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Bageshwar News: सड़क और शिक्षा के बिना ऊंचे पहाड़ों में जिंदगी ढलान हो गई
Sun, 27 Jul 2025 12:19 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Sun, 27 Jul 2025 12:19 AM IST
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कपकोट (बागेश्वर)। भारत अंतरिक्ष में नए कीर्तिमान गढ़ रहा है लेकिन इसी देश के दुर्गम पहाड़ी इलाके में एक गांव ऐसा भी है, जहां जिंदगी का पहिया बस सांसों के ईंधन से चल रहा है। उत्तराखंड के हांप्टी कापड़ी गांव का आजादी से पहले जो हाल था, उसमें 77 साल बाद भी कोई खास बदलाव नहीं आया। न सड़क है और न अस्पताल। इतना जरूर हुआ कि वंचित लोग घर खाली कर गए।
शामा-लीती-गोगिना के खड़क बैंड से शुरू होती है हांप्टी कापड़ी गांव की पैदल यात्रा। रामगंगा नदी के किनारे बसे गांव से हीरामणि ग्लेशियर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर गांव में जीवन आसान नहीं है। गांव से सड़क तक उबड़-खाबड़ रास्ता है। नीचे उतरते समय वजन उठाकर सीधा ढलान पार करना भी तकलीफदेह होता है। गांव तक राशन, निर्माण सामग्री, सिलिंडर और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाने के लोग भारी कीमत चुका रहे हैं। मजदूर या खच्चर की मदद से एक चक्कर का भाड़ा 500 से 700 रुपये तक देना मजबूरी है।
ग्रामीणों को सड़क तक पहुंचने के लिए छह किमी की खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। किसी के बीमार पड़ने या प्रसव पीड़िता को सड़क तक डोली से लाना यहां आज भी उसी तरह सच है, जैसा आजादी से पहले था। आज तक यह गांव क्यों सड़क से नहीं जुड़ पाया, ये सवाल नेताओं और अफसरों से पूछते-पूछते लोग थक चुके हैं। कागजों में 76 परिवार वाले हांप्टी कापड़ी गांव में अब आबादी आधी से भी कम हो चुकी है।
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गांव पहुंचने से पहले मोबाइल बेकारहांप्टी कापड़ी गांव के लोग संचार सुविधा से भी महरूम हैं। डिजिटल इंडिया के दौर में गांव पहुंचने से पहले ही टेलीकॉम सिग्नल थक जाते हैं। ऐसे में मोबाइल शोपीस हो जाते हैं। इंटरनेट की बात तो छोड़ दीजिए, पोस्ट ऑफिस भी आसपास नहीं है। आपात स्थिति में भी संचार सुविधा न होना, बड़ी टीस है। सुविधाओं की तलाश में गांव से लगातार पलायन बढ़ रहा है।
स्कूल आया था, फिर चला गया
इस इलाके में खोले गए राजकीय प्राथमिक विद्यालय हांप्टी का वजूद अब नहीं है। विकास के नाम पर हांप्टी कापड़ी के हिस्से आए इस स्कूल ने भी साथ छोड़ दिया। वर्ष 2020 में आपदा के कारण राप्रावि हांप्टी के भवन को नुकसान होने पर स्कूल चार किलाेमीटर दूर जूनियर हाईस्कूल में शिफ्ट कर दिया। ऐसे में भला कक्षा 1-2 के बच्चे इतनी दूर दुर्गम रास्तों में कैसे जाएंगे, ये सिस्टम के लिए आउट ऑफ सिलेबस सवाल है। अब नजदीकी गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय कोटकुमा में बच्चे दाखिला लेते हैं लेकिन वो कितना स्कूल जाते हैं और इनके लिए शिक्षा कितनी सुलभ है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
कोट
-गांव से पलायन चरम पर है। 2006-07 में प्राइमरी स्कूल की एक ही कक्षा में 15 से 20 बच्चे पढ़ते थे। अब प्राथमिक और जूनियर की छात्र संख्या मिलाकर 10 तक नहीं पहुंच रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, सड़क सुविधाओं के अभाव में गांव खाली हो रहा है। -
-हरीश कोरंगा, ग्रामीण
- गांव से सड़क तक आने-जाने में ही आधा दिन गुजर जाता है। रोजमर्रा के सामान के लिए भाड़े के रूप में अतिरिक्त कीमत चुकाना ग्रामीणों की नियति बन चुकी है। एक गैस सिलिंडर या एक कट्टा राशन का भी कई बार पांच सौ से सात सौ रुपये भाड़ा देना पड़ जाता है।
- बलवंत कोरंगा, ग्रामीण
- सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद आराम से गांव में गुजर-बसर करने की सोची थी लेकिन अब यहां का जीवन कठिन लगने लगा है। गांव की आधी आबादी रोजगार की तलाश में पलायन कर गई है। कुछ महिलाएं और बुजुर्ग गांव में परेशानी उठाकर जी रहे हैं।
- कुंवर सिंह, पूर्व सैनिक
- गांव खाली हो रहा है। बाहर बसे लोग कभी-कभार छुट्टी मनाने के लिए आते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर ही गांव में बचे हैं। ऐसा न हो कि सड़क आने तक हमारा पूरा गांव ही खाली हो जाए।
- विक्रम सिंह, ग्रामीण
कोट
हांप्टी-कापड़ी गांव के लिए मोटर मार्ग के लिए सर्वे के बाद जॉब और पिलर लगाने का काम हो चुका है। सड़क पीएमजीएसवाई के चौथे फेज में चयनित हुई है। स्वीकृति मिलने के बाद हस्तांतरण और निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
- एके पटेल, ईई, लोक निर्माण विभाग, कपकोट
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शामा-लीती-गोगिना के खड़क बैंड से शुरू होती है हांप्टी कापड़ी गांव की पैदल यात्रा। रामगंगा नदी के किनारे बसे गांव से हीरामणि ग्लेशियर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर गांव में जीवन आसान नहीं है। गांव से सड़क तक उबड़-खाबड़ रास्ता है। नीचे उतरते समय वजन उठाकर सीधा ढलान पार करना भी तकलीफदेह होता है। गांव तक राशन, निर्माण सामग्री, सिलिंडर और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाने के लोग भारी कीमत चुका रहे हैं। मजदूर या खच्चर की मदद से एक चक्कर का भाड़ा 500 से 700 रुपये तक देना मजबूरी है।
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ग्रामीणों को सड़क तक पहुंचने के लिए छह किमी की खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। किसी के बीमार पड़ने या प्रसव पीड़िता को सड़क तक डोली से लाना यहां आज भी उसी तरह सच है, जैसा आजादी से पहले था। आज तक यह गांव क्यों सड़क से नहीं जुड़ पाया, ये सवाल नेताओं और अफसरों से पूछते-पूछते लोग थक चुके हैं। कागजों में 76 परिवार वाले हांप्टी कापड़ी गांव में अब आबादी आधी से भी कम हो चुकी है।
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गांव पहुंचने से पहले मोबाइल बेकारहांप्टी कापड़ी गांव के लोग संचार सुविधा से भी महरूम हैं। डिजिटल इंडिया के दौर में गांव पहुंचने से पहले ही टेलीकॉम सिग्नल थक जाते हैं। ऐसे में मोबाइल शोपीस हो जाते हैं। इंटरनेट की बात तो छोड़ दीजिए, पोस्ट ऑफिस भी आसपास नहीं है। आपात स्थिति में भी संचार सुविधा न होना, बड़ी टीस है। सुविधाओं की तलाश में गांव से लगातार पलायन बढ़ रहा है।
स्कूल आया था, फिर चला गया
इस इलाके में खोले गए राजकीय प्राथमिक विद्यालय हांप्टी का वजूद अब नहीं है। विकास के नाम पर हांप्टी कापड़ी के हिस्से आए इस स्कूल ने भी साथ छोड़ दिया। वर्ष 2020 में आपदा के कारण राप्रावि हांप्टी के भवन को नुकसान होने पर स्कूल चार किलाेमीटर दूर जूनियर हाईस्कूल में शिफ्ट कर दिया। ऐसे में भला कक्षा 1-2 के बच्चे इतनी दूर दुर्गम रास्तों में कैसे जाएंगे, ये सिस्टम के लिए आउट ऑफ सिलेबस सवाल है। अब नजदीकी गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय कोटकुमा में बच्चे दाखिला लेते हैं लेकिन वो कितना स्कूल जाते हैं और इनके लिए शिक्षा कितनी सुलभ है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
कोट
-गांव से पलायन चरम पर है। 2006-07 में प्राइमरी स्कूल की एक ही कक्षा में 15 से 20 बच्चे पढ़ते थे। अब प्राथमिक और जूनियर की छात्र संख्या मिलाकर 10 तक नहीं पहुंच रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, सड़क सुविधाओं के अभाव में गांव खाली हो रहा है। -
-हरीश कोरंगा, ग्रामीण
- गांव से सड़क तक आने-जाने में ही आधा दिन गुजर जाता है। रोजमर्रा के सामान के लिए भाड़े के रूप में अतिरिक्त कीमत चुकाना ग्रामीणों की नियति बन चुकी है। एक गैस सिलिंडर या एक कट्टा राशन का भी कई बार पांच सौ से सात सौ रुपये भाड़ा देना पड़ जाता है।
- बलवंत कोरंगा, ग्रामीण
- सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद आराम से गांव में गुजर-बसर करने की सोची थी लेकिन अब यहां का जीवन कठिन लगने लगा है। गांव की आधी आबादी रोजगार की तलाश में पलायन कर गई है। कुछ महिलाएं और बुजुर्ग गांव में परेशानी उठाकर जी रहे हैं।
- कुंवर सिंह, पूर्व सैनिक
- गांव खाली हो रहा है। बाहर बसे लोग कभी-कभार छुट्टी मनाने के लिए आते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर ही गांव में बचे हैं। ऐसा न हो कि सड़क आने तक हमारा पूरा गांव ही खाली हो जाए।
- विक्रम सिंह, ग्रामीण
कोट
हांप्टी-कापड़ी गांव के लिए मोटर मार्ग के लिए सर्वे के बाद जॉब और पिलर लगाने का काम हो चुका है। सड़क पीएमजीएसवाई के चौथे फेज में चयनित हुई है। स्वीकृति मिलने के बाद हस्तांतरण और निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
- एके पटेल, ईई, लोक निर्माण विभाग, कपकोट