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स्थायी निर्माण में 10 साल में खर्च हो गए 223 लाख रुपये
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चंपावत। कोरोना के चलते 2020 में 97 दिन के बजाय मां पूर्णागिरि मेला सिर्फ एक सप्ताह चल सका था और इस बार 30 मार्च से शुरू होने वाले मेले की अवधि एक माह तय की गई है। मेले की सरकारी अवधि में हर साल अस्थायी निर्माण में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। पिछले एक दशक में मेला क्षेत्र में होने वाले अस्थायी निर्माण में ही 2.23 करोड़ रुपये निकल चुके हैं। यह नौबत आरक्षित वन भूमि की वजह से है। अगर वन भूमि आड़े न आती, तो इतनी राशि में पक्का निर्माण हो जाता।
मां पूर्णागिरि देवी के दर्शन के लिए बरसात को छोड़ नियमित रूप से श्रद्धालु पहुंचते हैं। अलबत्ता पिछले साल कोरोना के चलते आवाजाही नहीं हो सकी। सामान्य समय में तीन माह तक चलने वाले सरकारी मेले में 25 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन करते हैं। इस दौरान जिला पंचायत, मेला मजिस्ट्रेट कार्यालय, रैनबसेरा, सफाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, यात्रियों की सुरक्षा सहित तमाम जरूरी व्यवस्था की जाती है। इन आवासीय व्यवस्था के लिए 21 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में अस्थायी टिन शेड बनाए जाते हैं। डीएफओ मयंक शेखर झा का कहना है कि आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी कार्य नहीं हो सकते हैं। इसके चलते मां पूर्णागिरि धाम मेला क्षेत्र के आरक्षित वन क्षेत्र में निर्माण कराया जाना वर्जित है।
एक दशक में आवासीय व्यवस्था में हुआ खर्च
वर्ष खर्च (लाख रुपये में)
2011 12.79
2012 15.80
2013 23.21
2014 34.60
2015 24.82
2016 24.35
2017 31.20
2018 24.42
2019 24.00
2020 08.00
कुल खर्च 223.22
कोट
मां पूर्णागिरि धाम के मेला क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। आरक्षित वन क्षेत्र होने से स्थायी निर्माण मुमकिन नहीं है। इस कारण अस्थायी निर्माण कराया जाता है। अलबत्ता अब जिला पंचायत मेला क्षेत्र में लीज की जमीन के लिए भी प्रयास कर रही है।
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- राजेश कुमार अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत।
सरकारी मेले को नहीं मिल रहा सरकारी अनुदान
चंपावत। चंपावत जिले को उत्तराखंड के बाहर पहचान देने वाला मां पूर्णागिरि धाम के मेले का आयोजन सरकारी तौर पर जरूर होता है, लेकिन मेले को सरकारी अनुदान नहीं मिल रहा है। जिला पंचायत संचालित इस मेले के आयोजन में आयोजक संस्था को हर साल नुकसान उठाना पड़ रहा है। तीन सालों में ही 27 लाख रुपये से अधिक का नुकसान हो चुका है। मां पूर्णागिरि धाम मेले में 2008 तक प्रदेश शासन से मेला अनुदान मिलता रहा है। तब आखिरी बार 15 लाख रुपये शासन से प्राप्त हुए, लेकिन इसके बाद से कभी भी कोई अनुदान नहीं मिला। जिला पंचायत का कहना है कि अनुदान के लिए हर बार पत्र भेजा जाता है, लेकिन अनुदान नहीं मिलता। अनुदान न मिलने से पंचायत को मेले के संचालन में घाटा सहना पड़ता है। मेला अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि लंबे समय से अनुदान बंद होने से मेले में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए व्यवस्थाओं को कराने में दिक्कत आती है। बीते तीन वर्षो में ही 27 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है।
कोट
जिले को आध्यात्मिक पहचान देने वाले मां पूर्णागिरि मेले में तीर्थयात्रियों को बेहतर सुविधा देने के लिए सरकारी अनुदान का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए पर्यटन मंत्री से अनुरोध किया जाएगा।
- कैलाश गहतोड़ी, विधायक, चंपावत।
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मां पूर्णागिरि देवी के दर्शन के लिए बरसात को छोड़ नियमित रूप से श्रद्धालु पहुंचते हैं। अलबत्ता पिछले साल कोरोना के चलते आवाजाही नहीं हो सकी। सामान्य समय में तीन माह तक चलने वाले सरकारी मेले में 25 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन करते हैं। इस दौरान जिला पंचायत, मेला मजिस्ट्रेट कार्यालय, रैनबसेरा, सफाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, यात्रियों की सुरक्षा सहित तमाम जरूरी व्यवस्था की जाती है। इन आवासीय व्यवस्था के लिए 21 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में अस्थायी टिन शेड बनाए जाते हैं। डीएफओ मयंक शेखर झा का कहना है कि आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी कार्य नहीं हो सकते हैं। इसके चलते मां पूर्णागिरि धाम मेला क्षेत्र के आरक्षित वन क्षेत्र में निर्माण कराया जाना वर्जित है।
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एक दशक में आवासीय व्यवस्था में हुआ खर्च
वर्ष खर्च (लाख रुपये में)
2011 12.79
2012 15.80
2013 23.21
2014 34.60
2015 24.82
2016 24.35
2017 31.20
2018 24.42
2019 24.00
2020 08.00
कुल खर्च 223.22
कोट
मां पूर्णागिरि धाम के मेला क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। आरक्षित वन क्षेत्र होने से स्थायी निर्माण मुमकिन नहीं है। इस कारण अस्थायी निर्माण कराया जाता है। अलबत्ता अब जिला पंचायत मेला क्षेत्र में लीज की जमीन के लिए भी प्रयास कर रही है।
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- राजेश कुमार अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत।
सरकारी मेले को नहीं मिल रहा सरकारी अनुदान
चंपावत। चंपावत जिले को उत्तराखंड के बाहर पहचान देने वाला मां पूर्णागिरि धाम के मेले का आयोजन सरकारी तौर पर जरूर होता है, लेकिन मेले को सरकारी अनुदान नहीं मिल रहा है। जिला पंचायत संचालित इस मेले के आयोजन में आयोजक संस्था को हर साल नुकसान उठाना पड़ रहा है। तीन सालों में ही 27 लाख रुपये से अधिक का नुकसान हो चुका है। मां पूर्णागिरि धाम मेले में 2008 तक प्रदेश शासन से मेला अनुदान मिलता रहा है। तब आखिरी बार 15 लाख रुपये शासन से प्राप्त हुए, लेकिन इसके बाद से कभी भी कोई अनुदान नहीं मिला। जिला पंचायत का कहना है कि अनुदान के लिए हर बार पत्र भेजा जाता है, लेकिन अनुदान नहीं मिलता। अनुदान न मिलने से पंचायत को मेले के संचालन में घाटा सहना पड़ता है। मेला अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि लंबे समय से अनुदान बंद होने से मेले में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए व्यवस्थाओं को कराने में दिक्कत आती है। बीते तीन वर्षो में ही 27 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है।
कोट
जिले को आध्यात्मिक पहचान देने वाले मां पूर्णागिरि मेले में तीर्थयात्रियों को बेहतर सुविधा देने के लिए सरकारी अनुदान का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए पर्यटन मंत्री से अनुरोध किया जाएगा।
- कैलाश गहतोड़ी, विधायक, चंपावत।