक रहीं हैं। डीडीहाट सीएचसी में डिजिटल एक्सरे मशीन रखी गई है लेकिन तकनीशियन न होने से यह मशीन कक्ष में बंद है। थल, बलुवाकोट, जौलजीबी, बुंगाछीना, झूलाघाट समेत कई क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। अधिकतर अस्पतालों में खून की जांच की सुविधा भी नहीं है। मरीजों को ज्यादातर मामलों में जिला अस्पताल की दौड़ लगानी पड़ती है।
अस्पतालों में सुधार की खासी जरूरत है। कई प्रकार की मशीनें तकनीशियनों की कमी के चलते सीमांत के अस्पतालों में धूल फांक रही हैं। शासन-प्रशासन के साथ ही विभाग को भी अस्पतालों में बेहतर व्यवस्थाओं के लिए प्रयास करने चाहिए। - अर्चना सौन, पिथौरागढ़।
कई बार अस्पतालों में मरीजों के साथ ही तीमारदारों को अस्पताल में बेडों की कमी के चलते बरामदे में सोना पड़ता है। भविष्य को देखते हुए अस्पताल में बेडों की व्यवस्था की जाए। अस्पताल में मूलभूत सुविधाएं दुरुस्त कराना विभाग का लक्ष्य होना चाहिए। - बबीता पंगरिया पुनेठा।