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तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत।
Updated Wed, 01 Nov 2017 10:42 PM IST
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चंपावत में तुलसी का उद्यापन करतीं श्रद्धालु महिला।
- फोटो : अमर उजाला
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जिले भर में तुलसी माता का उद्यापन किया गया। साथ ही तुलसी और शालिग्राम का विवाह भी संपन्न हुआ। महिलाओं ने कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से उपवास शुरू किया। जिसे द्वादशी को तुलसी के उद्यापन संपन्न करने के बाद तोड़ा।
पंडित प्रेम बल्लभ जोशी ने बताया कि ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी की स्थापना की जाती है। जबकि कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न होता है। इस दिन महिलाएं तुलसी का उद्यापन भी करती हैं। उन्होंने बताया कि महिलाएं एकादशी से व्रत प्रारंभ करती हैं। जिसे तुलसी उद्यापन और विवाह के बाद ही व्रत तोड़ा जाता है। पदमपुराण के अनुसार तुलसी पूर्व जन्म में जलंधर नामक दैत्य की पत्नी वृंदा थी। जलंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने छल से वृंदा का सतीत्व भंग किया था। युद्ध में पति जलंधर की मृत्यु होने पर वृंदा ने विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया। और पति जलंधर के शव के साथ सती हो गई।
कहा जाता है कि उसकी राख से एक पौधा निकला। तब भगवान विष्णु ने कहा कि आज से ये पौधा तुलसी के नाम से जाना जाएगा, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी के साथ पूजा जाएगा। तभी से भगवान विष्णु के वरदान से तुलसी का पौधा समस्त लोकों में पूजा जाने लगा। और तभी से कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तुलसी और शालिग्राम का विवाह करने की परंपरा शुरू हुई।
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पंडित प्रेम बल्लभ जोशी ने बताया कि ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी की स्थापना की जाती है। जबकि कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न होता है। इस दिन महिलाएं तुलसी का उद्यापन भी करती हैं। उन्होंने बताया कि महिलाएं एकादशी से व्रत प्रारंभ करती हैं। जिसे तुलसी उद्यापन और विवाह के बाद ही व्रत तोड़ा जाता है। पदमपुराण के अनुसार तुलसी पूर्व जन्म में जलंधर नामक दैत्य की पत्नी वृंदा थी। जलंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने छल से वृंदा का सतीत्व भंग किया था। युद्ध में पति जलंधर की मृत्यु होने पर वृंदा ने विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया। और पति जलंधर के शव के साथ सती हो गई।
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कहा जाता है कि उसकी राख से एक पौधा निकला। तब भगवान विष्णु ने कहा कि आज से ये पौधा तुलसी के नाम से जाना जाएगा, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी के साथ पूजा जाएगा। तभी से भगवान विष्णु के वरदान से तुलसी का पौधा समस्त लोकों में पूजा जाने लगा। और तभी से कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तुलसी और शालिग्राम का विवाह करने की परंपरा शुरू हुई।
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