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प्रत्याशी खड़े नहीं कर पा रहा उक्रांद

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sun, 30 Jan 2022 12:07 AM IST
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Weakness of UKD in Uttarakhand
Weakness of UKD in Uttarakhand
बागेश्वर। राज्य गठन में अहम भूमिका निभाने वाला उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) आज इस स्थिति में है कि कई सीटों पर प्रत्याशी भी खड़े नहीं कर पा रहा है। कपकोट सीट से पार्टी ने प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है। बागेश्वर सीट पर चंद दिन पहले दूसरे दल से आए व्यक्ति को टिकट दे दिया है। शनिवार को जांच में उसका नामांकन भी निरस्त हो गया। यानी टिकट देने से पहले प्रत्याशी के बारे में पड़ताल तक पार्टी ने नहीं की। इस तरह जिले की किसी भी सीट पर अब उक्रांद का प्रत्याशी नहीं है। यूकेडी के पास अब सांगठनिक ढांचा नहीं रह गया है। चंपावत की किसी भी सीट से यूकेडी ने प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है।
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यूकेडी के गठन और उसके प्रदर्शन पर नजर डालें तो 25 जुलाई 1979 को राज्य गठन की लड़ाई लड़ने के लिए मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) का गठन किया था। जनता को इस दल का समर्थन मिलने लगा। यह दल राज्य गठन से पहले भी डीडीहाट और रानीखेत से चुनाव जीतता रहा। दल के गठन के मात्र एक साल के भीतर हुए चुनाव में जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत से चुनाव जीतकर यूपी विधानसभा पहुंचे। काशी सिंह ऐरी 1985, 1989 और 1993 में लगातार तीन बार डीडीहाट से विधायक चुने गए।
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राज्य गठन के बाद भी उक्रांद के प्रति लोगों का विश्वास बना रहा। वर्ष 2002 के राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में यूकेडी के चार विधायक सदन में पहुंचे। कनालीछीना से काशी सिंह ऐरी, द्वाराहाट से विपिन त्रिपाठी, नैनीताल से डॉ. नारायण सिंह जंतवाल, यमुनोत्री से प्रीतम पंवार विधायक बने थे। 2007 के चुनाव में दल की एक सीट घट गई। द्वाराहाट से पुष्पेश त्रिपाठी, देवप्रयाग से दिवाकर भट्ट, नरेंद्र नगर से ओम गोपाल रावत विधायक चुने गए। दिग्गज काशी सिंह ऐरी कनालीछीना सीट से चुनाव हार गए। वर्ष 2012 में उक्रांद एक सीट पर सिमट गया। यमुनोत्री से प्रीतम पंवार ही विधानसभा में पहुंचने में कामयाब रहे। वर्ष 2017 में यह क्षेत्रीय दल एक भी सीट नहीं जीत पाया। अबकी बार उक्रांद का प्रदर्शन कैसे रहता है, इस पर सबकी निगाहें होंगी।
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चुनाव दर चुनाव घटता रहा यूकेडी का जनाधार
बागेश्वर। उत्तराखंड क्रांति दल को राज्य विधानसभा के पहले चुनाव वर्ष 2002 में 5.49 फीसदी वोट मिले थे। वर्ष 2007 मत प्रतिशत घटकर 3.7 फीसदी रह गया। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में और गिरावट आई। यूकेडी को मात्र 1.93 फीसदी मत मिले। वर्ष 2017 में यूकेडी का सफाया हो गया। वोट प्रतिशत घटकर 0.7 फीसदी पर पहुंच गया।

अति महत्वाकांक्षा ने डुबोई नैया
बागेश्वर। उक्रांद की जनता के बीच साख गिरने के लिए दल के कुछ नेताओं की अति महत्वाकांक्षा को जिम्मेदार माना जाता है। वर्ष 2007 में कार्यकर्ताओं की मंशा के विपरीत यूकेडी ने भाजपा को समर्थन दिया और उक्रांद कोटे से दिवाकर भट्ट कैबिनेट मंत्री बने। वर्ष 2012 दल के एकमात्र विधायक प्रीतम सिंह पंवार ने कांग्रेस को समर्थन दिया और यूकेडी के कोटे से सरकार में मंत्री रहे। नेताओं की महत्वाकांक्षा, आपसी गुटबाजी ने उक्रांद को जनांदोलनों से दूर किया, यही दल के पतन का कारण बना।
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