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मंदिर की परिक्रमा के बाद उतरेंगे मैदान में
सुरेंद्र राज लडवाल/अमर उजाला, देवीधुरा (चंपावत)
Updated Wed, 17 Aug 2016 10:11 PM IST
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मंदिर की परिक्रमा के बाद उतरेंगे मैदान में
- फोटो : अमर उजाला
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बृहस्पतिवार को होने वाली बग्वाल का इंतजार लाखों लोगों को ही नहीं, चारों खामों के योद्धाओं को भी बेसब्री से है। बस अब कुछ ही घंटों के बाद इसका श्रीगणेश होगा।
लमगड़िया, गहड़वाल, वालिग और चम्याल खाम के अलावा सात तोकों के बहादुर इसमें शिरकत करेंगे। एक पखवाड़े तक खानपान और रहन सहन की शुद्धता का पालन करने वाले ये योद्धा बृहस्पतिवार सुबह करीब दस बजे अपने-अपने गांवों से देवीधुरा के दुबचौड़ा-खोलीखांण मैदान पर पहुंचेंगे।
गहड़वाल खाम के चंदन सिंह चौहान लंबे समय से बग्वाल का हिस्सा रहे हैं। वह कहते हैं कि बग्वाल उनमें जोश ही नहीं, दैवीय शक्ति का चमत्कार भी भरता है। इसे वे हर बार महसूस करते हैं। चम्याल खाम के 70 साल के शेर सिंह फूल-पत्थरों की बग्वाल से बेहतर पुरानी बग्वाल को मानते हैं।
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उनका कहना है कि पत्थर से बग्वाल नहीं होने की वजह से इसे देखने आने वालों की संख्या में कमी आ रही है।लमगड़िया खाम के प्रतिनिधि और मंदिर कमेटी के अध्यक्ष खीम सिंह लमगड़िया ने कहा कि ये देवी का काज है। बग्वाल के ढंग बदलने से भाव में कोई बदलाव नहीं है।
खेलने वालों और देखने वालों का उत्साह ज्यों का त्यों है। वालिक खाम के सुरेश बिष्ट एक दशक से बग्वाल खेलते रहे हैं। कहते हैं कि बग्वाल से देवीधुरा की पहचान है। इसने धर्म के साथ यहां के धार्मिक पर्यटन को भी ऊंचाई दी है। सभी खाम बग्वाल युद्ध के लिए कमर कस चुके हैं। उनमें गजब का उत्साह है।
बग्वाल को सुबह पहुंचेंगे फल-फूल
देवीधुरा। मां बाराही धाम में होने वाली बग्वाल के लिए फल-फूल बृहस्पतिवार तड़के पहुंचेंगे। फूलों और आड़ू, नाशपाति आदि की करीब 40 क्विंटल व्यवस्था की गई है। 2013 से बग्वाल पत्थरों के बजाय फल और फूलों से खेली जा रही है।
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लमगड़िया, गहड़वाल, वालिग और चम्याल खाम के अलावा सात तोकों के बहादुर इसमें शिरकत करेंगे। एक पखवाड़े तक खानपान और रहन सहन की शुद्धता का पालन करने वाले ये योद्धा बृहस्पतिवार सुबह करीब दस बजे अपने-अपने गांवों से देवीधुरा के दुबचौड़ा-खोलीखांण मैदान पर पहुंचेंगे।
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गहड़वाल खाम के चंदन सिंह चौहान लंबे समय से बग्वाल का हिस्सा रहे हैं। वह कहते हैं कि बग्वाल उनमें जोश ही नहीं, दैवीय शक्ति का चमत्कार भी भरता है। इसे वे हर बार महसूस करते हैं। चम्याल खाम के 70 साल के शेर सिंह फूल-पत्थरों की बग्वाल से बेहतर पुरानी बग्वाल को मानते हैं।
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उनका कहना है कि पत्थर से बग्वाल नहीं होने की वजह से इसे देखने आने वालों की संख्या में कमी आ रही है।लमगड़िया खाम के प्रतिनिधि और मंदिर कमेटी के अध्यक्ष खीम सिंह लमगड़िया ने कहा कि ये देवी का काज है। बग्वाल के ढंग बदलने से भाव में कोई बदलाव नहीं है।
खेलने वालों और देखने वालों का उत्साह ज्यों का त्यों है। वालिक खाम के सुरेश बिष्ट एक दशक से बग्वाल खेलते रहे हैं। कहते हैं कि बग्वाल से देवीधुरा की पहचान है। इसने धर्म के साथ यहां के धार्मिक पर्यटन को भी ऊंचाई दी है। सभी खाम बग्वाल युद्ध के लिए कमर कस चुके हैं। उनमें गजब का उत्साह है।
बग्वाल को सुबह पहुंचेंगे फल-फूल
देवीधुरा। मां बाराही धाम में होने वाली बग्वाल के लिए फल-फूल बृहस्पतिवार तड़के पहुंचेंगे। फूलों और आड़ू, नाशपाति आदि की करीब 40 क्विंटल व्यवस्था की गई है। 2013 से बग्वाल पत्थरों के बजाय फल और फूलों से खेली जा रही है।