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दिव्य है दिव्यांग राकेश का बेटा हिमांशु
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
Updated Tue, 30 May 2017 10:46 PM IST
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हाईस्कूल की परीक्षा में प्रदेश में बीसवां स्थान हांसिल करने वाले हिमांशु का मुंह मीठा करते दादा-दादी
- फोटो : अमर उजाला
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मंगलवार अपरान्ह करीब 12.30 बजे बेटे हिमांशु ने जैसे ही सिर्तोली गांव में रहने वाली मां कुसुम और पिता राकेश चंद्र गहतोड़ी को हाइस्कूल बोर्ड की परीक्षा में 94 प्रतिशत नंबर के साथ पास होने की फोन पर खबर दी, माता-पिता फोन पर ही खुशी के आंसू रो पड़े। हाइस्कूल में प्रदेश की मेरिट में 20वें स्थान पर आने वाले विवेकानंद विद्या मंदिर इंटर कॉलेज के हिमांशु के पिता दिव्यांग हैं। गुजर-बसर के लिए दिव्यांग पिता की दिव्यांग पेंशन, चाचा की अतिथि शिक्षक की नौकरी और दादा की बमुश्किल दस हजार रुपये की पेंशन सहारा है।
दादा-दादी और चाचा-चाची के साथ चंपावत में किराए के दो कमरे में रहने वाले हिमांशु गहतोड़ी के लिए मेरिट में जगह बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। अतिथि शिक्षक रहे चाचा गिरीश गहतोड़ी बताते हैं कि हिमांशु जिस कमरे में पढ़ता है, उस कमरे में कुल छह लोग रहते हैं। दूसरे कमरे में परिवार के दो अन्य लोग रहते हैं। पर परिवार की कमजोर स्थिति से उसे ताकत मिली और खूब मेहनत करने की ठानी। सीमा सुरक्षा बल से दो दशक पहले रिटायर हुए दादा पुरुषोत्तम बताते हैं कि रोजाना सुबह तीन बजे उठकर नियमित रूप से छह घंटे घर में पढ़ाई करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा रहा है। घर में टेलीविजन के कार्यक्रमों से भी उसका कोई वास्ता नहीं। घर में रसायन विज्ञान में अतिरिक्त मेहनत चाचा कराते, तो स्कूल के आचार्य दीपक पाटनी उसकी गणित में मदद करते और आज मेहनत का नतीजा सबके सामने है। कठिन हालात के बीच इस उपलब्धि को हासिल करने वाले दिव्यांग राकेश चंद्र गहतोड़ी के बेटे हिमांशु सचमुच दिव्य हैं।
हिमांशु का लक्ष्य इंजीनियर बनना
चंपावत। 94 प्रतिशत नंबर लाने वाले हिमांशु का लक्ष्य इंजीनियर बनना है। उसका कहना है कि विवेकानंद विद्या मंदिर में प्रधानाचार्य डा.मदन पाल एवं गणित के आचार्य दीपक पाटनी सहित अन्य आचार्यों का पल-पल मार्गदर्शन मिला। हिमांशु बताते हैं कि उसका लक्ष्य इंजीनियरिंग करने का है। इसके लिए वह गणित, भौतिकी एवं रसायन विज्ञान में खास ध्यान दे रहा है। हाइस्कूल की बोर्ड परीक्षा में भी उन्हें इन विषयों में 95 प्रतिशत से अधिक अंक मिले हैं। अलबत्ता अंग्रेजी में मात्र 66 नंबर लाने से दुखी हिमांशु इस विषय की उत्तर पुस्तिका को दोबारा जंचवाने की बात कह रहे हैं।
दादा-दादी और चाचा-चाची के साथ चंपावत में किराए के दो कमरे में रहने वाले हिमांशु गहतोड़ी के लिए मेरिट में जगह बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। अतिथि शिक्षक रहे चाचा गिरीश गहतोड़ी बताते हैं कि हिमांशु जिस कमरे में पढ़ता है, उस कमरे में कुल छह लोग रहते हैं। दूसरे कमरे में परिवार के दो अन्य लोग रहते हैं। पर परिवार की कमजोर स्थिति से उसे ताकत मिली और खूब मेहनत करने की ठानी। सीमा सुरक्षा बल से दो दशक पहले रिटायर हुए दादा पुरुषोत्तम बताते हैं कि रोजाना सुबह तीन बजे उठकर नियमित रूप से छह घंटे घर में पढ़ाई करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा रहा है। घर में टेलीविजन के कार्यक्रमों से भी उसका कोई वास्ता नहीं। घर में रसायन विज्ञान में अतिरिक्त मेहनत चाचा कराते, तो स्कूल के आचार्य दीपक पाटनी उसकी गणित में मदद करते और आज मेहनत का नतीजा सबके सामने है। कठिन हालात के बीच इस उपलब्धि को हासिल करने वाले दिव्यांग राकेश चंद्र गहतोड़ी के बेटे हिमांशु सचमुच दिव्य हैं।
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हिमांशु का लक्ष्य इंजीनियर बनना
चंपावत। 94 प्रतिशत नंबर लाने वाले हिमांशु का लक्ष्य इंजीनियर बनना है। उसका कहना है कि विवेकानंद विद्या मंदिर में प्रधानाचार्य डा.मदन पाल एवं गणित के आचार्य दीपक पाटनी सहित अन्य आचार्यों का पल-पल मार्गदर्शन मिला। हिमांशु बताते हैं कि उसका लक्ष्य इंजीनियरिंग करने का है। इसके लिए वह गणित, भौतिकी एवं रसायन विज्ञान में खास ध्यान दे रहा है। हाइस्कूल की बोर्ड परीक्षा में भी उन्हें इन विषयों में 95 प्रतिशत से अधिक अंक मिले हैं। अलबत्ता अंग्रेजी में मात्र 66 नंबर लाने से दुखी हिमांशु इस विषय की उत्तर पुस्तिका को दोबारा जंचवाने की बात कह रहे हैं।
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