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नंदासैंण वन आंदोलन की 34वीं वर्षगांठ पर विशेष-- 34 साल पहले ग्रामीणों की बांज उगाने की मुहिम के आगे झुका था वन विभाग
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चीड़ को हटाने और बांज को उगाने की मुहिम चमोली जिले के नंदासैंण क्षेत्र में रंग लाई। ग्रामीणों की बांज को उगाकर उसके विस्तार की जिद का नतीजा ही है कि वर्तमान में यहां बांज सहित चौड़ी पत्ती के पेड़ों का घना जंगल है। इसी जंगल से फूटी जलधाराओं से बनी सात पेयजल योजनाओं से करीब 10 हजार से अधिक लोगों को पीने का पानी मिल रहा है।
चमोली जिले के नंदासैंण में 28 जुलाई 1988 को तत्कालीन महिला मंगल दल अध्यक्ष शांता देवी की अगुवाई में मालई, बैनोली और देवल के ग्रामीणों ने बांज के जंगल को बचाने की ऐसी इबारत लिखी कि आज वहां करीब 200 हेक्टेयर क्षेत्रफल में बांज, बुरांश और काफल के जंगल लहलहा रहे हैं। नंदासैंण वन आंदोलन के संरक्षक और प्रणेता भुवन नौटियाल ने बताया कि 34 साल पहले नंदासैंण क्षेत्र में वन विभाग ने बांज के बीच चीड़ के पौधे लगाने की योजना बनाई तो ग्रामीणों ने इसका विरोध करना शुरू किया। वन विभाग की चीड़ लगाने की जिद का नतीजा यह हुआ कि क्षेत्र में बड़ा वन आंदोलन शुरू हो गया। ग्रामीणों के हौसले को देखकर कनाडा के पर्यावरणविद् पांडुरंग हेगड़े, सुंदरलाल बहुगुणा और चंडीप्रसाद भट्ट भी ग्रामीणों के साथ वन आंदोलन में कूद पड़े। 28 जुलाई 1988 को शैलेश्वर शिव मंदिर में पूजा करने के बाद नंदासैंण तक क्षेत्र के महिलाएं, बच्चे और पुरुष जंगल में पहुंचे और वहां चीड़ लगा रहे वन कर्मियों को खदेड़ना शुरू किया। वे बताते हैं कि जनता की भावनाओं को देखते हुए तत्कालीन डीएम की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई। कमेटी के क्षेत्र का दौरा करने के बाद वहां चीड़ के पौधों के रोपण पर हमेशा के लिए रोक लगा दी गई थी। इसके बाद ग्रामीणों ने यहां बांज के पौधे लगाकर जंगल का विस्तार किया। आज इसी जंगल से ग्रामीणों को चारा पत्ती, पानी और पशु पक्षियों को भोजन मिल रहा है।
आंदोलन के संस्थापकों का होगा सम्मान
भुवन नौटियाल ने बताया कि नंदासैंण में बृहस्पतिवार को वन आंदोलन के 34वें साल पर आंदोलन के संस्थापकों का सम्मान होगा। साथ ही रैली, पौधरोपण, पर्यावरण गोष्ठी और शिक्षण संस्थाओं के कार्यक्रम होंगे।
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क्या फायदे हैं बांज के पेड़ों से
बांज का पेड़ प्रतिदिन 12 लीटर पानी का वाष्पीकरण करता है जबकि भूमि से एक बूंद भी पानी नहीं लेता है। जल स्तर में बढ़ोतरी करता है और भूस्खलन रोकता है। बांज की उपयोगिता को देखते हुए इसे उत्तराखंड का हरा सोना भी कहा जाता है। यह करीब 700 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। संवाद
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चमोली जिले के नंदासैंण में 28 जुलाई 1988 को तत्कालीन महिला मंगल दल अध्यक्ष शांता देवी की अगुवाई में मालई, बैनोली और देवल के ग्रामीणों ने बांज के जंगल को बचाने की ऐसी इबारत लिखी कि आज वहां करीब 200 हेक्टेयर क्षेत्रफल में बांज, बुरांश और काफल के जंगल लहलहा रहे हैं। नंदासैंण वन आंदोलन के संरक्षक और प्रणेता भुवन नौटियाल ने बताया कि 34 साल पहले नंदासैंण क्षेत्र में वन विभाग ने बांज के बीच चीड़ के पौधे लगाने की योजना बनाई तो ग्रामीणों ने इसका विरोध करना शुरू किया। वन विभाग की चीड़ लगाने की जिद का नतीजा यह हुआ कि क्षेत्र में बड़ा वन आंदोलन शुरू हो गया। ग्रामीणों के हौसले को देखकर कनाडा के पर्यावरणविद् पांडुरंग हेगड़े, सुंदरलाल बहुगुणा और चंडीप्रसाद भट्ट भी ग्रामीणों के साथ वन आंदोलन में कूद पड़े। 28 जुलाई 1988 को शैलेश्वर शिव मंदिर में पूजा करने के बाद नंदासैंण तक क्षेत्र के महिलाएं, बच्चे और पुरुष जंगल में पहुंचे और वहां चीड़ लगा रहे वन कर्मियों को खदेड़ना शुरू किया। वे बताते हैं कि जनता की भावनाओं को देखते हुए तत्कालीन डीएम की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई। कमेटी के क्षेत्र का दौरा करने के बाद वहां चीड़ के पौधों के रोपण पर हमेशा के लिए रोक लगा दी गई थी। इसके बाद ग्रामीणों ने यहां बांज के पौधे लगाकर जंगल का विस्तार किया। आज इसी जंगल से ग्रामीणों को चारा पत्ती, पानी और पशु पक्षियों को भोजन मिल रहा है।
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आंदोलन के संस्थापकों का होगा सम्मान
भुवन नौटियाल ने बताया कि नंदासैंण में बृहस्पतिवार को वन आंदोलन के 34वें साल पर आंदोलन के संस्थापकों का सम्मान होगा। साथ ही रैली, पौधरोपण, पर्यावरण गोष्ठी और शिक्षण संस्थाओं के कार्यक्रम होंगे।
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क्या फायदे हैं बांज के पेड़ों से
बांज का पेड़ प्रतिदिन 12 लीटर पानी का वाष्पीकरण करता है जबकि भूमि से एक बूंद भी पानी नहीं लेता है। जल स्तर में बढ़ोतरी करता है और भूस्खलन रोकता है। बांज की उपयोगिता को देखते हुए इसे उत्तराखंड का हरा सोना भी कहा जाता है। यह करीब 700 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। संवाद