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तीन माह के शिशु को पानी से भरी बाल्टी में फेंका, मौत

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 02 Feb 2022 12:57 AM IST
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Death of Child in Tanakpur
बंदर के हमले में मृत जुबिन की मां और परिजनों को ढांढस बंधाते पड़ोसी। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : TANAKPUR
चंपावत। बंदरों ने खेत में फसल ही नहीं, घर के भीतर भी नाक में दम कर रखा है। बीते पांच वर्ष में ही बंदरों के हमले में चंपावत जिले में दो बच्चों सहित छह लोगों की जान जा चुकी है। लोहाघाट शहर में दो साल पहले बंदर के फेंके गए ईंट की चपेट में आकर एक महिला हताहत हो गई। इसी तरह बंदर से बचने के चक्कर में एक अधेड़ व्यक्ति का संतुलन बिगड़ा और गड्ढे में गिरकर उसकी मौत हो गई। घर, खेत से लेकर मंदिरों तक बंदरों का उत्पात रहता है। चंपावत जिले में लगभग 6317 बंदर हैं।
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हमलावर बंदर के घर में छिपे होने की आशंका
टनकपुर (चंपावत)। शारदा रेंज के वन दरोगा महेश सिंह और टनकपुर थाने से दरोगा पिंकी धामी ने मौका मुआयना किया। परिजनों ने अंदेशा जताया है कि रात में बंदर आवासीय परिसर में छुपा होगा। बीते साल भी शहनवाज के एक साल के बच्चे की मौत हुई थी। परिवार में अब छह वर्षीय बेटा फरहान है।
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बच्चे को ले जाते बंदर को न तो परिजनों ने देखा और ना ही आसपास के लोगों ने। परिजन अनुमान के आधार पर ऐसा अंदेशा जता रहे हैं। यदि बंदर ले जाता तो बच्चा शोर मचाता और उस पर झपट्टे या चोट के निशान भी होते लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है। वैसे भी बंदर अंधेरे में और ठंड में अचानक बाहर नहीं निकलते हैं। - महेश सिंह बिष्ट, वन क्षेत्राधिकारी, टनकपुर।
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बस्टिया में बंदर पुनर्वास केंद्र बना होता तो मिलती निजात
चंपावत। बंदरों से बचाव के लिए चंपावत जिले के बस्टिया में बंदर पुनर्वास केंद्र खोलने का दिसंबर 2011 का प्रस्ताव पांच साल पहले खारिज कर दिया गया।
चंपावत से 67 किलोमीटर दूर बस्टिया के पास के जंगल में 25 हेक्टेयर क्षेत्र में इस केंद्र को स्थापित करने को मंजूरी मिली थी। तब इस केंद्र में कुमाऊं मंडल के सभी छह जिलों के बंदरों को रखे जाने का प्रस्ताव था। इस केंद्र में बंदरों को उनका प्राकृतिक आवास सरीखा वातावरण देने के साथ ही बधियाकरण (स्टरलाइज) कर सामान्य होने तक रखा जाएगा। बेलदार फसल, फल और आलू मुख्य रूप से बंदर के निशाने पर रहते हैं। वन क्षेत्राधिकारी महेश सिंह बिष्ट का कहना है कि किशनपुर रेंज के दानीबांगर में 109 हेक्टेयर क्षेत्र में बंदर पुनर्वास केंद्र प्रस्तावित किया गया है।

जंगल की कमी से आबादी की ओर बढ़ा है रुख
चंपावत। बीते एक दशक में शहरों में बंदरों की बढ़ती संख्या ने चिंता पैदा की है। राजकीय डिग्री कॉलेज के वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. बीपी ओली बताते हैं कि विकास और निर्माण के चलते वन क्षेत्र कम हो गए हैं। बंदरों को काफल, बुरांश समेत जंगली खाद्य फल आसानी से उपलब्ध नहीं हो रहा है। इस वजह से उनका रुख गांव और शहरी इलाकों की ओर हुआ है।
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