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सरकारें आई गईं, विकास की आस धरी रह गई
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बागेश्वर का कर्मी गांव। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
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शंकर पांडेय
बागेश्वर। विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद नेतागण फिर से गांव-गांव जाकर मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं। विकास के नए-नए आयाम स्थापित करने के सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं। अब तक किए गए कार्यों का बखान किया जा रहा है। हालांकि इन सब वादों और दावों से मतदाता अंजान नहीं है। क्योंकि आजादी के बाद फिर अलग राज्य गठन के बाद से हर चुनाव में तो यही सुनते चले आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कितनी सरकारें आईं और चली गईं लेकिन मूलभूत सुविधाओं की आस धरी की धरी रह गई।
वादे और दावों के बीच ग्रामीण अब भी विकास की बाट जोह रहे हैं। यही कारण है कि अब वोटर विकास की उम्मीद छोड़कर लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए वोट कर रहा है। संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने कर्मी गांव जाकर चुनावी वादे और जमीकी हकीकत का जायजा लिया। मतदाताओं से बातचीत के दौरान क्षेत्र की समस्याएं जानी। बागेश्वर जिला मुख्यालय से 44 किमी की दूरी पर बसा है कर्मी गांव। नौ किमी के दायरे में फैले गांव में 11 तोक हैं। जिनमें करीब पांच हजार की आबादी निवास करती है। गांव में ढाई हजार से अधिक मतदाता हैं। बावजूद इसके अब तक गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। इतनी आबादी होने के बाद भी गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर गांव में एक आयुर्वेदिक अस्पताल बना है। गांव को तहसील मुख्यालय से जोड़ने वाला मोटर मार्ग बदहाल है। हालात यह हैं कि कपकोट से गांव तक 20 किमी की दूरी तय करने तक सैकड़ों गड्ढों से होकर गुजरना पड़ता है। कई स्थानों पर सड़क की सुरक्षा दीवार ध्वस्त है। बारिश के दौरान अक्सर सड़क पर यातायात ठप रहता है। गांव में एक राजकीय इंटर कॉलेज भी है, लेकिन विद्यालय में शिक्षकों का टोटा हर समय बना रहता है। शिक्षकों की कमी से छात्र-छात्राओं की शिक्षा प्रभावित होती है। बेरोजगारी भी गांव के युवाओं की प्रमुख समस्या है।
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मोबाइल टावर है लेकिन नेटवर्क नहीं
बागेश्वर। कपकोट के अन्य दूरस्थ गांवों की तरह कर्मी में भी संचार सुविधा बदहाल है। गांव में बीएसएनएल का मोबाइल टावर लगा है, लेकिन वह अक्सर शोपीस बना रहता है। कुछ महीने पहले तक टावर टूजी नेटवकऱ पर चलता था। जिसे अब फोर जी में बदल दिया गया है, लेकिन महीने में सात-आठ दिन ही टावर से सिगनल मिल पाते हैं। संचार सुविधा नहीं होने से अक्सर क्षेत्र जिले के अन्य इलाकों से कटा रहता है। कोविड काल में ऑनलाइन शिक्षण के दौरान संचार सुविधा की कमी से छात्र-छात्राओं को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है।
आपदा प्रभावित है कर्मी गांव
बागेश्वर। कर्मी गांव आपदा से प्रभावित है। हर वर्ष बारिश के दौरान गांव के बीचोंबीच से बहने वाले गधेरे से काफी नुकसान होता है। गांव ने 23 जुलाई 1983 को बड़ी आपदा झेेली थी। जब भारी बारिश के कारण रात के समय गांव का गधेरा उफान पर आ गया और भयात तोक में बने कई मकानों को बहाकर ले गया था। उस हादसे में गांव के करीब 36 लोगों की जान चले गई थी। गधेरे का बहाव इतना तेज था कि केवल तीन-चार लोगों के क्षत विक्षत शव ही मिल सके थे। इसके बाद से भी कई बार आपदा से खेत, रास्ते, मकानों और मोटर मार्ग को नुकसान होता रहा है। आपदा प्रभावित गांव होने के बावजूद गांव में आपदा प्रबंधन के कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं।
स्वरोजगार की अपार संभावनाएं, मदद की दरकार
बागेश्वर। कर्मी गांव में स्वरोजगार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यहां रिंगाल बहुतायत में होता है। बुरांश के फूलों के जंगल भी हैं। भेड़-बकरी पालन के लिए स्थान मुफीद है। गांव की महिलाएं कताई-बुनाई का काम भी जानती हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों ने कभी क्षेत्र को स्वरोजगार के क्षेत्र में विकसित करने की सोच नहीं दिखाई। गांव के लोग काफी मेहनतकश हैं। अगर जनप्रतिनिधि चाहते तो चुनावी वादों को हकीकत में बदलने के लिए स्थानीय संसाधन का उपयोग कर युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा सकते थे, लेकिन इसे बिडंबना ही कहा जाएगा कि अपार संपदा होने के बावजूद गांव सुविधाओं को तरस रहा है।
1980 से गांव के विकास के नाम पर वोट दे रहा है, लेकिन अब तक विकास दिखा नहीं है। विकास कहें तो एकमात्र सड़क बनी थी। वह भी बदहाल है। अस्पताल के नाम पर कपकोट की दौड़ लगानी पड़ती है। बच्चों को पढ़ाने के लिए लोग गांव छोड़कर जा रहे हैं। नेतागण चुनाव के समय काफी अपनेपन से मिलते हैं। तरह-तरह के सपने दिखाते हैं, लेकिन फिर पांच साल तक मतदाताओं को भूल जाते हैं। लोकतंत्र केवल नाम का रह गया है। यहां लोगों की कोई सुनवाई नहीं है, बस तंत्र को बचाने के लिए मतदान कर रहे हैं।
पोखर सिंह, पूर्व सैनिक, कर्मी
कर्मी गांव आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं से जूझ रहा है। गांव के पुलकुटी और थलीधार तोक में पेयजल की परेशानी रहती है। गांव की महिलाओं का जीवन सबसे अधिक कष्टकर है। महिलाएं कताई-बुनाई जानती हैं, लेकिन बेहतर संसाधन नहीं होने से आय अर्जन नहीं कर सकती हैं। नेता अपनी तो कह जाते हैं, लेकिन हमारी नहीं सुनते हैं। नेता और जनता का संबंध केवल वोट लेने और देने तक सिमट कर रह गया है।
खष्टी देवी, महिला मतदाता, कर्मी
डिजिटलीकरण के दौर में कर्मी गांव संचार सुविधाओं से जूझ रहा है। सरकारी संचार सुविधा बदहाल है, निजी कंपनी के सिगनल आते नहीं। जनप्रतिनिधियों को समस्या बताने के बावजूद कोई सुनने वाला नहीं है। महानगरों में रोजगार करने गए गांव के कई युवा लॉकडाउन के दौरान घर आ गए थे। वह भी अब बेरोजगारी में जीवन-यापन कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों ने कभी गांव के विकास को ठोस पहल नहीं की। जिसका खामियाजा ग्रामीण भुगत रहे हैं।
नारायण सिंह कर्म्याल, ग्रामीण कर्मी।
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बागेश्वर। विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद नेतागण फिर से गांव-गांव जाकर मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं। विकास के नए-नए आयाम स्थापित करने के सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं। अब तक किए गए कार्यों का बखान किया जा रहा है। हालांकि इन सब वादों और दावों से मतदाता अंजान नहीं है। क्योंकि आजादी के बाद फिर अलग राज्य गठन के बाद से हर चुनाव में तो यही सुनते चले आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कितनी सरकारें आईं और चली गईं लेकिन मूलभूत सुविधाओं की आस धरी की धरी रह गई।
वादे और दावों के बीच ग्रामीण अब भी विकास की बाट जोह रहे हैं। यही कारण है कि अब वोटर विकास की उम्मीद छोड़कर लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए वोट कर रहा है। संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने कर्मी गांव जाकर चुनावी वादे और जमीकी हकीकत का जायजा लिया। मतदाताओं से बातचीत के दौरान क्षेत्र की समस्याएं जानी। बागेश्वर जिला मुख्यालय से 44 किमी की दूरी पर बसा है कर्मी गांव। नौ किमी के दायरे में फैले गांव में 11 तोक हैं। जिनमें करीब पांच हजार की आबादी निवास करती है। गांव में ढाई हजार से अधिक मतदाता हैं। बावजूद इसके अब तक गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। इतनी आबादी होने के बाद भी गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है।
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स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर गांव में एक आयुर्वेदिक अस्पताल बना है। गांव को तहसील मुख्यालय से जोड़ने वाला मोटर मार्ग बदहाल है। हालात यह हैं कि कपकोट से गांव तक 20 किमी की दूरी तय करने तक सैकड़ों गड्ढों से होकर गुजरना पड़ता है। कई स्थानों पर सड़क की सुरक्षा दीवार ध्वस्त है। बारिश के दौरान अक्सर सड़क पर यातायात ठप रहता है। गांव में एक राजकीय इंटर कॉलेज भी है, लेकिन विद्यालय में शिक्षकों का टोटा हर समय बना रहता है। शिक्षकों की कमी से छात्र-छात्राओं की शिक्षा प्रभावित होती है। बेरोजगारी भी गांव के युवाओं की प्रमुख समस्या है।
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मोबाइल टावर है लेकिन नेटवर्क नहीं
बागेश्वर। कपकोट के अन्य दूरस्थ गांवों की तरह कर्मी में भी संचार सुविधा बदहाल है। गांव में बीएसएनएल का मोबाइल टावर लगा है, लेकिन वह अक्सर शोपीस बना रहता है। कुछ महीने पहले तक टावर टूजी नेटवकऱ पर चलता था। जिसे अब फोर जी में बदल दिया गया है, लेकिन महीने में सात-आठ दिन ही टावर से सिगनल मिल पाते हैं। संचार सुविधा नहीं होने से अक्सर क्षेत्र जिले के अन्य इलाकों से कटा रहता है। कोविड काल में ऑनलाइन शिक्षण के दौरान संचार सुविधा की कमी से छात्र-छात्राओं को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है।
आपदा प्रभावित है कर्मी गांव
बागेश्वर। कर्मी गांव आपदा से प्रभावित है। हर वर्ष बारिश के दौरान गांव के बीचोंबीच से बहने वाले गधेरे से काफी नुकसान होता है। गांव ने 23 जुलाई 1983 को बड़ी आपदा झेेली थी। जब भारी बारिश के कारण रात के समय गांव का गधेरा उफान पर आ गया और भयात तोक में बने कई मकानों को बहाकर ले गया था। उस हादसे में गांव के करीब 36 लोगों की जान चले गई थी। गधेरे का बहाव इतना तेज था कि केवल तीन-चार लोगों के क्षत विक्षत शव ही मिल सके थे। इसके बाद से भी कई बार आपदा से खेत, रास्ते, मकानों और मोटर मार्ग को नुकसान होता रहा है। आपदा प्रभावित गांव होने के बावजूद गांव में आपदा प्रबंधन के कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं।
स्वरोजगार की अपार संभावनाएं, मदद की दरकार
बागेश्वर। कर्मी गांव में स्वरोजगार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यहां रिंगाल बहुतायत में होता है। बुरांश के फूलों के जंगल भी हैं। भेड़-बकरी पालन के लिए स्थान मुफीद है। गांव की महिलाएं कताई-बुनाई का काम भी जानती हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों ने कभी क्षेत्र को स्वरोजगार के क्षेत्र में विकसित करने की सोच नहीं दिखाई। गांव के लोग काफी मेहनतकश हैं। अगर जनप्रतिनिधि चाहते तो चुनावी वादों को हकीकत में बदलने के लिए स्थानीय संसाधन का उपयोग कर युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा सकते थे, लेकिन इसे बिडंबना ही कहा जाएगा कि अपार संपदा होने के बावजूद गांव सुविधाओं को तरस रहा है।
1980 से गांव के विकास के नाम पर वोट दे रहा है, लेकिन अब तक विकास दिखा नहीं है। विकास कहें तो एकमात्र सड़क बनी थी। वह भी बदहाल है। अस्पताल के नाम पर कपकोट की दौड़ लगानी पड़ती है। बच्चों को पढ़ाने के लिए लोग गांव छोड़कर जा रहे हैं। नेतागण चुनाव के समय काफी अपनेपन से मिलते हैं। तरह-तरह के सपने दिखाते हैं, लेकिन फिर पांच साल तक मतदाताओं को भूल जाते हैं। लोकतंत्र केवल नाम का रह गया है। यहां लोगों की कोई सुनवाई नहीं है, बस तंत्र को बचाने के लिए मतदान कर रहे हैं।
पोखर सिंह, पूर्व सैनिक, कर्मी
कर्मी गांव आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं से जूझ रहा है। गांव के पुलकुटी और थलीधार तोक में पेयजल की परेशानी रहती है। गांव की महिलाओं का जीवन सबसे अधिक कष्टकर है। महिलाएं कताई-बुनाई जानती हैं, लेकिन बेहतर संसाधन नहीं होने से आय अर्जन नहीं कर सकती हैं। नेता अपनी तो कह जाते हैं, लेकिन हमारी नहीं सुनते हैं। नेता और जनता का संबंध केवल वोट लेने और देने तक सिमट कर रह गया है।
खष्टी देवी, महिला मतदाता, कर्मी
डिजिटलीकरण के दौर में कर्मी गांव संचार सुविधाओं से जूझ रहा है। सरकारी संचार सुविधा बदहाल है, निजी कंपनी के सिगनल आते नहीं। जनप्रतिनिधियों को समस्या बताने के बावजूद कोई सुनने वाला नहीं है। महानगरों में रोजगार करने गए गांव के कई युवा लॉकडाउन के दौरान घर आ गए थे। वह भी अब बेरोजगारी में जीवन-यापन कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों ने कभी गांव के विकास को ठोस पहल नहीं की। जिसका खामियाजा ग्रामीण भुगत रहे हैं।
नारायण सिंह कर्म्याल, ग्रामीण कर्मी।