{"_id":"5888d4854f1c1ba333cf5c2b","slug":"neither-blood-banks-began-to-run-not-the-trauma-center","type":"story","status":"publish","title_hn":"न ब्लड बैंक शुरू हुआ, न ट्रॉमा सेंटर चल सके","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
न ब्लड बैंक शुरू हुआ, न ट्रॉमा सेंटर चल सके
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
Updated Wed, 25 Jan 2017 10:08 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
2012 के विधानसभा चुनाव और 2017 के चुनावों के बीच पांच साल का फासला है। जिले की करीब 2.60 लाख की आबादी की स्वास्थ्य सेवा में इन पांच वर्षों में कुछ खास नहीं बदला। हाल बेहतर होने के बजाय बदतर हुए। मोटी रकम खर्च करने के बाद न ट्रॉमा सेंटर चल सके और नहीं न ब्लड बैंक शुरू हुआ। यहां तक कि सात स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की नब्ज टटोलने के लिए डॉक्टर तक नहीं है।
सीएमओ डॉ.डीएल साह का कहना है कि जिले में 94 डॉक्टरों के सापेक्ष महज 44 ही कार्यरत हैं। जिला अस्पताल, टनकपुर का संयुक्त अस्पताल हो या लोहाघाट का सीएचसी गायनाकॉलोजिस्ट, फीजिशियन, बाल रोग, अस्थि रोग सहित एक भी विशेषज्ञ डॉक्टरों का हर कहीं अकाल है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली से मरीज खटीमा, हल्द्वानी, बरेली आदि के प्राइवेट अस्पताल में मोटे खर्चे के साथ इलाज को मजबूर हैं।
डॉक्टरों की कमी से अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनबसा, तामली, स्टेट एलोपैथिक डिस्पेंसरी चल्थी, टांण, खेतीखान, स्वांला और धौन में लंबे समय से डॉक्टर नहीं है। इस वजह से टांण के लोगों को 71 किमी दूर लोहाघाट की दौड़ लगानी पड़ती है। इसी तरह रीठा साहिब, तामली, देवीधुरा सहित ढेरों दूसरे गांवों के लोगों को 40 से 61 किमी तक भागना पड़ रहा है। इलाके के लोग समय-समय पर स्वास्थ्य सेवा बेहतर करने की आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज नक्कारेखाने में तूती सरीखी रही।
विज्ञापन
जिले में दो ट्रॉमा सेंटर (टनकपुर और लोहाघाट) भवन और ब्लड बैंक भवन बने, लेकिन 2.25 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी शुरू आज तक न हो सके। स्वास्थ्य सेवा को संवारने के लिए लोहाघाट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को अक्तूबर 2013 में पीपीपी मोड में लाया गया। लेकिन प्रयोग फेल होने से अस्पताल को नवंबर 2016 से वापस पुराने ढर्रे पर शिफ्ट कर दिया गया।
विज्ञापन
सीएमओ डॉ.डीएल साह का कहना है कि जिले में 94 डॉक्टरों के सापेक्ष महज 44 ही कार्यरत हैं। जिला अस्पताल, टनकपुर का संयुक्त अस्पताल हो या लोहाघाट का सीएचसी गायनाकॉलोजिस्ट, फीजिशियन, बाल रोग, अस्थि रोग सहित एक भी विशेषज्ञ डॉक्टरों का हर कहीं अकाल है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली से मरीज खटीमा, हल्द्वानी, बरेली आदि के प्राइवेट अस्पताल में मोटे खर्चे के साथ इलाज को मजबूर हैं।
विज्ञापन
डॉक्टरों की कमी से अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनबसा, तामली, स्टेट एलोपैथिक डिस्पेंसरी चल्थी, टांण, खेतीखान, स्वांला और धौन में लंबे समय से डॉक्टर नहीं है। इस वजह से टांण के लोगों को 71 किमी दूर लोहाघाट की दौड़ लगानी पड़ती है। इसी तरह रीठा साहिब, तामली, देवीधुरा सहित ढेरों दूसरे गांवों के लोगों को 40 से 61 किमी तक भागना पड़ रहा है। इलाके के लोग समय-समय पर स्वास्थ्य सेवा बेहतर करने की आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज नक्कारेखाने में तूती सरीखी रही।
विज्ञापन
जिले में दो ट्रॉमा सेंटर (टनकपुर और लोहाघाट) भवन और ब्लड बैंक भवन बने, लेकिन 2.25 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी शुरू आज तक न हो सके। स्वास्थ्य सेवा को संवारने के लिए लोहाघाट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को अक्तूबर 2013 में पीपीपी मोड में लाया गया। लेकिन प्रयोग फेल होने से अस्पताल को नवंबर 2016 से वापस पुराने ढर्रे पर शिफ्ट कर दिया गया।