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छीनी गोठ में वन भूमि ने छीनीं सुविधाएं
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छीनीगोठ जाने वाली कठिन राहें। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : TANAKPUR
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छीनी गोठ (चंद्रशेखर जोशी )। टनकपुर से सिर्फ सात किलोमीटर दूर है छीनी गोठ लेकिन इतने पास के गांव तक पहुंचना लोगों के लिए कतई आसान नहीं है। सियासी रणबांकुरों के तो यहां पहुंचते-पहुंचते पसीने ही छूट जाते हैं। इसके चलते अपने जन प्रतिनिधियों से गांव के लोग कम ही रूबरू हो पाते हैं। राजस्व और वन भूमि के विवाद में उलझे इस गांव का विकास भी मझधार में लटक गया है। गांव के लिए बन रही सड़क भी कई जगह खेतों को रौंदते हुए आगे बढ़ रही है। दो से अधिक ग्रामीणों के मकान और गोशाला भी इसकी जद में है। और सड़क निर्माण के लिए चल रही जेसीबी ने ये सब बिना अनुमति के किया है। जिस सवा तीन किमी सड़क के गांव में पहुंचने पर हर किसी के चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए थी, उस सड़क के कटान से तीन बीघा से अधिक जमीन बगैर किसी मुआवजे के जमींदोज होने से मायूसी है। वन भूमि होने की मार आवास योजना, सरकारी भवन, सार्वजनिक शौचालय निर्माण से लेकर विकास की तमाम योजनाओं पर पड़ रहा है।
तीन गांवों वाले छीनी गोठ ग्राम पंचायत की करीब दो हजार बीघा जमीन में से 723 बीघा राजस्व की है। बकाया जमीन को लेकर राजस्व और वन विभाग के अपने-अपने दावे हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक 1712 की आबादी वाली इस पंचायत में इस वक्त तीन हजार से अधिक लोग रह रहे हैं लेकिन इतनी बड़ी आबादी आपात सेवा 108 की एंबुलेंस की भी सुविधा से दूर है। कायदे का रास्ता नहीं होना एंबुलेंस की राह रोकता है। एएनएम केंद्र या किसी तरह की स्वास्थ्य सुविधा का तो खैर सवाल ही कहां उठता है।
छीनी गोठ में जिले का अकेला राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज है, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों के छात्र पढ़ते हैं लेकिन विडंबना देखिए, इस गांव के छात्र-छात्राओं के लिए दसवीं से आगे की पढ़ाई की सुविधा गांव में नहीं है। इसके लिए उन्हें टनकपुर जाना पड़ता है। इतने से ही गांव की चुनौतियों पर विराम नहीं लगता है। गांव की दुश्वारियों की लंबी फेहरिस्त तो अभी बाकी है। सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश जोशी कहते हैं कि नदी से भूकटाव, खेती के लिए आफत बन रहे जंगली जानवर और जलभराव ने यहां के लोगों का जीना दूभर कर रखा है। मथुरादत्त जैसे अनेक लोग हैं, जिनकी जमीन हर साल नदी निगल जाती है।
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ग्रामीणों का कहना हैं कि उनकी जिंदगी की भले ही सियासत को फिक्र ना हो लेकिन वोटों की खातिर हर बार की तरह 14 फरवरी को होने वाले इस चुनाव में भी वे दस्तक देने की रस्म जरूर निभाएंगे। गांव के 1507 वोटरों का जो सवाल है, उन्हें वादों के सब्जबाग दिखाएंगे और फिर गांव वाले अगले चुनाव का इंतजार करेंगे...।
खेतीखान के युवा मुकेश डेरी खोल दिखा रहे राह
छीनीगोठ (चंपावत)। रोजी-रोटी की चुनौतियों से जूझ रहे इस गांव में एक युवक ने उम्मीद की किरण जगाई है। खेतीखान क्षेत्र के मुकेश चंद्र ने 117 किमी दूर छीनी गोठ में पिछले साल सितंबर से बड़े पैमाने पर दुग्ध उत्पादन का काम शुरू किया है। वे गांव से रोज दूध एकत्र कर करीब 100 लीटर से ज्यादा दूध चंपावत दुग्ध उत्पादन सहकारी संघ को भेजते हैं। इससे गांव के लोगों को दूध का बेहतर दाम मिल रहा है। इसके अलावा गांव में जिओ का मोबाइल नेटवर्क ठीक होने से कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई में बाधा नहीं आई।
ये हैं गांव की प्रमुख चुनौतियां:
1.राजस्व और वन भूमि विवाद के चलते विकास में अड़चन, मनरेगा के काम भी लटक रहे।
2.नदी से गांव के किनारे वाले हिस्से में भूकटाव।
3.जंगली जानवरों से फसल बचाना हो रहा मुश्किल।
4.ना कोई स्वास्थ्य केंद्र और नहीं आपात सेवा 108 की एंबुलेंस।
5.हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं।
अधिकारी का कोट:
छीनी गोठ ग्राम पंचायत की जमीन के बड़े हिस्से में वन विभाग अपना दावा करता है, लेकिन वन और राजस्व विभाग के अभिलेखों में अंतर है। जमीन के स्वामित्व संबंधी विवाद को निपटाने के लिए काम किया जा रहा है। वहीं गांव में बन रही सवा तीन किमी सड़क का बड़ा हिस्सा गैर वन जमीन में है। - हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम, टनकपुर।
क्या कहते हैं मतदाता:
तीन साल पहले आवास मिलने वालों की सूची में नाम आया, लेकिन जियो टैग होने के बावजूद अभी एक भी रुपया नहीं मिला है। जंगलात की अड़चन से बहुत दिक्कत होती है। नहीं खेतीबाड़ी है और नहीं कोई दूसरा काम। - माया पंत।
रोड बनने से तो जरूर फायदा होगा। लेकिन नदी गांव के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है। भूकटाव रोकने के लिए कार्ययोजना तुरंत बनाई जानी चाहिए। - राधा भंडारी, पूर्व प्रधान।
नदी के बहाव से भूकटाव होने से खेती वाली जमीन बर्बाद हो रही है। जंगली जानवरों से फसल की बर्बादी के साथ छोटे बच्चों को भी हर वक्त डर लगा रहता है। - मोहन जुकरिया।
गांव में सड़क आ रही है, इसकी खुशी थी। लेकिन सड़क के गलत समरेखन ने उनकी तीन बीघा जमीन काट दी। ना कोई मुआवजा मिला और नहीं कोई सुन रहा है। - कृष्णा जोशी।
बरसात में नाले का पानी पुलिया के ऊपर से आने से गुजरना मुश्किल होता है। केंद्रीय विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों को सात किमी अतिरिक्त जाना पड़ता है। - राजेंद्र धामी, पूर्व फौजी।
सड़क सबको चाहिए, लेकिन सड़क बनाने वालों ने उनकी गोशाला और मकान को भी खतरे में डाल दिया है। विभाग की गलती से उन्हें बड़ा नुकसान हो रहा है। हर कोई अनसुनी कर रहा है। खष्टीबल्लभ जोशी।
नदी के किनारे जंगल से लगे छीनी गोठ गांव में अनदेखी से परेशानी बढ़ रही है। गांव की जमीन को हर साल नुकसान होता है। लेकिन बचाव के लिए वायर क्रेटर नहीं मिल रहे हैं। इसी तरह हाथी और सूअर से फसलों की सुरक्षा के लिए दीवार की सख्त जरूरत है। - पूजा जोशी, ग्राम प्रधान।
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तीन गांवों वाले छीनी गोठ ग्राम पंचायत की करीब दो हजार बीघा जमीन में से 723 बीघा राजस्व की है। बकाया जमीन को लेकर राजस्व और वन विभाग के अपने-अपने दावे हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक 1712 की आबादी वाली इस पंचायत में इस वक्त तीन हजार से अधिक लोग रह रहे हैं लेकिन इतनी बड़ी आबादी आपात सेवा 108 की एंबुलेंस की भी सुविधा से दूर है। कायदे का रास्ता नहीं होना एंबुलेंस की राह रोकता है। एएनएम केंद्र या किसी तरह की स्वास्थ्य सुविधा का तो खैर सवाल ही कहां उठता है।
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छीनी गोठ में जिले का अकेला राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज है, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों के छात्र पढ़ते हैं लेकिन विडंबना देखिए, इस गांव के छात्र-छात्राओं के लिए दसवीं से आगे की पढ़ाई की सुविधा गांव में नहीं है। इसके लिए उन्हें टनकपुर जाना पड़ता है। इतने से ही गांव की चुनौतियों पर विराम नहीं लगता है। गांव की दुश्वारियों की लंबी फेहरिस्त तो अभी बाकी है। सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश जोशी कहते हैं कि नदी से भूकटाव, खेती के लिए आफत बन रहे जंगली जानवर और जलभराव ने यहां के लोगों का जीना दूभर कर रखा है। मथुरादत्त जैसे अनेक लोग हैं, जिनकी जमीन हर साल नदी निगल जाती है।
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ग्रामीणों का कहना हैं कि उनकी जिंदगी की भले ही सियासत को फिक्र ना हो लेकिन वोटों की खातिर हर बार की तरह 14 फरवरी को होने वाले इस चुनाव में भी वे दस्तक देने की रस्म जरूर निभाएंगे। गांव के 1507 वोटरों का जो सवाल है, उन्हें वादों के सब्जबाग दिखाएंगे और फिर गांव वाले अगले चुनाव का इंतजार करेंगे...।
खेतीखान के युवा मुकेश डेरी खोल दिखा रहे राह
छीनीगोठ (चंपावत)। रोजी-रोटी की चुनौतियों से जूझ रहे इस गांव में एक युवक ने उम्मीद की किरण जगाई है। खेतीखान क्षेत्र के मुकेश चंद्र ने 117 किमी दूर छीनी गोठ में पिछले साल सितंबर से बड़े पैमाने पर दुग्ध उत्पादन का काम शुरू किया है। वे गांव से रोज दूध एकत्र कर करीब 100 लीटर से ज्यादा दूध चंपावत दुग्ध उत्पादन सहकारी संघ को भेजते हैं। इससे गांव के लोगों को दूध का बेहतर दाम मिल रहा है। इसके अलावा गांव में जिओ का मोबाइल नेटवर्क ठीक होने से कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई में बाधा नहीं आई।
ये हैं गांव की प्रमुख चुनौतियां:
1.राजस्व और वन भूमि विवाद के चलते विकास में अड़चन, मनरेगा के काम भी लटक रहे।
2.नदी से गांव के किनारे वाले हिस्से में भूकटाव।
3.जंगली जानवरों से फसल बचाना हो रहा मुश्किल।
4.ना कोई स्वास्थ्य केंद्र और नहीं आपात सेवा 108 की एंबुलेंस।
5.हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं।
अधिकारी का कोट:
छीनी गोठ ग्राम पंचायत की जमीन के बड़े हिस्से में वन विभाग अपना दावा करता है, लेकिन वन और राजस्व विभाग के अभिलेखों में अंतर है। जमीन के स्वामित्व संबंधी विवाद को निपटाने के लिए काम किया जा रहा है। वहीं गांव में बन रही सवा तीन किमी सड़क का बड़ा हिस्सा गैर वन जमीन में है। - हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम, टनकपुर।
क्या कहते हैं मतदाता:
तीन साल पहले आवास मिलने वालों की सूची में नाम आया, लेकिन जियो टैग होने के बावजूद अभी एक भी रुपया नहीं मिला है। जंगलात की अड़चन से बहुत दिक्कत होती है। नहीं खेतीबाड़ी है और नहीं कोई दूसरा काम। - माया पंत।
रोड बनने से तो जरूर फायदा होगा। लेकिन नदी गांव के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है। भूकटाव रोकने के लिए कार्ययोजना तुरंत बनाई जानी चाहिए। - राधा भंडारी, पूर्व प्रधान।
नदी के बहाव से भूकटाव होने से खेती वाली जमीन बर्बाद हो रही है। जंगली जानवरों से फसल की बर्बादी के साथ छोटे बच्चों को भी हर वक्त डर लगा रहता है। - मोहन जुकरिया।
गांव में सड़क आ रही है, इसकी खुशी थी। लेकिन सड़क के गलत समरेखन ने उनकी तीन बीघा जमीन काट दी। ना कोई मुआवजा मिला और नहीं कोई सुन रहा है। - कृष्णा जोशी।
बरसात में नाले का पानी पुलिया के ऊपर से आने से गुजरना मुश्किल होता है। केंद्रीय विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों को सात किमी अतिरिक्त जाना पड़ता है। - राजेंद्र धामी, पूर्व फौजी।
सड़क सबको चाहिए, लेकिन सड़क बनाने वालों ने उनकी गोशाला और मकान को भी खतरे में डाल दिया है। विभाग की गलती से उन्हें बड़ा नुकसान हो रहा है। हर कोई अनसुनी कर रहा है। खष्टीबल्लभ जोशी।
नदी के किनारे जंगल से लगे छीनी गोठ गांव में अनदेखी से परेशानी बढ़ रही है। गांव की जमीन को हर साल नुकसान होता है। लेकिन बचाव के लिए वायर क्रेटर नहीं मिल रहे हैं। इसी तरह हाथी और सूअर से फसलों की सुरक्षा के लिए दीवार की सख्त जरूरत है। - पूजा जोशी, ग्राम प्रधान।