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जुर्माना अदा करने को बेच दिए थे खेत-खलिहान
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लाल सिंह प्रथोली। (फाइल फोटो)
- फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। सीमांत जाख धौनी सीलिंग के लाल सिंह प्रथोली का आजादी में अहम योगदान रहा है। जंग-ए-आजादी के दौरान अंग्रेजी हुकूमत की आंखों की किरकिरी बने सेनानी प्रथोली को दस रुपये का जुर्माना लगाया गया था। इस जुर्माने को चुकाने के लिए सेनानी प्रथोली ने खेत-खलिहान तक बेचने से गुरेज नहीं किया। उन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने 1941 में दस रुपये के अर्थदंड के साथ तीन महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
आजादी के लिए चले संग्राम में 1940 से हिस्सा लेने के बाद कई तरह की यातनाएं सही। स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण 15 अप्रैल 1941 को उन पर तीन माह का कठोर कारावास और दस रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माने को अंग्रेजों ने उनकी जेल अवधि में ही उनके घर में उनके परिवार वालों को प्रताड़ित कर वसूल किया। सेनानी के पुत्र गुमान सिंह बताते हैं कि 14 जुलाई 1941 को रिहा होने के बाद पिता लाल सिंह ने खेत-खलिहान बेच कर लोगों की ओर से दी गई अर्थदंड की रकम चुकाई।
लाल सिंह जगह-जगह आजादी को लेकर होने वाले प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के साथ अपने गांव के लोगों को प्रेरित करते थे। 1942 व 1943 में गिरफ्तारी के वारंट से बचने के लिए लगातार दो साल तक भूमिगत रहकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। 25 दिसंबर 1971 को अंतिम सांस लेने तक वे समाज को जगाते रहे। सेनानी लाल सिंह के नाम पर चंपावत राजकीय डिग्री कॉलेज के नाम का प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव दो साल से ठंडे बस्ते में है।
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आजादी के लिए चले संग्राम में 1940 से हिस्सा लेने के बाद कई तरह की यातनाएं सही। स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण 15 अप्रैल 1941 को उन पर तीन माह का कठोर कारावास और दस रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माने को अंग्रेजों ने उनकी जेल अवधि में ही उनके घर में उनके परिवार वालों को प्रताड़ित कर वसूल किया। सेनानी के पुत्र गुमान सिंह बताते हैं कि 14 जुलाई 1941 को रिहा होने के बाद पिता लाल सिंह ने खेत-खलिहान बेच कर लोगों की ओर से दी गई अर्थदंड की रकम चुकाई।
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लाल सिंह जगह-जगह आजादी को लेकर होने वाले प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के साथ अपने गांव के लोगों को प्रेरित करते थे। 1942 व 1943 में गिरफ्तारी के वारंट से बचने के लिए लगातार दो साल तक भूमिगत रहकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। 25 दिसंबर 1971 को अंतिम सांस लेने तक वे समाज को जगाते रहे। सेनानी लाल सिंह के नाम पर चंपावत राजकीय डिग्री कॉलेज के नाम का प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव दो साल से ठंडे बस्ते में है।
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