{"_id":"624497e1a38d75486673a41d","slug":"amar-ujala-education-campaign-children-infected-due-to-the-ill-effects-of-corona-curfew-champawat-news-hld457938283","type":"story","status":"publish","title_hn":"अमर उजाला शिक्षा अभियान : कोरोना कर्फ्यू के दुष्प्रभावों से ‘संक्रमित’ हुए बच्चे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अमर उजाला शिक्षा अभियान : कोरोना कर्फ्यू के दुष्प्रभावों से ‘संक्रमित’ हुए बच्चे
Wed, 30 Mar 2022 11:18 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत
Published by: हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 30 Mar 2022 11:18 PM IST
सार
कोरोना काल में स्कूल न खुलने का खामियाजा बच्चों को कई तरह से भुगतना पड़ा है। बच्चों के स्कूल ही नहीं घर के बाहर की गतिविधियां भी एकदम बंद हो गईं। इसका असर पढ़ाई ही नहीं, उनकी सेहत पर भी नजर आया। कई बच्चे एकाकीपन के शिकार हुए।
विज्ञापन
अमर उजाला अभियान शिक्षा
विस्तार
कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए 2020 में सरकार ने कोरोना कर्फ्यू (लॉकडाउन) लगाया था। इसके बाद संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए तमाम गतिविधियों के साथ-साथ स्कूलों को भी बंद कर दिया गया। इससे बच्चे काफी हद तक संक्रमित होने से तो बच गए लेकिन कोरोना कर्फ्यू के कारण बाहर की गतिविधियां थमने से बच्चे एकाकीपन समेत अन्य समस्याओं से ‘संक्रमित’ हो गए।
विज्ञापन
कोरोना काल में स्कूल न खुलने का खामियाजा बच्चों को कई तरह से भुगतना पड़ा है। बच्चों के स्कूल ही नहीं घर के बाहर की गतिविधियां भी एकदम बंद हो गईं। इसका असर पढ़ाई ही नहीं, उनकी सेहत पर भी नजर आया। कई बच्चे एकाकीपन के शिकार हुए। मोबाइल, लैपटॉप सरीखे डिजिटल उपकरणों के बेतहाशा उपयोग करने से बच्चों को आंखों से संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस बात को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के आंकड़े भी बताते हैं। आरबीएसके के तहत स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के मौजूदा वित्त वर्ष के स्वास्थ्य परीक्षण पर भी असर पड़ा। कुल 38457 स्कूली बच्चों में से 18604 का ही स्वास्थ्य परीक्षण हो सका।
विज्ञापन
केस-1
चंपावत ब्लॉक के एक स्कूल में छठी में पढ़ने वाले विनीत (बदला हुआ नाम) के पिता बताते हैं कि लगातार घर में रहने से उनके उनका बच्चा गुमसुम रहने लगा। माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों से विनीत बहुत कम और बेहद औपचारिक बात करता था। स्कूली संगी-साथियों से दूरी और समाज से लंबे समय तक कटने का दुष्प्रभाव यह हुआ कि वह बहुत कम बोलने लगा। परिजन बताते हैं कि शुरू में वे बच्चे की इस परेशानी को हल्के में लेते रहे, लेकिन जब उन्हें हालात की गंभीरता समझ में आई, तो उन्होंने क्षेत्र में उपलब्ध बेहतर इलाज कराया। काउंसिलिंग और इलाज के करीब ढाई महीने बाद बच्चे में पुराना आत्मविश्वास लौटा। परिजन कहते हैं कि दवाओं से ज्यादा लाभ उन्हें डॉक्टरों, शिक्षकों और खेल से जुड़े जानकारों की काउंसिलिंग का मिला। अब 13 साल का यह बच्चा पहले जैसे हंस-खेल और चहक रहा है।
विज्ञापन
केस-2
सातवीं के छात्र राजेंद्र (बदला हुआ नाम) कोरोना काल से पहले सुबह जल्दी उठता था। सुबह सैर करता था लेकिन कोरोना कर्फ्यू जब उसकी दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित हुई। वह न कहीं घूम-फिर पाता और न ही खुले में खेल पाया। मोबाइल फोन से हुई ऑनलाइन पढ़ाई से पहले उसकी आंखों लाल होने लगी और फिर बार-बार पानी गिरने लगा। चार महीने बाद चश्मा भी चढ़ गया। आंख की इन दिक्कतों के लिए उसे पिथौरागढ़ ले जाना पड़ा।
कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई का बच्चों की आंखों पर असर पड़ा है। मोबाइल स्क्रीन को लगातार देखने का रोशनी पर असर पड़ना लाजमी है। इससे बचने के लिए परीक्षण कर चश्मा लगाएं और हर छह माह में चश्मे का नंबर जांचें। हर एक घंटे की पढ़ाई के बाद पांच मिनट आंखों को आराम दें। हरी पत्ती वाली सब्जी और फलों का सेवन जरूर करें। - डॉ. जीबी बिष्ट, वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ।
कोरोना काल में स्कूल बंद होने से आरबीएसके के तहत स्कूली बच्चों की जांच नियमित रूप से नहीं हो सकी। स्कूल खुलने के बाद से हुए स्वास्थ्य परीक्षण से आंखों से लेकर कई तरह की दिक्कत मुख्य रूप से सामने आई है। बच्चों की काउंसिलिंग कराई जा रही है। 26 बच्चों को हायर सेंटर भेजा गया है। - प्रेमबल्लभ भट्ट, समन्वयक, आरबीएसके, चंपावत।