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सेनानी का आधा अधूरा नाम लिखकर कर दी इतिश्री
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
Updated Fri, 09 Jun 2017 10:30 PM IST
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कालेज में लिखा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आधा अधूरा नाम
- फोटो : अमर उजाला
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सूखीढांग क्षेत्र के नामी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रामचंद्र चौड़ाकोटी ने भले ही आजादी की जंग में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। लेकिन आजादी मिलने के सात दशक बाद भी सेनानी के नाम को समुचित सम्मान नहीं मिल पाया है। इसका जीता जागता उदाहरण है जीआईसी सूखीढांग है। इस कालेज का नामकरण सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी के नाम पर किए जाने का शासनादेश जारी होने के बाद भी इसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पूरा नाम नहीं लिखा गया है।
शासन की ओर से 26 दिसंबर 2015 को जीआईसी सूखीढांग का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय रामचंद्र चौड़ाकोटी किए जाने संबंधी आदेश जारी किया था। लेकिन शिक्षा विभाग की ओर से पहले तो एक साल तक इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई। उसके बाद सेनानी उत्तराधिकारी कल्याण परिषद की ओर से दबाव बनाने पर कालेज प्रशासन ने एक दस मीटर की फ्लैक्सी पर सेनानी का आधा अधूरा नाम लिखकर कालेज की दीवार में चिपका दिया गया। जिसमें केवल सेनानी रामचंद्र ही लिखा गया है। इस मामले में विभाग ने सेनानी उत्तराधिकारी कल्याण परिषद की आपत्ति को भी दरकिनार कर दिया गया।
उत्तराधिकारी कल्याण परिषद के अध्यक्ष महेश चंद्र चौड़ाकोटी का कहना है कि न तो स्कूल गेट में ही सेनानी का नाम लिखा गया है, एक फ्लैक्सी में नाम लिखा गया है तो वह भी आधा अधूरा। दूसरी ओर विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रेम सिंह का कहना है कि संबंधित फ्लैक्सी में केवल 40 अक्षर ही शामिल किए जाने की बाध्यता के चलते सेनानी का पूरा नाम नहीं लिखा जा सका है।
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डेढ़ साल में नहीं बदली जा सकी स्कूल की मुहर
चंपावत। जीआईसी सूखीढांग का नामकरण सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी करने का शासनादेश भले ही डेढ़ वर्ष पूर्व जारी हो गया हो, लेकिन अभी तक स्कूल की पत्रावलियों और अभिलेखों में सेनानी का नाम अंकित नहीं हो सका है। स्कूल प्रबंध समिति के केएन तिवारी का कहना है कि डेढ़ साल में स्कूल की मुहर में भी सेनानी का नाम नहीं जुड़ सका है।
क्षेत्र ने दिए हैं सात-सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
चंपावत। जिले के सूखीढांग और चौड़ाकोट क्षेत्र को स्वाधीनता के संग्राम में सात-सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देने का गौरव हासिल है। पंडित रामचंद्र चौड़ाकोटी के अलावा बेनीराम चौड़ाकोटी, पदमादत्त चौड़ाकोटी, जयदत्त चौड़ाकोटी, चूणामणी जोशी, चिंतामणी जोशी और बची सिंह राना ने आजादी की जंग में अंग्रेजी हुकूमत को नाकों चने चबाने के लिए विवश किया था।
भारत छोड़ो आंदोलन में मिली थी 50 रुपये अर्थदंड की सजा
चंपावत। एक जनवरी 1914 को किसान परिवार में जन्मे रामचंद्र चौड़ाकोटी ने स्वाधीनता आंदोलन में दो बार जेल में भी अनशन किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 50 रुपये के अर्थदंड के अलावा अल्मोड़ा से लेकर बरेली तक जेल की यात्राएं की। प्राइमरी से आगे की पढ़ाई के लिए खेतीखान गए रामचंद्र काली कुमाऊं के शेर के नाम से विख्यात सेनानी पंडित हर्षदेव ओली के संपर्क में आए और आजादी की जंग में कूद गए।
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शासन की ओर से 26 दिसंबर 2015 को जीआईसी सूखीढांग का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय रामचंद्र चौड़ाकोटी किए जाने संबंधी आदेश जारी किया था। लेकिन शिक्षा विभाग की ओर से पहले तो एक साल तक इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई। उसके बाद सेनानी उत्तराधिकारी कल्याण परिषद की ओर से दबाव बनाने पर कालेज प्रशासन ने एक दस मीटर की फ्लैक्सी पर सेनानी का आधा अधूरा नाम लिखकर कालेज की दीवार में चिपका दिया गया। जिसमें केवल सेनानी रामचंद्र ही लिखा गया है। इस मामले में विभाग ने सेनानी उत्तराधिकारी कल्याण परिषद की आपत्ति को भी दरकिनार कर दिया गया।
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उत्तराधिकारी कल्याण परिषद के अध्यक्ष महेश चंद्र चौड़ाकोटी का कहना है कि न तो स्कूल गेट में ही सेनानी का नाम लिखा गया है, एक फ्लैक्सी में नाम लिखा गया है तो वह भी आधा अधूरा। दूसरी ओर विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रेम सिंह का कहना है कि संबंधित फ्लैक्सी में केवल 40 अक्षर ही शामिल किए जाने की बाध्यता के चलते सेनानी का पूरा नाम नहीं लिखा जा सका है।
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डेढ़ साल में नहीं बदली जा सकी स्कूल की मुहर
चंपावत। जीआईसी सूखीढांग का नामकरण सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी करने का शासनादेश भले ही डेढ़ वर्ष पूर्व जारी हो गया हो, लेकिन अभी तक स्कूल की पत्रावलियों और अभिलेखों में सेनानी का नाम अंकित नहीं हो सका है। स्कूल प्रबंध समिति के केएन तिवारी का कहना है कि डेढ़ साल में स्कूल की मुहर में भी सेनानी का नाम नहीं जुड़ सका है।
क्षेत्र ने दिए हैं सात-सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
चंपावत। जिले के सूखीढांग और चौड़ाकोट क्षेत्र को स्वाधीनता के संग्राम में सात-सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देने का गौरव हासिल है। पंडित रामचंद्र चौड़ाकोटी के अलावा बेनीराम चौड़ाकोटी, पदमादत्त चौड़ाकोटी, जयदत्त चौड़ाकोटी, चूणामणी जोशी, चिंतामणी जोशी और बची सिंह राना ने आजादी की जंग में अंग्रेजी हुकूमत को नाकों चने चबाने के लिए विवश किया था।
भारत छोड़ो आंदोलन में मिली थी 50 रुपये अर्थदंड की सजा
चंपावत। एक जनवरी 1914 को किसान परिवार में जन्मे रामचंद्र चौड़ाकोटी ने स्वाधीनता आंदोलन में दो बार जेल में भी अनशन किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 50 रुपये के अर्थदंड के अलावा अल्मोड़ा से लेकर बरेली तक जेल की यात्राएं की। प्राइमरी से आगे की पढ़ाई के लिए खेतीखान गए रामचंद्र काली कुमाऊं के शेर के नाम से विख्यात सेनानी पंडित हर्षदेव ओली के संपर्क में आए और आजादी की जंग में कूद गए।