मुगलों के डर से ठांगा में छुपा दी थीं दुलर्भ मूर्तियां
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिला मुख्यालय से करीब 65 किमी दूर ठांगा ग्राम पंचायत स्थित चंडिका गुफा मंदिर के भीतर रखी अद्भुत नक्काशी वाले विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां पुरातत्व महत्व की हैं, लेकिन विभाग की दृष्टि से यह अभी तक ओझल ही हैं। क्षेत्र के लोगों के अनुसार मुगल शासनकाल के दौरान सुरक्षा के लिहाज से मूर्तियों को यहां छिपाया गया था। क्षेत्र में प्रचलित एक अन्य कहावत के अनुसार आदिकाल में शुंभ-निशुंभ दैत्य का वध करने के बाद मां चंडिका ने इसी गुफा में विश्राम किया था। यहां न तो बलिदान होता है और न ही ढोल-दमाऊ ही बजते हैं। मंदिर में आश्विन, चैत्र और माघ महीने में पूजार्थियों का तांता लगा रहता है जबकि अन्य मौकों पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते रहते हैं। लोगों का कहना है कि यदि इस क्षेत्र का पर्यटन की दृष्टि से विकास किया जाए तो यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में काफी वृद्धि होगी और कई खाली हाथों को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
ठांगा गांव की सुरम्य पहाड़ी पर स्थित बांज बुरांश और फल्यांट के पेड़ों के मध्य एक गुफा के भीतर मां चंडिका का मंदिर है। मंदिर के भीतर हरे रंग के पत्थर से बने अद्भुत नक्काशी वाले शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु की मूर्ति, शिवजी, पार्वती, गणेश और सामने से नंदी बैल समेत कई अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। इनमें से कुछ मूर्तियां खंडित भी हो चुकी हैं। ग्रामीणों के सहयोग से यहां हनुमान जी की मूर्ति भी बनाया गया है। करीब 25 मीटर मीटर लंबी और 30 मीटर चौड़ी इस गुफा में एक साथ 50 लोग आसानी से बैठकर पूजा कर सकते हैं। 2001 में तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष बलवंत भौर्याल और स्थानीय युवकों के सहयोग से गुफा के भीतर फर्श का निर्माण कराया गया जबकि क्षेत्र के लोगों के सहयोग से गुफा को मंदिर का स्वरूप देने के साथ ही प्रवेश द्वार का निर्माण किया गया है। मंदिर के समीप पीने के पानी के लिए नौला है। वर्षाकाल में मंदिर के पीछे दो झरने गिरते हैं। झरनों से इस क्षेत्र के सौंदर्य पर चार चांद लग जाते हैं। मंदिर में पुजारी के तौर पर उप्रेती परिवार नियुक्त हैं।
पर्यटन की दृष्टि से विकास जल्दी से शुरू हों
अवकाश प्राप्त सहायक नियंत्रक बाट माप कुमाऊं मंडल रमेश चंद्र उप्रेती का कहना है कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना है कि आदिकाल में शुंभ-निशुंभ दैत्यों का वध करने के बाद चंडिका माता ने इसी गुफा में विश्राम किया था। मुगलशासन काल में मूर्तियों को सुरक्षा के लिहाज से गुफा के भीतर छिपाया गया था। मूर्तियों पर न तो पुरातत्व विभाग की नजर पड़ी है और न ही पर्यटन विभाग ने क्षेत्र के विकास के लिए कुछ किया है।
श्री उप्रेती का कहना है कि लोग जब पहले कैलाश की पदयात्रा पर जाते थे तब यहां बनी धर्मशालाओं में रात्रि विश्राम करते थे। इस स्थल का इतना अधिक महत्व होने के बावजूद आज तक किसी ने भी क्षेत्र के सर्वांगीण विकास पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है।
मूर्तियों के अध्ययन के लिए शीघ्र जाऊंगा : चौहान
क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई अल्मोड़ा के प्रभारी सीएस चौहान ने बताया कि चंडिका गुफा मंदिर ठांगा अभी विभाग केे संज्ञान में नहीं है। वह शीघ्र ही मंदिर क्षेत्र का भ्रमण करेंगे। मूर्तियां किस काल और किस शैली की बनी हैं, इसका अध्ययन करने के बाद ही बता पाएंगे। मूर्तियां वहां कैसे पहुुंची और किन लोगों ने कब रखीं इसका पता लगाने की कोशिश की जाएगी। वहां संभावित कार्यों के लिए अपने सुझाव प्रशासन को देेंगे।
-कैसे पहुंचा जाए
बागेश्वर-कांडा-रावतसेरा-बांसपटान सड़क में 60 किमी खातीगांव तक वाहन से फिर वहां से पांच किमी पैदल यात्रा।