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स्वतंत्रता सेनानी नहीं गदर का यौद्धा
ब्यूरो/अमर उजाला/चंपावत
Updated Wed, 22 Apr 2015 11:35 PM IST
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में आजादी की जंग की चिंगारी फैलाने वाले वीर कालू सिंह माहरा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं हैं। न जिला प्रशासन और न ही प्रदेश शासन उन्हें सेनानी मानने को तैयार है। शासन ने 7 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजे पत्र में कालू को स्वतंत्रता सेनानी मानने से इंकार कर दिया है।
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उप सचिव आरआर सिंह के हस्ताक्षर से भारत सरकार के गृह मंत्रालय को भेजे पत्र में कहा गया है कि स्व. कालू माहरा को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित किया जाना मुमकिन नहीं है। प्रदेश शासन ने इसके लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नियमावली और डीएम द्वारा प्राप्त आख्या को आधार बनाया है। डीएम दीपेंद्र कुमार चौधरी ने 16 फरवरी को शासन को भेजे पत्र में सेनानी से संबंधित कोई भी साक्ष्य नहीं मिलने का जिक्र किया है। उनका कहना है कि मौजूदा नियमावली में सेनानी घोषित करने के लिए साक्ष्य जरूरी है। सबूत नहीं होने से उन्हें सेनानी का दर्जा देना मुमकिन नहीं है।
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ये था कालू का आजादी में योगदान
चंपावत। कुमाऊं का स्वाधीनता संग्राम में योगदान पत्रिका के मुताबिक काली कुमाऊं में गदर में शिरकत के लिए कालू माहरा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा बना। इन लड़ाकों ने लोहाघाट की बैरक में आग लगाकर अंग्रेजों को भगाया। कमिश्नर रैमजे ने टनकपुर और लोहाघाट से सैनिकों की टुकड़ी भेज इन आंदोलनकारियों को रोका। बस्टिया में कालू माहरा ने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। बद्रीदत्त पांडेय की पुस्तक ‘कुमाऊं का इतिहास’ में कालू माहरा को कई जेलों में रखने का जिक्र है।
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