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9 साल 7 माह से जंक खा रहा चलता-फिरता अस्पताल
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चंपावत स्वास्थ्य विभाग परिसर में जंक खाती एंबुलेंस।
- फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। टनकपुर में 25 लाख रुपये कीमत की बेसिक लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस (बीएलएसए) खरीदी गई है। एक हफ्ते के भीतर इसका संचालन होगा लेकिन पहले से मौजूद एंबुलेंस नौ साल से जंग खा रही है, जबकि साढ़े 31 लाख रुपये खर्च कर जिले के लिए सचल (चलते-फिरते) अस्पताल वाहन खरीदा गया था। इसके अलावा एक ओर एंबुलेंस अनुबंध बढ़ने का इंतजार कर रही है।
बीएडीपी से टनकपुर के लिए खरीदा गया बीएलएसए स्वतंत्रता दिवस के तुरंत बाद शुरू हो जाएगा, लेकिन पुराने अनुभव अच्छे नहीं हैं। इस वक्त स्वास्थ्य विभाग परिसर में दो एंबुलेंस और एक जीप निष्प्रयोज्य है। करीब एक दशक से खड़ा सचल चिकित्सा वाहन व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा है। दिसंबर 2010 से इस वाहन ने एक भी मरीज का इलाज नहीं किया। 2006 में राष्ट्रीय सम विकास योजना से 31.50 लाख रुपये की चलित शल्य चिकित्सालय एवं परीक्षण वाहन (मोबाइल वैन) चंपावत को मिला। अस्पताल परिसर के एक कोने में रखी इस वैन पर जंग लग चुका है। धन न मिलने से मोबाइल वैन का संचालन ठप है। वैन से हर साल 72 कैंप लगाए जाने थे, लेकिन इस मोबाइल अस्पताल से महज 39 कैंप ही लग सके।
इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2009 से शुरू जैन वीडियो ऑन व्हीकल वाहन सेवा अप्रैल 2016 से ठप है। इस एंबुलेंस से ग्रामीण इलाकों में हर माह निर्धारित तिथि को 15 कैंप लगाए जाते रहे थे। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले मरीजों को निशुल्क दवाएं दी जाती थी। तीन डॉक्टर, लैब तकनीशियन, फार्मेसिस्ट, नर्स सहित कुल 11 कार्मिक वैन के जरिये ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों का इलाज करते थे। मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के डॉक्टरविहीन, अस्पतालविहीन इलाकों को लाभ मिल रहा था लेकिन यह सेवा भी 2016 से जवाब दे गई। ग्रामीणों का कहना है कि इस सेवा के ठप होने से सड़क से लगे अस्पतालविहीन दूरदराज के गांवों के लोगों की परेशानी बढ़ी। यह धन की भी बर्बादी है।
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जैन व्हीकल सचल सेवा का अनुबंध मार्च 2016 से आगे न बढ़ने से सेवा आगे संचालित नहीं हो सकी, जबकि राष्ट्रीय सम विकास योजना से खरीदी गई मोबाइल वैन को चलाने के लिए शुरू में बजट की कमी रही और अब यह वाहन कबाड़ हो चुका है।
- डॉ. आरपी खंडूरी, सीएमओ, चंपावत।
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बीएडीपी से टनकपुर के लिए खरीदा गया बीएलएसए स्वतंत्रता दिवस के तुरंत बाद शुरू हो जाएगा, लेकिन पुराने अनुभव अच्छे नहीं हैं। इस वक्त स्वास्थ्य विभाग परिसर में दो एंबुलेंस और एक जीप निष्प्रयोज्य है। करीब एक दशक से खड़ा सचल चिकित्सा वाहन व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा है। दिसंबर 2010 से इस वाहन ने एक भी मरीज का इलाज नहीं किया। 2006 में राष्ट्रीय सम विकास योजना से 31.50 लाख रुपये की चलित शल्य चिकित्सालय एवं परीक्षण वाहन (मोबाइल वैन) चंपावत को मिला। अस्पताल परिसर के एक कोने में रखी इस वैन पर जंग लग चुका है। धन न मिलने से मोबाइल वैन का संचालन ठप है। वैन से हर साल 72 कैंप लगाए जाने थे, लेकिन इस मोबाइल अस्पताल से महज 39 कैंप ही लग सके।
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इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2009 से शुरू जैन वीडियो ऑन व्हीकल वाहन सेवा अप्रैल 2016 से ठप है। इस एंबुलेंस से ग्रामीण इलाकों में हर माह निर्धारित तिथि को 15 कैंप लगाए जाते रहे थे। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले मरीजों को निशुल्क दवाएं दी जाती थी। तीन डॉक्टर, लैब तकनीशियन, फार्मेसिस्ट, नर्स सहित कुल 11 कार्मिक वैन के जरिये ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों का इलाज करते थे। मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के डॉक्टरविहीन, अस्पतालविहीन इलाकों को लाभ मिल रहा था लेकिन यह सेवा भी 2016 से जवाब दे गई। ग्रामीणों का कहना है कि इस सेवा के ठप होने से सड़क से लगे अस्पतालविहीन दूरदराज के गांवों के लोगों की परेशानी बढ़ी। यह धन की भी बर्बादी है।
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जैन व्हीकल सचल सेवा का अनुबंध मार्च 2016 से आगे न बढ़ने से सेवा आगे संचालित नहीं हो सकी, जबकि राष्ट्रीय सम विकास योजना से खरीदी गई मोबाइल वैन को चलाने के लिए शुरू में बजट की कमी रही और अब यह वाहन कबाड़ हो चुका है।
- डॉ. आरपी खंडूरी, सीएमओ, चंपावत।