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अपनी विशिष्ट गायन शैली के लिए विख्यात है काली कुमाऊं की खड़ी होली
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लोहाघाट के रायनगर चौड़ी में खड़ी होली का गायन करते होल्यार।
- फोटो : LOHAGHAT
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चंपावत। यूं तो होली पूरे देश में परंपरागत हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन चंपावत जिले में ढोल नगाड़ों की धुन और लय-ताल के साथ थिरकते नृत्य के साथ गाई जाने वाली खड़ी होली अपना विशेष स्थान रखती है।
संगीत सुरों के बीच बैठकी होली के भक्ति, शृंगार, संयोग, वियोग से भरे गीत गाने की परंपरा काली कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में चली आ रही है। एकादशी को रंगों की शुरूआत के बाद गांव-गांव में ढोल-झांझर और पैरों की विशेष कदम ताल के साथ खड़ी होली गायन चलता है। इसी दिन चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से होली गायन शुरू किया जाता है। इसमें शिव के मन माहि बसे काशी..., हरि धरै मुकुट खेले होरी... आदि शामिल है। आध्यात्मिक रसों, भक्ति, शृंगार आदि से जुड़ीं होलियों का गायन छरड़ी तक किया जाता है। इसके अलावा परिवार, समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, स्त्री पुरुष प्रसंग, हास्य ठिठोली से भरी होलियां भी गाई जाती हैं।
हर होली गीत से छलकता है अलग रंग
:- ‘हम घर पिया परदेश, बदरिया जन बरसों, पश्विम दिशा घनघोर बदरिया जन बरसों’ होली होली गीत में जहां जोबन की ज्वाला में दहक रही यौवना प्रकृति से विनय करते दिखती है तो वहीं ‘पतली कमर, लंबे केस, सुघड़ जल भरन चली पनघट पर...’ हो या 01 : ‘चल कहो तो यहीं रम जाए, गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे’ सरीखे होली गीत नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं।
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:- ‘पिया के विरह में भई हूं मै बावरी, विरह कलेजुआ में चोट दई रे...’ और ‘आज पिया के गलेवा लगूंगी, कलंक लगे सो लगे हो, सास बुरी गोरी, ननद हठीली, देवरा लड़ै तो, लड़ै हूं’ जैसे होली गीतों में विरह बखूबी झलकता है।
:- ‘जल कैसे भरूं जमुना गहरी, ठाड़ेे भरूं राजा राम जी देखे, बैठी भरूं छलके गगरी’ में अपने परिधान को लेकर स्वयं महिला की परेशानी झलकती है।
:- ‘अब कैसे जोबना बचाओगी गोरी, फागुन मस्त महीना की होरी’ होली गीत में भरपूर जोबन से इठलाती गोरी को सखियां फागुन में पशोपेश में डाल देती हैं।
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संगीत सुरों के बीच बैठकी होली के भक्ति, शृंगार, संयोग, वियोग से भरे गीत गाने की परंपरा काली कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में चली आ रही है। एकादशी को रंगों की शुरूआत के बाद गांव-गांव में ढोल-झांझर और पैरों की विशेष कदम ताल के साथ खड़ी होली गायन चलता है। इसी दिन चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से होली गायन शुरू किया जाता है। इसमें शिव के मन माहि बसे काशी..., हरि धरै मुकुट खेले होरी... आदि शामिल है। आध्यात्मिक रसों, भक्ति, शृंगार आदि से जुड़ीं होलियों का गायन छरड़ी तक किया जाता है। इसके अलावा परिवार, समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, स्त्री पुरुष प्रसंग, हास्य ठिठोली से भरी होलियां भी गाई जाती हैं।
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हर होली गीत से छलकता है अलग रंग
:- ‘हम घर पिया परदेश, बदरिया जन बरसों, पश्विम दिशा घनघोर बदरिया जन बरसों’ होली होली गीत में जहां जोबन की ज्वाला में दहक रही यौवना प्रकृति से विनय करते दिखती है तो वहीं ‘पतली कमर, लंबे केस, सुघड़ जल भरन चली पनघट पर...’ हो या 01 : ‘चल कहो तो यहीं रम जाए, गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे’ सरीखे होली गीत नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं।
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:- ‘पिया के विरह में भई हूं मै बावरी, विरह कलेजुआ में चोट दई रे...’ और ‘आज पिया के गलेवा लगूंगी, कलंक लगे सो लगे हो, सास बुरी गोरी, ननद हठीली, देवरा लड़ै तो, लड़ै हूं’ जैसे होली गीतों में विरह बखूबी झलकता है।
:- ‘जल कैसे भरूं जमुना गहरी, ठाड़ेे भरूं राजा राम जी देखे, बैठी भरूं छलके गगरी’ में अपने परिधान को लेकर स्वयं महिला की परेशानी झलकती है।
:- ‘अब कैसे जोबना बचाओगी गोरी, फागुन मस्त महीना की होरी’ होली गीत में भरपूर जोबन से इठलाती गोरी को सखियां फागुन में पशोपेश में डाल देती हैं।