चंपावत: नंद गृह से मां वाराही की मुचकुंद आश्रम तक निकली शोभायात्रा, श्रद्धालुओं ने लिया आशीर्वाद
मां वाराही धाम देवीधुरा में बगवाल मेले के दूसरे दिन शनिवार को नंद गृह से मां वज्र वाराही की शोभायात्रा करीब 600 मीटर दूर मुचकुंद ऋषि आश्रम तक निकाली गई।
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मां वाराही धाम देवीधुरा में बगवाल मेले के दूसरे दिन शनिवार को नंद गृह से मां वज्र वाराही शोभायात्रा लगभग 600 मीटर दूर मुचकुंद ऋषि आश्रम तक निकाली गई। पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी, भुवन चंद्र जोशी और महेश चंद्र पुजारी ने विशेष पूजा अर्चना करने के बाद जमन सिंह बागड़ और पूरन सिंह बागड़ ने आंखों में काली पट्टी बांधकर ताम्र पेटी में विराजमान मां बज्र वाराही, मां सरस्वती, मां काली की मूर्तियों को स्नान कराकर चारों खामों के मुखियाओं की उपस्थिति में मूर्तियों को बैरख निवासी हर सिंह मेहता को सौंपी। मुचकुंद ऋषि आश्रम की परिक्रमा करने के बाद माता की मूर्तियों को मचवाल में हर सिंह मेहरा की गोद में विराजमान किया। माता की मूर्ति पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने डोले को प्रणाम कर फूल, अक्षत आदि अर्पित शीश झुकाकर आशीर्वाद लिया।
मुचकुंद ऋषि आश्रम से शोभायात्रा वापस लाने के बाद खोलीखांड दुबचौड़ मैदान में शिलिंग चौबाड़ी से माता की मूर्तियों को भोपाल सिंह बिष्ट को सौंपी गई। विशेष पूजा, अर्चना और शोभायात्रा के बाद मूर्तियों को नंद गृह तक लाने के पश्चात दोबारा मां वज्र वाराही, मां सरस्वती और मां काली की मूर्तियों को ताम्र पेटी में विराजमान कर दिया गया। शोभायात्रा में ध्यान सिंह मेहरा, दलीप सिंह मेहरा, प्रकाश मेहरा, राजेश बिष्ट, ईश्वर सिंह बिष्ट, इंद्र सिंह, महेंद्र सिंह, दीपक सिंह, योगेश सिंह, खीम सिंह, हयात सिंह, गिरीश सिंह, भगवान सिंह, नंदन सिंह, जगदीश सिंह आदि लोग शामिल रहे।
मूर्ति को स्नान कराते समय आंखों पर बांधी जाती है पट्टी
मंदिर के पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी ने बताया कि ताम्र पेटिका में विराजमान मां वाराही का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली है। इस कारण उनके प्रत्यक्ष दर्शन की परंपरा नहीं है। मां में वज्र के समान तेज है और इसी कारण उन्हें वज्र वाराही भी कहा जाता है। ताम्र पेटी में विराजमान मूर्तियों के बारे में मान्यताएं यह है कि एक समय यह मूर्ति चोरी हो गई थी। मूर्ति को चोरी से ले जाने वाले व्यक्ति की नेत्र ज्योति चली गई और वह व्यक्ति मूर्ति को मंदिर में वापस रख गया। यह मूर्तियां किस धातु की है यह भी कोई नहीं जानता हैं। इस लिए इन मूर्तियों को स्नान आंखों पर पट्टी बांधकर कराया जाता हैं।
ऋषि मुचकुंद की तपस्या से प्रसन्न हुईं मां वाराही, दिया लोककल्याण का आशीर्वाद
प्राचीन समय में हिमालय की शांत और सुरम्य भूमि में ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे। इन्हीं महान तपस्वियों में मुचकुंद ऋषि का भी विशेष स्थान माना जाता है। वे लोक कल्याण और मां की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान और आदिशक्ति की आराधना में लीन रहते थे।
पीठाचार्य कीर्ति बल्लभ शास्त्री के अनुसार, ऋषि मुचकुंद की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां वाराही ने दर्शन देकर आशीर्वाद प्रदान किया। मान्यता है कि ऋषि मुचकुंद ने मां वाराही से क्षेत्र की रक्षा और भक्तों के कल्याण का वरदान मांगा था। मां ने भी अपने भक्त को अभय प्रदान करते हुए लोककल्याण का आशीर्वाद दिया। इसके बाद मुचकुंद ऋषि मां वाराही के परम भक्त माने गए और दोनों के बीच भक्त और आराध्य का पवित्र संबंध स्थापित हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां वाराही को शक्ति और रक्षा की देवी माना जाता है।
उनका वराह स्वरूप पृथ्वी की रक्षा और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। देवीधुरा की धार्मिक परंपराओं में मुचकुंद ऋषि और मां वाराही का यह प्रसंग आज भी विशेष श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि मां वाराही अपने भक्त मुचकुंद ऋषि का हाल जानने और उन्हें दर्शन देने के लिए प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन के दूसरे दिन नंद गृह से जाती हैं। इस धार्मिक परंपरा को देवी की अपने भक्तों के प्रति ममता, स्नेह और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में मां वाराही और मुचकुंद ऋषि का यह संबंध भक्ति, आस्था और लोककल्याण की परंपरा को दर्शाता है। यही वजह है कि देवीधुरा में इस प्रसंग का विशेष धार्मिक महत्व है और श्रद्धालु इसे मां वाराही की अपने भक्तों के प्रति कृपा से जोड़कर देखते हैं।
कालयवन को मुचकुंद की दृष्टि ने किया भस्म, श्रीकृष्ण ने दिखाई थी गुफा की राह
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इक्ष्वाकु वंश के पराक्रमी राजा मुचकुंद थे। उन्होंने देवताओं की सहायता के लिए लंबे समय तक युद्ध किया। युद्ध से थककर वे एक गुफा में गहरी निद्रा में सो गए थे। उन्हें यह वरदान प्राप्त था कि जो भी उनकी नींद भंग करेगा, वह उसकी दृष्टि पड़ते ही तत्काल भस्म हो जाएगा।
इसी कालखंड में कालयवन नामक एक शक्तिशाली योद्धा का उदय हुआ। उसे यह वरदान मिला था कि कोई भी यादव योद्धा उसे पराजित नहीं कर सकता। अपने इस वरदान के अहंकार में कालयवन ने मथुरा नगरी पर आक्रमण कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण कालयवन की शक्ति और उसके वरदान से भली-भांति परिचित थे। श्रीकृष्ण ने कालयवन से सीधे युद्ध करने के बजाय एक युक्ति का सहारा लिया। वे कालयवन को अपने पीछे-पीछे एक अंधेरी गुफा तक ले गए। कालयवन भी श्रीकृष्ण को पकड़ने के उद्देश्य से गुफा में प्रवेश कर गया। गुफा के भीतर राजा मुचकुंद गहरी नींद में सो रहे थे। अंधेरे के कारण कालयवन ने सोए हुए मुचकुंद को भगवान श्रीकृष्ण समझ लिया। उसने मुचकुंद को जगाने का प्रयास किया। नींद भंग होने पर मुचकुंद ने जैसे ही आंखें खोलीं, उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी। दृष्टि पड़ते ही कालयवन तत्काल भस्म हो गया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी युक्ति से कालयवन का अंत सुनिश्चित किया।
ताम्र पेटी के सामने अखंड ज्योति जलाकर मां से संतान प्राप्ति की मनोकामना
देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में बगवाल मेले की रात सैकड़ों सुहागिन महिलाओं ने पूरे दिन व्रत रख कर संतान प्राप्ति के लिए ताम्र पेटी में रखी मां वाराही, मां सरस्वती, मां काली की मूर्तियों के सामने अखंड दीप जलाया। महेश चंद्र पुजारी ने बताया की मां वज्र मुखी की ताम्र पेटी के समक्ष एक दिन पहले से सात्विक भोजन कर नंद गृह में रात भर अखंड ज्योति जलाकर माता की आराधना करने से महिलाओं को संतान प्राप्ति होती हैं।
पूरे दिन निर्जला उपवास रखने के बाद महिलाएं दूसरे दिन मां वाराही के नौले से जल लाकर कालिका मंदिर, अनंत वैली, भैरव मंदिर में चढ़ाती हैं। उसके बाद उन्हें सिंहासन डोले से प्रसाद दिया जाता हैं। ताम्र पेटी के सामने अखंड ज्योति जलाकर मां वज्र वाराही से मांगी संतान प्राप्ति की मनोकामना।