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सावधान! इस बार नोटा भी चुनाव मैदान में
Updated Tue, 17 Apr 2018 10:08 PM IST
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चंपावत। शहरी मतदाताओं को नगर निकाय चुनाव में अब प्रत्याशियों को नकारने का हक मिलेगा। निकाय चुनाव में इस बार नोटा (नन ऑफ दि अबव - उपरोक्त में से कोई नहीं) को जगह मिली है। राज्य निर्वाचन आयुक्त सुवर्द्धन ने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को पत्र भेज मतपत्रों की इसी तरह से छपाई करने के निर्देश दिए हैं।
उत्तराखंड राज्य के निर्माण के बाद अब तक तीन बार (2003, 2008, 2013) नगर निकाय चुनाव हो चुके हैं। यह पहली बार होगा जब मतदाता को नोटा के इस्तेमाल का विकल्प मिलेगा। राज्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा 28 मार्च को सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा गया है कि ईवीएम या मत पत्र में प्रत्याशियों के नामों के साथ ही नोटा भी एक विकल्प होगा। प्रत्याशियों के नाम के बाद आखिर में नोटा को शामिल किया जाएगा।
पंचस्थानी के जिला सहायक निर्वाचन अधिकारी का अतिरिक्त काम देख रहे डीपीआरओ सुरेश बेनी का कहना है कि जिले के 29156 मतदाताओं के पास प्रत्याशी पसंद नहीं आने पर नोटा पर मोहर लगाने का विकल्प रहेगा। यहीं विकल्प अन्य जिलों के मतदाताओं के पास भी रहेगा। आयोग ने इसे दृष्टिगत रखते हुए मतपत्रों के मुद्रण का कार्य कराने के निर्देश दिए हैं। आयोग के इस आदेश से आठ नगर निगम, 40 नगर पालिकाएं और 36 नगर पंचायतों के वोटरों को एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकेगा।
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लोकसभा चुनाव में पहली बार 2421 वोटरों ने दबाया था नोटा
नोटा का उपयोग चुनावी राजनीति में बहुत पुराना नहीं है। पहली बार इसका उपयोग अप्रैल-मई 2014 को हुए लोकसभा चुनाव में हुआ था। तब अल्मोड़ा संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले चंपावत जिले में कुल पड़े 98910 वोटों में से 2421 लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया था। जनवरी 2017 के विधानसभा चुनाव में जिले की दोनों सीटों में भाजपा, कांग्रेस के बाद नोटा तीसरे स्थान पर रहा। लोहाघाट सीट में नोटा को 1249 और चंपावत सीट में 1044 वोट मिले थे।
भारी पडे़गी वोटरों की अनदेखी
विकास कार्य न होने, प्रतिनिधियों की अनदेखी से नाराज वोटर अब तक मतदान से कन्नी काटता था लेकिन अब ऐसे लोगों के पास नाराजगी जताने का सशक्त हथियार होगा। कई मतदाताओं का कहना है कि नोटा के आने से शहरी सियासत में बदलाव आएगा और लोगों की आवाज की अनदेखी करना पारी पडे़गा। चंपावत पालिका अध्यक्ष प्रकाश तिवारी का कहना है कि नोटा प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने में मदद करेगा।
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उत्तराखंड राज्य के निर्माण के बाद अब तक तीन बार (2003, 2008, 2013) नगर निकाय चुनाव हो चुके हैं। यह पहली बार होगा जब मतदाता को नोटा के इस्तेमाल का विकल्प मिलेगा। राज्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा 28 मार्च को सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा गया है कि ईवीएम या मत पत्र में प्रत्याशियों के नामों के साथ ही नोटा भी एक विकल्प होगा। प्रत्याशियों के नाम के बाद आखिर में नोटा को शामिल किया जाएगा।
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पंचस्थानी के जिला सहायक निर्वाचन अधिकारी का अतिरिक्त काम देख रहे डीपीआरओ सुरेश बेनी का कहना है कि जिले के 29156 मतदाताओं के पास प्रत्याशी पसंद नहीं आने पर नोटा पर मोहर लगाने का विकल्प रहेगा। यहीं विकल्प अन्य जिलों के मतदाताओं के पास भी रहेगा। आयोग ने इसे दृष्टिगत रखते हुए मतपत्रों के मुद्रण का कार्य कराने के निर्देश दिए हैं। आयोग के इस आदेश से आठ नगर निगम, 40 नगर पालिकाएं और 36 नगर पंचायतों के वोटरों को एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकेगा।
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लोकसभा चुनाव में पहली बार 2421 वोटरों ने दबाया था नोटा
नोटा का उपयोग चुनावी राजनीति में बहुत पुराना नहीं है। पहली बार इसका उपयोग अप्रैल-मई 2014 को हुए लोकसभा चुनाव में हुआ था। तब अल्मोड़ा संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले चंपावत जिले में कुल पड़े 98910 वोटों में से 2421 लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया था। जनवरी 2017 के विधानसभा चुनाव में जिले की दोनों सीटों में भाजपा, कांग्रेस के बाद नोटा तीसरे स्थान पर रहा। लोहाघाट सीट में नोटा को 1249 और चंपावत सीट में 1044 वोट मिले थे।
भारी पडे़गी वोटरों की अनदेखी
विकास कार्य न होने, प्रतिनिधियों की अनदेखी से नाराज वोटर अब तक मतदान से कन्नी काटता था लेकिन अब ऐसे लोगों के पास नाराजगी जताने का सशक्त हथियार होगा। कई मतदाताओं का कहना है कि नोटा के आने से शहरी सियासत में बदलाव आएगा और लोगों की आवाज की अनदेखी करना पारी पडे़गा। चंपावत पालिका अध्यक्ष प्रकाश तिवारी का कहना है कि नोटा प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने में मदद करेगा।